तस्वीर से लौटकर दादी आईं
तस्वीर से लौटकर दादी आईं
दीवार पर टँगी हुई दादी की मुस्कुराती तस्वीर एक शाम अचानक जीवंत हो उठी। ढलती धूप के साथ दादी तस्वीर से बाहर आईं और वही पुरानी सूती साड़ी सम्भालते हुए कमरे में चहलक़दमी करने लगीं। राहुल उस शाम घर पर अकेला था।
राहुल हैरान खड़ा हुआ दादी को देखता रहा। दादी ने घर की बदली हुई दीवारों, राहुल के हाथों में स्मार्टफ़ोन और अजनबी सी ख़ामोशी को देखा।
दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "घर तो बहुत बड़ा बना लिया है, मगर वह आँगन कहाँ गया, जहाँ हम सब शाम को एक साथ बैठते थे?"
राहुल ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए और गले से लगा लिया। राहुल की आँखों से बहते आँसुओं में उसका बरसों का पुराना दुख और अकेलापन धुल गया। उसने बताया कि कैसे उनकी याद में उसने उनकी पुरानी डायरी अभी तक सम्भाल कर रखी है।
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए एक राज़ खोला, "तुलसी के गमले के नीचे मैंने एक पुराना संदूक दबाया था, जिसमें तुम्हारे बचपन की तस्वीरें और तुम्हारे बचपन के कुछ खिलौने हैं। वही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति थे।"
इससे पहले कि राहुल कुछ कह पाता, दादी वापस मुस्कुराते हुए तस्वीर में सिमट गईं, मगर राहुल के मन में उसके बचपन की पुरानी मिठास छोड़ गईं।
