Shubhra Varshney

Tragedy


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Shubhra Varshney

Tragedy


माॅर्डन बहू

माॅर्डन बहू

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पार्लर से निकलती हुई पारुल पर सभी की निगाहें रुक सी गई। उसका खिलता रूप किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पर्याप्त था।

दूध का धुला उज्जवल रंग, सुडोल बदन, काले घने बाल कुल मिलाकर पारुल का व्यक्तित्व सबको लुभावना लगता था।

उसके इसी अप्रतिम रूप के चलते आदर्श ने तमाम रिश्तों को दरकिनार कर उसे चुना था।

सुप्रसिद्ध व्यवसाई के इकलौते पुत्र आदर्श ने जब पारुल को वार्षिक उत्सव में, जिसने उसे बतौर चीफ गेस्ट बुलाया गया था, नृत्य करते देखा तो आदर्श का मन उससे ऐसा बंधा कि उसके मन को कोई और नहीं भाया।

पारुल एक मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे छोटी बेटी थी।

सामने से आए स्वप्न सरीखे रिश्ते को भला कैसे उसके माता-पिता मना करते।

विवाह की सारी व्यवस्था आदर्श के परिवार की तरफ से की गई थी।

ऐसी धूम और रौनक आज तक किसी ने नहीं देखी थी। तिस पर लाल लहंगे व हीरों के सेट में आई पारुल किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

विवाह समारोह का एक वर्ग जहां पारुल के भाग्य को सराहा रहा था वहीं दूजा आदर्श के व उसके परिवार के भाग्य को।

ना चाहते हुए भी पारुल अपनी सखियों व बहनों की ईर्ष्या का पात्र बन गई थी। इतना वैभव रहन-सहन तो उन लोगों ने स्वप्न में भी नहीं देखा था।

विदाई के बाद जब वह आदर्श के भव्य घर में आई तो एकबारगी तो उसे भी अपने भाग्य से ईर्ष्या होने लगी।

यहां का जीवन उसके बचपन से अब तक के बताएं जीवन से सर्वथा अलग और अनोखा था।

यहां के तौर तरीके रीति रिवाज सब कुछ अलग थे और धीरे-धीरे पारुल अपने पुराने तौर-तरीकों को भूलकर नए रंग में रंग गई।

आदर्श की फैमिली को एक मॉडर्न बहू चाहिए थी, जिसके लिए उसकी सास ने अपनी काया पलट के लिए उसे पूरी हिदायत दे दी थी।

आदर्श के साथ यह 2 महीने का वर्ल्ड टूर कैसे पल भर में खत्म हो गया उसे पता ही नहीं चला।

वापस आने पर पारुल को अपना वार्डरोब बदला हुआ मिला था, उसके पुराने मायके से लाए गए कपड़ों को जाने कहां रख दिया गया था और उसकी जगह डिजाइनर कपड़ों से उसकी वार्डरोब भरी थी।

अपनी मां के दिए हुई कपड़े, जो कि उन्होंने बहुत चाव से और मुश्किल से पारुल के लिए तैयार किए थे, ना पाकर उसका मन उदास हो गया था।

पहली विदा के बाद जब वह घर पहुंची तो उसके माता-पिता उसको गुड़िया की तरह सजा देखकर भावविभोर हो गए।

वे भगवान का शुक्रिया करते हुए थकते नहीं थे कि पता नहीं किन अच्छे कर्मों से उनकी बेटी को इतना अच्छा घर मिला था।

उसके बहन भाई उसके कपड़े और जेवर छू छू कर देख रहे थे। वे मायके में ज्यादा दिन रुकना चाहती थी लेकिन सास के फरमान से उसे अगले दिन ही आदर्श वापस लेने आ गया।

विवाह के बाद ड्राइविंग व स्विमिंग सीखने का फरमान उसे सुना दिया गया था।

स्विमिंग से तो उसे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन तेज रफ्तार से उसे शुरू से ही भय लगता था।

उसने आदर्श को बड़े प्यार से ड्राइविंग ना सीखने के लिए कहा।

पारुल के प्यार के रंग में रंगा आदर्श आसानी से तैयार हो गया।

पर अब पारुल की स्वभाविक आज़ादी आधुनिक पिंजरे में कैद हो गई थी।


नृत्य को अपना जीवन समझने वाली पारुल अब एक मिनट के नृत्य को भी तरस गई थी आखिर इतने बड़े घर की बहू में भला नाचती हैं क्या?

सास की बनाई दिनचर्या में ही उसे अपना दिन बिताना पड़ता था।

किचन में उसका जाना हिकारत का काम माना जाता।

आखिर घर में लगे इतने नौकरों और सहायकों की फौज किस काम की थी।

स्विमिंग सीखने से आकर उसके लिए करेले चुकंदर का जूस पीना अनिवार्य था आखिर अपने बदन को भी तो सुडोल उसे बनाए रखना ही था। चाट की बेहद शौकीन वह चटपटे खाने को तरस गई थी।

सास के साथ उसे आए दिन जलसों और विभिन्न कार्यक्रमों में बतौर जज शोभा बढ़ानी पड़ती।

पूरे दिन सजी गुड़िया की तरह वह कठपुतली सी कभी इस कार्यक्रम से उस कार्यक्रम में सास के पीछे पीछे चलती रहती।

एक दिन उसे अपनी मां से मिलने का बहुत मन था। पर सास ने यह कहकर मना कर दिया कि आज हमें जनसेवा भवन में उद्घाटन करने जाना है।

पारुल को अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि उसकी पंखों की उड़ान का रिमोट कंट्रोल उसके हाथ में नहीं था।

वह एक ऐसी गुड़िया बन चुकी थी जिसे आधुनिक कपड़े पहनने, देश विदेश घूमने व मनपसंद खरीदारी करने की सब आज़ादी थी लेकिन उस गुड़िया की पसंद क्या थी वह कोई नहीं जानना चाहता था।

आदर्श के प्यार के पिंजरे में भी वह एकाकीपन की शिकार बनती चली जा रही थी।

उसे अपना जीवन अब उस मरुस्थल की तरह लगता था जहां पर पीने को पानी तो था लेकिन उस पानी से उसकी प्यास बुझती ही नहीं थी।

रफ्तार से डर उसके ड्राइविंग सीखने में बाधक था और यह बात अब आदर्श के परिवार को खटक रही थी।

एक उच्च घराने की मॉडर्न बहू कार भी न चलाने जाने तो इससे ज्यादा शर्मनाक क्या होगा।

मां की इच्छा से सहमत आदर्श ने भी अब पारुल से ड्राइविंग सीखने को कह दिया था।

बेमन से पारुल ड्राइविंग सीखने जाने लगी।

आदर्श ने उसके जन्मदिन पर तोहफे के रूप में कार ही उसे गिफ्ट की।

सास ने फिर फरमान सुना दिया था कि अब उसे कार से ही कहीं आना-जाना था।

जब वह पहली बार अपने घर कार ड्राइव करके पहुंची तो उसके माता पिता की आंखों में खुशी के आँसू आ गए।

उसकी मां ने तो यह तक कह दिया था कि उसकी सास देवी है, कौन देता है बहू को इतनी आज़ादी।

सुनकर पारुल फीकी हँसी हँस दी थी। आज़ादी... वही जानती थी वह कितनी आज़ाद थी।

एक दिन एक सभा में दोनों सास बहू को पहुंचना था।

सास तो ड्राइवर को लेकर अपनी कार से निकल गई और कह गई कि पारुल तुम अपनी कार खुद ड्राइव करके वहां पर आना जिससे सब लोगों पर अच्छा इंप्रेशन पड़े।

अपनी बहू को वह समाज में सबसे मॉडर्न और होशियार दिखाना चाहतीं थी।

बेमन से पारुल ने हां कर दी।

वह तो जलसे में ही नहीं जाना चाहती थी , उस पर खुद कार चला कर ले जाना उसे बहुत परेशान कर रहा था।

आज सुबह से ही उसकी तबीयत भी ढीली थी।

जैसे तैसे वह भारी साड़ी और मोती पन्ने का सैट पहन कर तैयार हुई और जलसे के लिए निकल पड़ी।

कार चलाते हुए वह बेहद उदास थी। वह सोच रही थी कि उसने विवाह करके क्या पाया।

वह तो आदर्श के घर की शोपीस बनकर रह गई थी।

विवाह से अब तक की घटनाएँ उसकी आंखों के सामने एक चलचित्र की भांति घूम रही थी और इसी के चलते हुए सामने से आता तेज रफ्तार कंटेनर उसे दिखाई नहीं दिया।

उधर जलसे में देर होने पर सास उसे फोन पर फोन करे जा रही थी।

कार में फोन बजे जा रहा था, भीषण टक्कर के बाद बेदम पड़ी, आखिरी सांसें गिनती पारुल अब आज़ाद हो चली थी।



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