माला के बिखरे मोती (भाग ५३)
माला के बिखरे मोती (भाग ५३)
अब घर के सभी सदस्य डाइनिंग टेबल पर डिनर करने के लिए आकर बैठ गए हैं। घर के सेवक खाना परोस रहे हैं। आज शांति भी खाना परोसने में हाथ बँटा रही है। खाना परोसने का तो एक बहाना है। उसको तो आज घर के सदस्यों के बीच में आग सुलगाकर जाना है। जब सबने खाना शुरू कर दिया है, तब शांति ने चुटकी ली,
"आज दोपहर में सबने बुझे हुए मन से खाना खाया था और शाम की चाय भी सबने उदासी भरे माहौल में पी थी। लेकिन भगवान का शुक्र है कि अब सबका मूड अच्छा है। इस घर को किसी की नज़र न लगे।"
शांति की इस बात पर जहाँ एक ओर घर की सभी महिलाएं थोड़ी असहज हो गई हैं, वहीं विजय शांति द्वारा इस बात को सबके सामने उठाने की वजह को सभी महिलाओं की आँखों में झाँककर ढूँढना चाह रहा है। घर के बाक़ी सभी पुरुष भी चौककर शांति की इस बात पर घर की महिलाओं की ओर देखने लगे हैं। तभी धनंजय बोला,
"क्या हुआ आज घर पर दोपहर में? हमें तो किसी ने बताया ही नहीं। कोई हमें भी बताओ।"
जय बोला,
"अरे धनंजय, तुम्हें क्या, मुझे लगता है कि हम सभी पुरुषों को कुछ नहीं पता है कि आज घर पर दोपहर में क्या हुआ है। आज तो घर से किसी का फ़ोन भी नहीं आया था ऑफ़िस में। आज तो दिन भर घर से संपर्क ही नहीं हो पाया था।
फिर जय ने सभी पुरुषों की ओर नज़र घुमाते हुए उनसे सवाल किया,
"क्या आप में से किसी की बात आज पूरे दिन भर में घर पर हुई थी?"
जय के इस सवाल पर सभी पुरुषों ने "न" में सिर हिला दिया है।
अब यश वर्धन से रहा न गया। वे माला की ओर देखकर पूछ बैठे,
"माला, अब तुम्हीं बता दो, आज घर में क्या हुआ? शांति किस बारे में बात कर रही है?"
माला झल्लाते हुए शांति की ओर देखकर यश वर्धन से बोलीं,
"अजी, आप शांति से खाना खाइए। इस शांति को तो बेकार की बातें करने की आदत है।"
इतनी देर से विजय जो चुप बैठा हुआ था, अब बोल पड़ा,
"मम्मी, कुछ तो हुआ होगा आज दोपहर में घर पर? बताइए न। माना कि शांति को बेवजह बातें करने का शौक़ है। लेकिन यह ऐसा क्यों कह रही है कि सबने बुझे हुए मन से दोपहर में खाना खाया था?"
अब आरती ने हँसते हुए बात को टालने की कोशिश की,
"कुछ नहीं विजय भैया। आप सब खाना खाइए। कोई बहुत बड़ी बात नहीं हुई। हम जेठानियों देवरानियों में थोड़ा बहुत कहना सुनना तो चलता ही रहता है। आप पुरुष लोग इन सब बातों से दूर ही रहिए। वही सबके लिए अच्छा है।"
विजय: नहीं आरती भाभीजी। बात तो कुछ न कुछ ज़रूर है। आप सब जेठानियों देवरानियों की आपस की मामूली सी कोई बात होती, तो इस तरह शांति वह बात अब डिनर के समय न उठाती। कोई बड़ी बात तो हुई है।
आरती (शांति की ओर गुस्से से देखते हुए): यह शांति भी न...! कभी बाज़ नहीं आएगी अपनी आदत से। अरे, तू चुप ही रह जाती, तो तेरा क्या बिगड़ जाता। हमको ठीक से खाना तो खाने देती। तुझे डाइनिंग टेबल पर ही दोपहर की बात छेड़नी थी...!
शांति (माफ़ी माँगने का ढोंग करते हुए): मुझे माफ़ कर दीजिए आप लोग। मैं तो चली अपने कमरे पर। मुझसे तो आप सभी भाभियों की उदासी देखी नहीं जा रही थी। इसलिए मैंने तो भोलेपन में ऐसे ही बोल दिया। मुझे क्या पता था कि आपको बुरा लगेगा।
आरती: हाँ हाँ, हमें पता है कि तू कितनी भोली है। अच्छा, अभी तू जा यहाँ से। कल सुबह आना कपड़े लेने के लिए।
आरती की यह बात ख़त्म होने से पहले ही शांति मुंह बनाती हुई वहाँ से जा रही है। वह मन ही मन खुश हो रही है कि घर में आग लगाने का जो काम करने इस समय आई थी, वह तो पूरा हो ही गया है।
संजय: अरे आप लोग पहेलियाँ क्यों बुझा रही हैं? साफ़ साफ़ बताइए न कि आज दोपहर में घर पर क्या हुआ?
ईशा: मैं बताती हूं संजय भैया। दरअसल आज दोपहर में हम लोग माया दीदी की ननद की शादी के डांस के वीडियोज़ देख रहे थे। तभी चाँदनी भाभीजी और मेरा मन हो गया डांस करने का। तो हम दोनों डांस करने लगीं। फिर सभी भाभियों ने, मम्मीजी ने और छाया दीदी ने और काया दीदी ने भी हमारे साथ ख़ूब डांस किया।
अजय: अरे, यह तो बहुत खुशी की बात है। इसमें उदास होने वाली कौन सी बात है, जो शांति अभी बोलकर गई है।
देविका: अजय भैया, दरअसल डांस के बाद डाइनिंग टेबल पर अचानक चाँदनी भाभीजी के डांस एकेडमी खोलने के अधूरे सपने के बारे में बात होने लगी और फिर वे उदास हो गईं। फिर हम सब भी उदास हो गईं।
अजय: लेकिन चाँदनी के डांस एकेडमी खोलने के अधूरे सपने की बात आज उठाई ही क्यों गई? किसने उठाई वह बात?
माला (भावना की ओर आँखें तरेरते हुए): अजय बेटा, तुम्हारी पत्नि भावना ने वह बात आज उठाई थी। यह जानते हुए भी कि इस घर की बहू बेटी घर के बाहर जाकर कोई काम नहीं करती हैं। भावना ने ही चाँदनी के अधूरे सपने की बात उठाकर घर का अच्छा ख़ासा माहौल ख़राब कर दिया था। चाँदनी का दिल दुखाया, सो अलग...!
माला की इस बात को कहने के तरीक़े पर घर की सभी बहुएं हैरान सी हो गई हैं। उनको यह लगा कि मम्मीजी ने समय के अनुसार पाला बदल लिया है। दोपहर में तो मम्मीजी बहुओं की तरफ़ थीं और अब रात को बेटों की तरफ़ हो गई हैं।
भावना (सुबकते हुए): मम्मीजी, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था कि उस बात से चाँदनी को दुख पहुंचे। मैं तो बस ऐसे ही कह बैठी थी। मुझे क्या पता था कि बात का बतंगड़ बन जाएगा। दोपहर में तो आपकी सोच भी बदल गई थी। अब बेटों के सामने आपने फिर वही पहले वाला सुर पकड़ लिया है।
अजय: भावना, तुम यह किस तरह बात कर रही हो मम्मी से। ज़रा अपने शब्दों पर ध्यान दो। मम्मी ने अपना कौन सा सुर बदल लिया है? ज़रा हमें भी तो पता चले।
भावना: माफ़ कीजिएगा मम्मीजी, अगर आपको मेरी बात बुरी लगी हो। लेकिन दिन के समय आप चाँदनी के अधूरे सपने को पूरा करने की बात मान गई थीं। (क्रमशः)
