माँ के पसंद की बहू (भाग -2)
माँ के पसंद की बहू (भाग -2)
आज कितनी बेताबी थी अरुण के मन में वसुधा को एक नजर देखने की। बस उसकी छवि आँखों में बसाए किसी तरह घर पहुँचने का इंतजार कर रहा था।
और .....
अगले कुछ घंटों में अरुण घर पर था। अभी वसुधा आराम कर रही थी।
सुबह जब अरुण उठा तब तक वसुधा सुबह सोकर नहीं उठी थी। रात में उल्टियां करने के बाद उसका क्लांत चेहरा कुम्हला सा गया था।
बाबू जी ने हाथ के इशारे से उसे चुप रहने का और अम्मा ने धीरे से कहा,
" देखो तो भला... इत्ता छोटा सा मुंह हो गया है मेरी
बहूरिया का। दुबली पतली सी दिन भर काम में यहां से वहां दौड़ती रहती है। अब उल्टी करके जो भी खाया पिया था सब निकल गया। देखो ना कैसी मुंह सुखा कर सो रही है। मैं कहती हूँ जी... ज़रूर इसे किसी की नज़र लग गई है। पड़ोस की पंडिताइन हमेशा कहती रहती है कि कितनी भाग्यशाली हो जो बहू के रूप में एक और बेटी मिल गई है!"
बाबूजी भी अम्मा की हाँ में हाँ मिलाकर वसुधा के सिर पर प्यार से हाथ फेर रहे थे और अम्मा अपनी बिहूनी की ममता में ओतप्रोत अपने कोख जाए की उपस्थिति भी कुछ पल को भूल गई थी।
अरुण भाव विभोर होकर अम्मा बाबूजी को अपनी बहू से लाड़ लड़ाते हुए देख रहा था।
धड़कते दिल से अरुण अपने कमरे में गया तब उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था। अपने दिल की ऐसी तेज धड़कन अरुण ने इसके पहले कभी नहीं महसूस की थी।
उसे ऐसा लग रहा था कि वह पहली बार अपनी पसंद की लड़की के साथ प्रणय निवेदन करने जा रहा है। उसे प्रपोज करने जा रहा है।
थोड़ी देर में सोती हुई वसुधा ने करवट बदली तो
अरुण ने देखा वह कितनी मासूम लग रही थी। उसने सामने अरुण को देखा फिर उसे यकीन नहीं आया तो
वसुधा ने मिचमिचाती आंखों से अरुण को दुबारा ऐसे देखा जैसे कि उसे यकीन नहीं आ रहा हो कि सामने अरुण ही है या नहीं है।
अरुण ने कहा,
" ऐसे क्या देख रही हो? "
वसुधा ने कहा,
"मुझे लगा कि पता नहीं आप हो या नहीं? कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही?
उसकी इस बात से अरुण अंदर ही अंदर बहुत खुश हो गया। इसका मतलब वह अकेले में उसकी कल्पना करती है तभी तो उसे लग रहा था वह है कि नहीं।
आज...... अरुण को लग रहा था कि
यही वह दिन है जिस दिन उसे अपनी प्रेयसी को, अपनी प्रेमिका को प्रणय निवेदन करना है।और इस मासूम सी लड़की को बताना है कि अब उसके मन से छाया निकल चुकी है और अब सिर्फ मैं और तुम जीवन के सफर में साथ चलने को तैयार हैँ।वह जो धुंधली सी तस्वीर थी दुल्हन वाली आज बिल्कुल परिष्कृत होकर साफ होकर अरुण के हाथ में थी और वह वसुधा को दिखाते हुए कह रहा था,
"देखो.....तुम दुल्हन के लिबास में कितनी सुंदर लग रही हो। और तुम्हारे चेहरे पर इतना प्यारा भाव है। मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं अगर तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाए तो क्या तुम एक बार फिर से मुझे दुल्हन बन कर दिखा सकती हो?"
सुनकर वसुधा के गाल शर्म से लाल हो रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह रहा है अरुण? उसे हुआ क्या है? दिन भर अरुण कभी फल काटकर खिलाता कभी नींबू पानी पिलाता शाम तक वसुधा की तबीयत बहुत ठीक हो गई थी तो अम्मा बाबूजी ने दोनों को थोड़ी देर के लिए शाम में नीचे आने को कहा।
पार्क में अरुण ने वसुधा से कहा,
" मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है। ऐसा तो नहीं लगता कोई और काम है और कोई काम ही देखने आया हूं। मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है!"
बोलते हुए अरुण ने उसका हाथ पकड़ लिया। आज वसुधा को स्पर्श करते हुए उसे महसूस हो रहा था,
"जब एक व्यक्तित्व को पूरी तरह जो हम अपना लेते हैं उसे कमी और बेसी के साथ स्वीकार कर लेते हैं। तब उसका स्पर्श इतना ही प्रिय लगता है और तब वह वह इंसान हमें जान से प्यारा लगता है!"
अरुण वसुधा की आंखों में अपने लिए प्यार कई बार पढ़ चुका था। लेकिन आज उसकी मन की सबसे बड़ी ख्वाहिश थी कि आज वसुधा उसकी आंखों में अपने लिए प्यार पढ़ ले।
हम स्त्रियों को बनाने वाले ब्रह्मा जी ने हमें एक अद्भुत शक्ति दी है कि हम तुरंत पहचान लेते हैं कि सामने वाला हमें प्यार करता है कि नहीं। या सामने वाले की आंखों में हमारे लिए कैसे भाव हैं!
वसुधा को भी आज अरुण में अपना प्रेमी दिख रहा था। उसके हाथ के स्पर्श को महसूस कर रही थी वसुधा।
पार्क में टहलते हुए अरुण ने अभी तक वसुधा का हाथ नहीं छोड़ा था और ना ही वसुधा ने अपना हाथ छुड़ाया था।
यह उन दोनों के एक नए सफर की शुरुआत थी। एक पति पत्नी जो अब एक दूसरे को समझ कर अपनाकर प्रेम करने लगे थे...उनका जीवन आगे कितना सुखमय और खुशनुमा होने वाला था... यह आज की सुंदर सी चांदनी रात बताने वाली थी। क्योंकि जब प्रणयी इतना खुशमिजाज हो और माहौल इतना खुशनुमा हो तो रात के मधुमास का अंदाजा आराम से लगाया जा सकता है।
प्यार से वसुधा के चेहरे पर आ गई लट को संवारते हुए अरुण ने कहा,
"ज़ब मैंने तुम्हें कहा था कि मैं किसी और को प्यार करता हूँ तब तुम्हें कितना बुरा लगा होगा ना? प्लीज मुझे माफ़ कर दो!"
प्रत्युत्तर में वसुधा ने कुछ कहा नहीं। बस बड़ी बड़ी आँखों से अरुण को देखा और अपनी नज़रें झुका ली।
अरुण उन निगाहों का कायल हो गया। आखिर कहाँ से सीखी इस भोली भाली लड़की ने ऐसी कातिल अदाएं...?
पर... अभी भी एक झिझक थी अरुण के मन में... एक पश्चात्ताप सा। उसने पुनः वसुधा के हाथ थामकर कहा,
"मैं तुम्हारे साथ इतना रुड़ था और तुम्हें अपनाने से भी इनकार कर रहा था फिर भी तुमने एकतरफा यह रिश्ता निभाया। मेरे घर मेरे माता पिता को अपनाया? कैसे कर लेती हो इतना कुछ वसु? विलक्षण हो सच्ची...!"
अबके वसुधा चुप नहीं रही बल्कि निगाहें उठाकर दृढ़ स्वर में बोली,
" कैसे नहीं अपनाती? मेरी शादी सिर्फ आपसे थोड़ी ना हुई है। मैंने इस शादी को मन से स्वीकार किया है अरुण जी! और मेरे लिए आप हमेशा मेरे पति रहेंगे और मेरी ज़िन्दगी में आए प्रथम पुरुष भी!"
अरुण मुग्ध भाव से वसुधा की बातें सुन रहा था।
तभी उसे मज़ाक सूझा और वसुधा की कही हुई आखिरी पंक्ति पकड़कर बोल उठा,
"तुमने कहा कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में आनेवाला प्रथम पुरुष हूँ... मतलब मैं आखिरी पुरुष नहीं। इसका मतलब तुम अब भी किसी और से प्यार कर सकती हो... हाँ... बताओ ज़रा...!"
रुण की उम्मीद के विपरीत वसुधा इतराकर बोली,
"हो भी सकता है... यू नेवर नो...!"
बोलकर वसुधा खिलखिलाकर हँस पड़ी।
अरुण उसकी धवल दन्तपंक्ति को अपलक देख रहा था और बाबूजी की बात को याद कर रहा था... ज़ब बाबूजी ने उसे शादी से पहले वसुधा की तस्वीर दिखाते हुए उसके बारे में बताते हुए कहा था,
"बेटा! चौधरी जी की बेटी सबसे अलग है और संस्कारी भी। आधुनिकता और पौराणिकता का अनोखा मेल। तुमने ऐसी लड़की शायद ही देखी हो!"
अम्मा भी पीछे नहीं रही थी. उन्होंने भी बाबूजी की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,
"मेरा मन कहता है कि तेरे लिए यह अच्छी जीवनसंगिनी साबित होगी। अब तू उस मॉडर्न तितली छाया माया को छोड़ और इस लक्ष्मी जैसी लड़की से शादी करके अपने जीवन को एक स्थायित्व दे दे!"
तब... अरुण कितना चिढ़ गया था अम्मा बाबुजी से। उसे सब अपने प्यार के दुश्मन लग रहे थे। तब तो उसने वसुधा का फोटो भी ठीक से नहीं देखा था और आज उसकी नज़रें वसुधा के चेहरे पर से हट ही नहीं पा रही थी।
सच... प्यार हमेशा पहली नज़र में नहीं होता। कभी कभी धीरे धीरे एक दूसरे के गुणों से प्रभावित होकर भी होता है प्यार... और यह बावरा मन ज़ब किसी को उसके गुण अवगुण के साथ अपना लेता है तो बाकि सारी बातें गौन हो जाती हैँ। प्रेम एक एहसास है... बेहद प्यारा एहसास... यह बात आज छत पर बैठकर अरुण और वसुधा रुपहले चाँद की चाँदनी में महसूस कर रहे थे।
सच्चा प्यार कोई तिलस्म नहीं बल्कि ज़िन्दगी की हकीकत से उपजा हुआ भीना भीना एहसास है। जिसे दिन प्रतिदिन अपने प्रेम से सींचा जाता है और उसे बढ़ता हुआ... फलता फूलता हुआ देखना एक आत्मिक अनुभूति है।
आखिर... जीवन के सफर में जब साथ चलनेवाला कोई मिल जाता है तो मंज़िल से ज़्यादा तो सफऱ खुशनुमा लगने लगता है।
अगली सुबह... वसुधा और अरुण के जीवन में सूरज़ की रोशनी आज एक नई उजास लेकर आई थी। क्यों ना हो...अरुण को अपने माता पिता के पसंद की लड़की से प्यार जो हो गया था।
(समाप्त )
प्रिय पाठकों... किसी भी शादी में रिश्तों को मन से अपनाना सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है। वसुधा और अरुण ने भी एक दूसरे को मन से अपनाया तभी उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी सफलतम थी।
कैसी लगी आपको मेरी यह कहानी? कृपया ज़रूर बताएं।
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धन्यवाद

