लो सफर शुरू हो गया
लो सफर शुरू हो गया
रोज़हिका और ज़ुमेल—
दो नाम जो एक-दूसरे के बिना कभी पूरे नहीं हुए।
उनकी कहानी किसी कविता की तरह शुरू हुई थी और किसी आँसू की तरह खत्म।
वो कॉलेज का समय था। हर सुबह की धूप जब कैंपस के पेड़ों पर पड़ती, तो रोज़हिका का चेहरा उसी रोशनी में चमक उठता था। ज़ुमेल कहता,
"तुम सूरज से भी ज़्यादा उजली लगती हो रोज़हिका।"
वो मुस्कुरा देती, "और तुम बादल जैसे... कभी पास आते हो, कभी छा जाते हो।"
उनकी मुलाक़ातें छोटी-छोटी थीं, लेकिन उनमें समंदर की गहराई थी। कैंटीन की कॉफ़ी, लाइब्रेरी के कोने, और पार्क की बेंचें—हर जगह उनके इश्क़ की हल्की-सी खुशबू बस गई थी।
ज़ुमेल को किताबें पसंद थीं, रोज़हिका को कविताएँ।
वो कहती, "ज़ुमेल, जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी ना, तब भी तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहूँगी।"
ज़ुमेल हँस देता, "और मैं तब भी तुम्हारे बालों में वही फूल लगाऊँगा, जो अब लगाता हूँ।"
पर ज़िंदगी को इन वादों से क्या लेना देना था।
रोज़हिका के पिता का ट्रांसफर हुआ। एक बड़े शहर में।
ज़ुमेल उस दिन बस स्टॉप पर खड़ा था। उसने बहुत धीरे से कहा,
"वादा करो, लौट आओगी।"
रोज़हिका की आँखों में आँसू थे, "अगर किस्मत ने चाहा... तो मिलेंगे।"
बस चली गई।
और उनके बीच की दूरी, बस के पहियों से नहीं, वक्त के पहियों से बढ़ती चली गई।
साल बीते।
ज़ुमेल ने नौकरी की, फिर शादी की—मजबूरी में।
उसकी बीवी अच्छी थी, पर रोज़हिका जैसी नहीं।
हर मुस्कुराहट में वो वही चेहरा ढूँढता रहा जो अब सिर्फ़ यादों में था।
रोज़हिका ने भी शादी की थी। पर उसका पति बीमार रहा और कुछ सालों में ही दुनिया छोड़ गया।
वो फिर अकेली हो गई।
वो फिर वही कविताएँ लिखने लगी, जिनमें सिर्फ़ एक नाम गूँजता था—“ज़ुमेल।”
समय का पहिया घूमता गया।
दोनों बूढ़े हो चुके थे।
रोज़हिका अब सत्तर की थी। सफ़ेद बाल, काँपते हाथ, पर दिल में वही मासूम इश्क़ था।
वो हर साल किसी न किसी जगह घूमने निकल जाती थी।
कहती थी, "शायद किसी स्टेशन पर, किसी बेंच पर, वो फिर मिले..."
एक दिन उसने अकेले यात्रा करने का निश्चय किया।
शिमला की ट्रेन पकड़ी।
ट्रेन की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसे वो सारे स्टेशन याद आए जहाँ कभी उसने ज़ुमेल का इंतज़ार किया था।
उसकी आँखें नम थीं।
वो धीरे से बुदबुदाई, “कहीं तो तुम भी अकेले होंगे ना... ज़ुमेल?”
ट्रेन की अगली बोगी में, एक बूढ़ा आदमी खिड़की के पास बैठा था।
सफेद बाल, पुराने जमाने की टोपी, हाथ में किताब—“कविताएँ रोज़हिका की।”
हाँ, वही नाम। वही कविताएँ जो रोज़हिका ने अपने अकेलेपन में लिखी थीं।
उसने किताब के पन्नों को धीरे-धीरे पलटा,
हर पन्ने पर लिखा था — “तुम लौट आना ज़ुमेल, मेरा नाम अब भी वहीं है जहाँ तुमने छोड़ा था।”
उसने खिड़की से बाहर देखा। पहाड़, बादल, बारिश की बूंदें… सब कुछ वैसा ही था।
बस उसकी रोज़हिका कहीं नहीं थी।
शाम का वक्त था।
ट्रेन एक छोटे स्टेशन “कंडाघाट” पर रुकी।
रोज़हिका उतरी, टहलने लगी।
बेंच पर बैठते हुए उसने पास वाले बूढ़े से पूछा,
“माफ़ कीजिएगा, ये सीट खाली है?”
वो बूढ़ा मुस्कुराया, “अब तो सब खाली है मैडम... बैठ जाइए।”
वो बैठ गई।
थोड़ी देर बाद उसने धीरे से कहा,
“आपके हाथ में जो किताब है... वो कहाँ से ली?”
बूढ़ा आदमी बोला,
“बहुत पुरानी है। एक बार एक प्रदर्शनी में मिली थी। इसका नाम सुनकर मैंने ख़रीद ली। पता नहीं क्यों, इस नाम में कुछ अपना सा लगा — रोज़हिका...”
उसके हाथ काँप गए।
उसने बहुत धीरे से पूछा,
“आपका नाम... क्या बताया आपने?”
वो मुस्कुराया,
“मेरा नाम ज़ुमेल है।”
रोज़हिका की आँखों से आँसू बह निकले।
वो कुछ पल उसे देखती रही, जैसे ज़माने की थकान एक पल में उतर गई हो।
“ज़ुमेल... तुम?”
वो चौंक गया, उसकी आँखें भर आईं।
“रोज़हिका... तुम जिंदा हो?”
दोनों के बीच कुछ पल का सन्नाटा छा गया।
फिर वो दोनों हँस पड़े, रो पड़े, और दुनिया की सारी शिकायतें बह गईं उन बूंदों में।
ज़ुमेल ने धीरे से कहा,
“देखा, वादा पूरा हुआ... तुम लौट आई।”
रोज़हिका ने कहा,
“मैं नहीं लौटी ज़ुमेल... किस्मत ने हमें लौटा दिया।”
उन्होंने ट्रेन की एक खिड़की से झाँका, बादलों में डूबे पहाड़ थे।
ज़ुमेल ने उसकी उँगलियाँ थामीं, “अब कहीं मत जाना।”
रोज़हिका बोली, “अब मैं कहाँ जा सकती हूँ, जब मंज़िल मिल गई।”
ट्रेन आगे बढ़ी।
रात उतर रही थी।
दोनों चुप थे, पर उनके बीच का सन्नाटा अब सुकूनभरा था।
ज़ुमेल ने कहा,
“पता है, मैं हर साल इस ट्रेन से सफ़र करता था... शायद किसी स्टेशन पर तुम्हें मिल जाऊँ।”
रोज़हिका ने सिर झुकाया,
“और मैं हर साल किसी पहाड़ी पर तुम्हें ढूँढने जाती थी।”
वो दोनों मुस्कुरा दिए।
अब ज़िंदगी की दौड़ खत्म थी, बस एक नामुमकिन सफ़र बाकी था—
जिसे अब वो साथ तय करने वाले थे।
अगले दिन सुबह ट्रेन एक घाटी से गुजर रही थी।
धूप खिड़की से झाँक रही थी।
दोनों के चेहरे पर एक अजीब शांति थी।
रोज़हिका ज़ुमेल के कंधे पर सिर रखे बैठी थी।
वो कह रही थी,
“अब डर नहीं लगता... अगर ये आख़िरी सफ़र भी हो, तो भी साथ हैं ना?”
ज़ुमेल ने उसकी उँगलियों को कसकर पकड़ा,
“नामुमकिन सफ़र अब मुकम्मल हो गया रोज़हिका।”
ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुँची।
साथ बैठे वो दोनों... अब सो चुके थे।
एक मुस्कान के साथ।
दोनों की हथेलियाँ एक-दूसरे में गुँथी हुई थीं।
कंडक्टर ने उन्हें देखा, फिर धीरे से अखबार उनके चेहरों पर रख दिया।
क्योंकि वो समझ गया था—
दो अधूरे लोग आज पूरे हो गए थे।
कुछ सालों बाद, उसी स्टेशन की दीवार पर एक छोटा-सा बोर्ड लगाया गया—
“नामुमकिन सफ़र – रोज़हिका और ज़ुमेल की याद में।”
लोग वहाँ बैठते हैं, बातें करते हैं, और कभी-कभी कोई बुज़ुर्ग जोड़ा वहाँ आता है,
एक-दूसरे का हाथ थामे कहता है—
“देखो, सच्चा प्यार अगर अधूरा भी रहे, तो वो नामुमकिन नहीं...
वो बस देर से पूरा होता है।”
“इश्क़ वक्त से नहीं हारता,
वो बस वक्त के साथ सफ़र करता है…
कभी जुदाई बनकर, कभी मुलाक़ात बनकर।”
(कहानी समाप्त)
~VanyA V@idehi Vani
