संदूक में छुपा राज़
संदूक में छुपा राज़
एक हवेली के अंधेरे तहख़ाने में रखा लकड़ी का एक भारी संदूक कई सालों से बंद था। संदूक पर लगे धूल से लिपटे ताले और अजीब सी नक़्क़ाशी देखकर गाँव के लोगों में कई तरह की अफ़वाहें फैली थीं। कहा जाता था कि जो भी उस संदूक को खोलने की कोशिश करता है, वह कभी लौटकर नहीं आता। रोहन ने जब उस हवेली में क़दम रखा, तो उसकी नज़र सीधी उसी रहस्यमयी संदूक पर पड़ी। उस पर लटके पुराने ताले ने उसकी जिज्ञासा को चरम पर पहुँचा दिया।
भारी औज़ारों की मदद से जब रोहन ने आख़िरकार ताला तोड़ा, तो संदूक का भारी ढक्कन एक चीख़ के साथ खुला। अंदर कोई ख़ज़ाना या पुराना ख़त नहीं था, बल्कि एक बड़ा सा आईना और एक चमकीला यंत्र रखा था। जैसे ही रोहन ने उस आईने में देखा, उसमें उसकी अपनी परछाई के बजाय एक अजनबी चेहरा दिखाई दिया, जो ठीक उसकी ही तरह साँस ले रहा था।
रोहन घबराकर पीछे हटा, तभी उस यंत्र से एक आवाज़ गूँजी, "असली रोहन को संदूक में सुरक्षित रख दिया गया है।" रोहन ने चौंककर अपने हाथों को देखा कि उसकी त्वचा धातु की तरह चमक रही थी। उसे अहसास हुआ कि वह कोई इंसान नहीं, बल्कि उसी संदूक के पहरेदार के रूप में बनाया गया एक रोबोट था, जिसको असली इंसान होने का झूठा भ्रम दिया गया था।
