Vandanda Puntambekar

Inspirational Others


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Vandanda Puntambekar

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*माटी की राखी*

*माटी की राखी*

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  6 वर्षीय मुनिया बारिश रुकते ही अम्मा के पीछे-पीछे घूम रही थी। अम्मा ने भय्यू को वहीं अंदर झोपड़ी में सुला रखा था। वह जल्दी-जल्दी सभी माटी के बर्तन सुराही मटके कुल्लड़ समेट रही थी। तभी सड़क किनारे एक ठेले वाला गुजरा उसके ठेले पर रंग बिरंगी डोरन वाली राखियां देख मुनिया मचल उठी।अम्मा भय्यू वास्ते एक डोरन वाली राखी मुझे भी चाहिए...अम्मा अपनी आंखों के कोरों को पल्लू से पोछ बोल उठी...देख छोरी इस साल कोरोना के चक्कर में कुछ भी माल नहीं बिका ऊपर से मुई बारिश भी रुकने का नाम नहीं ले रही... अब तो सब तीज त्यौहार बुझे-बुझे से नजर आते हैं। तो क्या... अम्मा भय्यू को राखी नहीं बांधूगी...अपने सा लभर के भाई को देखते हुए मुनिया बोली। देखती हूं अभी काम करने दे। कहते हुए कुम्हारन अपने काम पर लग गई। मुनिया ने एक भीगी मिट्टी का छोटी सी डिल्ली उठाई और उसे गोल सूरज की तरह बनाया अम्मा की धोती से कुछ सितारे उखाड़ लिए। वह धोती अम्मा को पिछले साल कॉलोनी वाली दीदी ने दी थी। पास में पड़े छोटे से सुतली के टुकड़े की डोरन बनाकर उसमें चिपका दिया। और उसे डलिया के नीचे छुपाकर रख आई। मुनिया का चमकता चेहरा देख कुम्हारन पूछ बैठी...ए छोरी इत्ती का खुस दिखे हे..? कऊ खजानों मिलो हे का..? कछु नाही अम्मा कहते हुए भाग-भागकर अम्मा के साथ माल उठाने में यथाशक्ति मदद करने लगी। मुनिया के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी झलक रही थी। अंदर जाकर रोटी रखने के लिए अम्मा टोकरी उठाने लगी। तो मुनिया ने भागकर अम्मा का हाथ पकड़कर कहने लगी, अम्मा इसे ना छुओ...काहे ? इसके नीचे का धरो है...? बस 2 दिन बाद देख ली जो। तुम रोटी हमारे फ्रॉक में बांधकर रख दो। कहते हुए मचल पड़ी। कुम्हारन अपने काम में लग गई। आज राखी थी मुनिया पौ फटते ही उठ बैठी। उसे उठता देख कुम्हारन पूछ बैठी.., इत्ती जल्दी काहे उठ बैठी ?अभी और सोजा। मगर मुनिया की आँख में नींद कहा वह तो बस भय्यू के उठने का इंतजार कर रही थी। भय्यू को उठता देख चहकते हुए बोली...अम्मा आज रक्षाबंधन का त्यौहार है न। यह तो बस पैसे वालों के त्यौहार है। अपने नाही कहते हुए कुम्हारन ने एक गहरी सांस भरी। मुनिया के बापू तीन रोज से घर नहीं आए थे। उसकी चिंता उसे सता रही थी।भय्यू को उठता देख खुशी से चीख उठी देख अम्मा भय्यू उठ गया। और दौड़कर उसे गले लगा लिया। अम्मा इसे पकड़ो मैं अभी आई कहते हुए मुनिया भागकर टोकरी के नीचे सूरज की तरह गोल-गोल माटी की राखी उठाकर भय्यू के कलाई पर बांधने को बेताब हो उठी। कुम्हारन आश्चर्य से मुनिया को देख पूछ बैठी...तूने माटी की राखी बनाई है...? हां अम्मा अगली साल तुम और अच्छी राखी बना देना खूब बिकेगी इसमें सूरज भगवान भी हैं, सितारे भी हैं सारा आकाश और धरती दोनों का मिलन है। बिना पैसे के भी तो त्यौहार मनाया जात है ना...नन्ही सी मुनिया की भोली और मासूम बातें सुनकर कुम्हारन ने उसे सीने से लगा लिया। और एक नई रोशनी बारिश के इस अंधेरे में उजाला फैला गई। माटी की राखी अगले बरस खूब बिकेगी अब गर्मी के बाद भी काम चलता रहेगा। उम्मीद की किरण कुम्हारन के चेहरे को सूरज की तेज रोशनी की तरह चमका रही थी।          

   


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