चिनाल
चिनाल
उस रात की स्याह चादर आसमान पर इस तरह फैली थी जैसे किसी ने अंधेरे को खोलकर धरती पर उड़ेल दिया हो। हवा में एक अजीब-सी सिहरन थी, और दूर पहाड़ी पर खड़ा वह प्राचीन किला आज भी उतना ही रहस्यमय लग रहा था जितना सदियों पहले रहा होगा। गाँव के लोग उस किले के पास जाने से कतराते थे। कहते थे—“वहाँ सिर्फ खामोशी नहीं, मौत बोलती है… और तहखाने में तो खुद अंधेरा भी जाने से डरता है।” लेकिन चिनाल को इन बातों पर विश्वास नहीं था। चिनाल… एक जिद्दी, निडर और जिज्ञासु लड़की। उसकी आँखों में हमेशा कुछ जानने की आग जलती रहती थी। और उसी आग ने उसे उस रात किले की ओर जाने पर मजबूर कर दिया। “तुम पागल हो गई हो क्या?” ओंकू ने उसका हाथ कसकर पकड़ते हुए कहा, “तुम्हें पता है लोग उस किले के बारे में क्या कहते हैं?” चिनाल मुस्कुराई, “डरते तो वो हैं जिन्हें सच जानने से डर लगता है। मुझे नहीं।” ओंकू ने गहरी सांस ली। वह चिनाल से बेहद प्यार करता था—इतना कि उसके साथ मौत के मुंह में भी जाने को तैयार था। “ठीक है,” उसने कहा, “लेकिन जो भी होगा… हम साथ रहेंगे।” चिनाल ने उसकी आँखों में देखा, और हल्के से सिर हिला दिया। दोनों किले के विशाल, जर्जर दरवाजे के सामने खड़े थे। दरवाजे पर जंग लगा था, और जैसे ही उन्होंने उसे धक्का दिया, एक तेज़ चीख जैसी आवाज़ गूँजी—जैसे किला खुद उनका स्वागत नहीं, चेतावनी दे रहा हो। अंदर कदम रखते ही एक अजीब-सी ठंडक उनके शरीर में उतर गई। “तुम्हें भी… कुछ अजीब लग रहा है?” ओंकू ने धीमे से पूछा। “हाँ…” चिनाल ने फुसफुसाया, “जैसे कोई हमें देख रहा हो…” किले के अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी दीवारें थीं। लेकिन सबसे अजीब बात थी—दीवारों पर बने पुराने चित्र। उन चित्रों में लोग चीख रहे थे… कुछ के चेहरे पर डर था… और कुछ के चेहरे जैसे गायब थे। “ये सब…” ओंकू ने कहा, “सिर्फ पेंटिंग नहीं लगती…” अचानक चिनाल की नजर एक दीवार पर पड़ी, जहाँ एक पुराना दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। “यही होगा तहखाना…” उसने धीरे से कहा। ओंकू का दिल तेजी से धड़कने लगा। “चिनाल… वापस चलते हैं…” लेकिन चिनाल आगे बढ़ चुकी थी। जैसे ही उन्होंने उस दरवाज़े को खोला, नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दीं—अंधेरे में डूबी हुई। “चलो…” चिनाल ने कहा। दोनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे। हर कदम के साथ हवा और ठंडी होती जा रही थी… और एक अजीब-सी सड़ांध भी महसूस हो रही थी। नीचे पहुँचते ही उनके सामने एक विशाल तहखाना था। और वहाँ… कुछ था। दीवारों पर लोहे की जंजीरें लटकी हुई थीं… जमीन पर सूखे खून के निशान थे… और कोनों में कुछ कंकाल पड़े थे। ओंकू ने काँपते हुए कहा, “ये… ये जगह… यातना देने की लगती है…” चिनाल की आँखें फैल गईं, “यहाँ कुछ बहुत भयानक हुआ है…” तभी… एक धीमी-सी आवाज़ गूँजी— “क्यों आए हो…?” दोनों सिहर उठे। “क… कौन है?” ओंकू ने डरते हुए पूछा। अंधेरे से एक आकृति धीरे-धीरे उभरने लगी। वह एक औरत थी… या शायद उसकी आत्मा। उसका चेहरा आधा जला हुआ था, आँखें खाली थीं… और उसके शरीर पर जंजीरें लिपटी हुई थीं। “मैं… इस तहखाने की रानी हूँ…” उसकी आवाज़ गूँजी, “और तुमने मेरी नींद भंग की है…” चिनाल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, “तुम… यहाँ क्यों हो?” आत्मा की आँखों में अचानक आग-सी जल उठी। “क्योंकि मुझे धोखा दिया गया… मुझे यहाँ जिंदा दफना दिया गया…” “किसने?” ओंकू ने पूछा। “मेरे अपने प्रेमी ने…” यह सुनकर चिनाल और ओंकू एक-दूसरे को देखने लगे। “वह मुझे बहुत प्यार करता था…” आत्मा बोली, “लेकिन जब उसे सत्ता चाहिए थी… उसने मुझे इस तहखाने में बंद कर दिया… और मैं धीरे-धीरे… मर गई…” तहखाने की दीवारें जैसे उस दर्द को दोहरा रही थीं। “तब से…” आत्मा की आवाज़ और भयानक हो गई, “जो भी यहाँ आता है… मैं उसे जाने नहीं देती…” अचानक हवा तेज़ हो गई। जंजीरें अपने आप हिलने लगीं। ओंकू ने चिनाल का हाथ कसकर पकड़ लिया, “हमें यहाँ से निकलना होगा!” लेकिन चिनाल वहीं खड़ी रही। “तुम्हें न्याय चाहिए…” उसने आत्मा से कहा। आत्मा एक पल के लिए चुप हो गई। “हाँ…” उसने धीरे से कहा। “तो हम तुम्हें न्याय दिलाएँगे…” चिनाल बोली। ओंकू चौंक गया, “तुम पागल हो गई हो? ये हमें मार देगी!” लेकिन चिनाल की आँखों में डर नहीं, दृढ़ता थी। “तुम्हारे प्रेमी का क्या हुआ?” उसने आत्मा से पूछा। “वह राजा बन गया… लेकिन उसकी आत्मा भी यहीं भटकती है…” आत्मा ने कहा, “हर रात… वह मुझे ढूँढने आता है…” अचानक तहखाने में एक और आवाज़ गूँजी— “मैं आ गया हूँ…” एक और छाया अंधेरे से निकली। वह एक आदमी था—राजसी कपड़ों में… लेकिन उसका चेहरा सड़ा हुआ था। “तुम अब भी मेरा इंतजार कर रही हो…” उसने हँसते हुए कहा। आत्मा की आँखों में गुस्सा भर गया। “तूने मुझे धोखा दिया!” वह चीखी। राजा हँसा, “प्यार? वो सिर्फ एक खेल था…” चिनाल ने गुस्से से कहा, “तुमने उसे मार दिया!” राजा ने उनकी ओर देखा, “और अब तुम भी यहीं मरोगे…” अचानक तहखाने का दरवाजा बंद हो गया। ओंकू ने चिनाल को अपनी ओर खींच लिया। “कुछ भी हो जाए… मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…” चिनाल की आँखों में आँसू आ गए, “और मैं तुम्हें…” दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया। तभी चिनाल को कुछ याद आया। “अगर उसकी आत्मा को शांति मिल जाए…” उसने सोचा, “तो शायद ये सब खत्म हो सकता है…” वह जोर से बोली, “तुम्हें उससे बदला नहीं… मुक्ति चाहिए!” आत्मा ठिठक गई। “मुक्ति…?” “हाँ…” चिनाल बोली, “अगर तुम उसे माफ कर दो… तो तुम इस बंधन से मुक्त हो सकती हो…” आत्मा काँपने लगी। राजा हँसा, “ये कभी मुझे माफ नहीं करेगी…” लेकिन तभी… आत्मा की आँखों से आँसू बहने लगे। “मैं थक गई हूँ…” उसने कहा, “सदियों से… इस नफरत में जीते-जीते…” उसने राजा की ओर देखा। “मैं तुम्हें माफ करती हूँ…” अचानक एक तेज़ रोशनी फैली। राजा चीखने लगा, “नहीं! ये नहीं हो सकता!” उसका शरीर जलने लगा… और वह राख में बदल गया। तहखाने की जंजीरें टूट गईं। आत्मा का चेहरा अब शांत था। “धन्यवाद…” उसने चिनाल और ओंकू से कहा। धीरे-धीरे वह भी रोशनी में विलीन हो गई। तहखाना शांत हो गया। दरवाजा अपने आप खुल गया। चिनाल और ओंकू एक-दूसरे को देखते रहे। “हम… बच गए…” ओंकू ने कहा। चिनाल मुस्कुराई, “हाँ… लेकिन हमने सिर्फ खुद को नहीं… उसे भी बचाया है…” किले से बाहर निकलते हुए सुबह की पहली किरणें आसमान पर फैल रही थीं। ओंकू ने चिनाल का हाथ थाम लिया। “तुम्हें पता है…” उसने कहा, “मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ?” चिनाल मुस्कुराई, “मुझे पता है… और मैं भी…” उस दिन के बाद किला कभी डरावना नहीं लगा। लेकिन गाँव वाले कहते हैं… कभी-कभी रात में उस तहखाने से एक हल्की-सी रोशनी निकलती है… और दो परछाइयाँ… हाथों में हाथ डाले… मुस्कुराती हुई दिखती हैं। शायद… वो चिनाल और ओंकू हैं। या शायद… वो दो आत्माएँ हैं जिन्हें आखिरकार सच्चा प्रेम और मुक्ति मिल गई। ~Vanya Vaidehi Vani
