लज्जा
लज्जा
शादी की तैयारियाँ बड़े जोरों पर थी।घर की छत पर लाईट जगमगा रही थीं।बाहर से भीतर तक रोशनी दिखाई दे रही है।दुल्हन मण्डप के बीच सिकुड़ी हुई बैठी है।
पंडित जी विवाह कार्य करवाते हैं, फेरों के मंत्रोच्चारण के साथ दूल्हा-दुल्हन फेरे ले रहे हैं।
फेरे पूरे होने के बाद अन्य रस्में निभाई गयीं।शादी के बाद विदाई होने चली तो दुल्हन की आखें अपनों से बिछुड़ने के गम में भर आई।भाई-बहन के गले लगकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।माँ के गले लगकर ऐसे रोई कि अब वह जिंदा न रह पाये।
सारे कार्यक्रम निपटाकर विदाई की रस्म पूरी हुई और दुल्हन अपने घर आ (ससुराल) आ गई।सभी घर में बहुत खुश हैं कि दुल्हन घर आई है दौड़-दौड़कर सभी सदस्य काम करते हैं।सारी रस्म निभाने की वजह से उसकी आँखें बोझिल हो रही थीं।पर वह ठीक से आराम नहीं कर पा रही है।
खुशबू काफी देर तक मेहमानों से घिरी बैठी रही।
रात्रि में सुनील की प्रतीक्षा में कब आँख लग गई पता नहीं चला।आँख खुली तो सुनील सामने ही था ,थोड़ी देर ईधर-उधर की बातें करके वे दोनों सो गए।
शादी के बाद कुछ दिन तो खुशबू के बहुत अच्छी कटे, पति के भरपूर प्यार के साथ ,सास-ससुर की नजर भी उस पर ही टिकी रहती है।
कुछ साल यूँही गुजर गए, अब सुनील की सच्चाई उसके सामने आने लगी जिससे खुशबू मुरझाने लगी।।सास भी उसे जली-कटी सुनाने में जरा भी नहीं हिचकिचाती हैं।ससुर अपनी पत्नी के डर से बहू का कभी पक्ष नहीं लेते।
बड़ी नन्द भी शादी होने के बाद भी खाना-पीना मायके में ही करती हैं, जिससे से खुशबू की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।हाँ,छोटे नन्द और देवर से ही उसे जरा सहारा है। अब उसकी गोद में एक बच्ची आ जाती है, जिसकी परवरिश ससुर जी के पैसों से ही होती है।सुनील कोई कार्य नहीं करता है और सारी बुराइयाँ उसके अन्दर समाहित हैं।पैसा सास-ससुर का होने के कारण वह अपनी सास को फूटी आँख नहीं सुहाती पर माँ बेटे में अच्छी बनती है।
सास,बड़ी नन्द और पति जब तब हाथ उठा दिया करते थे, लगातार क्लेश के कारण वह दुखी और कमजोर हो गई थी।पति के घर के बाहर भी न जाने कितने लड़कियों से सम्बन्ध थे जिससे दिन प्रतिदिन वह अपने मन में ही कुढ़ती रहती है।
खुशबू की बच्ची अब बड़ी हो गई और वह स्कूल जाने लगी। खर्चा भी बड़ गया ,पर सास और बहू के मध्य कुछ भी सामान्य नहीं था।सासु माँ बच्ची से ही अपना कमप्टीसन करने लगी दूध जो बच्ची के लिए आता था सासु माँ पी लेती ,कमजोरी का बहाना करके ।खाने-पीने वस्तुओं में भी वह अपना हिस्सा कर लिया करती है।अजीब दोराहे पर खड़े हो कर भी वह मुस्कुराती रहती है।
बड़ी नन्द वहीं आ जाती हैं खाना खाने उन्हें काम का बड़ा आलस्य है सबको बना खिलाकर भी जब वह खाती तो उन्हें जली -कटी ही सुनने को मिलती।
ससुर जी कहते-"प्रेमा के बच्चे आ जाते हैं, तो खुशबू खाना भी बनना नहीं चाहती और तो और खुशबू के भाई के लिए भी कहते कि इसके भाई ने बहन का घर बर्बाद कर दिया है, जरा सी कोई बात हुई भाई से कह दी।खुशबू का भाई वकील है शायद इसलिए वे उनसे डरते होगें कि कहीं कुछ कर न दे पर खुशबू के भाई ने कभी उँची आवाज में भी बात नहीं की।
कुछ समय बाद छोटी नन्द की शादी हो जाती है और देवर जाँब पर चले जाते हैं।
अब उसके दामन में एक और कन्या आ जाती है।सब लड़का चाहते थे अतः उस छोटी बच्ची से सब दूर-दूर ही रहते हैं।पर वह परी अपनी शैतानियों से सबका दिल जीत लेती है।अपनी दादी की तो वह जान बन जाती है ,पर बहू के प्रति उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आता।दो बच्चियों के बाद भी पति के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता।सास-ससुर भी बुराई करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
"धोखे से शादी की है कि इतनी दुबली-पतली लड़की दे दी और न दहेज में कुछ दिया।"
अब लाज में सिमटी खुशबू ने अपना मोर्चा स्वयं ही सम्भालना शुरू कर दिया।
अब जब सास -ससुर कुछ कहते, वह टका सा जबाब देती।बड़ी नन्द और उनके बच्चों का खाना बनाना उसने बंद कर दिया,तो वह और काँटों की तरह चुभने लगी।एक दिन जब सासु माँ अलमारी साफ कर रही थीं कि उन्हें अपने रखें एक हजार रुपए नहीं मिल रहे थे तो वह तीखे स्वर में बोली-"खुशबू ;-----यहाँ रूपये रखें थे कहाँ गए।
खुशबू ने उत्तर दिया मैंने नहीं देखे मम्मी जी"
फिर भी उन्होंने उसे चोर ठहरा दिया।खुशबू अब कहाँ चुप रहने वाली थी, उसने भी कह दिया तुम्हारी तरह नहीं हूँ, जो ससुराल में सबकी जेबें टटोलते फिरूँ।"उन दोनों में बहुत बहस हुई पर खुशबू ने हार बिल्कुल नहीं मानी।
धीरे-धीरे वह आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने लगी और पास के स्कूल में शिक्षण करने लगी।
बड़ी बेटी स्कूल चली जाती, छोटी को वह अपने साथ ले जाती है।
एक और सासु माँ ने कहा-"खुशबू तुम्हारे पापा मेरठ जा रहे हैं, नाश्ता तैयार कर देना।"
खुशबू ने तपाक से कहा-"मम्मी जी मैं स्कूल जाती हूँ,, उन्हें तैयार करती हूँ, उनका नाश्ता बनाती हूँ, मेरे पास समय नहीं।पापा के लिए आप ही नाश्ता तैयार कर लें, वैसे भी आपके हाथ का नाश्ता उन्हें बहुत पसंद आता है ,यह कहकर वह वहाँ से निकल जाती है।
खुशबू की सास उसका मुँह ताकती रह जाती हैं।उधर पति का प्रेम अंजू नाम की लड़की से ज्यादा परवान चढ़ रहा था, सो उसने उससे भी कम बोलना शुरू कर दिया। न उसके कपड़ों पर ध्यान देती और न ही खाने-पीने पर।
जब सुनील अपनी शर्ट निकाल रहा था तो उसे न तो प्रेस की हुई शर्ट मिली और न ही धुली हुई ,उसने खुशबू से पूछा-तुमने यह शर्ट धुली क्यों नहीं।"
खुशबू पत्थर सा जबाब देती है-"क्यों उस अंजू का क्या हुआ, उससे क्यों नहीं धुलवाते सारी शर्ट्स।"
यह सुनकर सुनील खुशबू पर हाथ उठाने लगा तब खुशबू हाथ रोकते हुए चेतावनी देते हुए कहती है-"अब मुझ पर हाथ उठाने की गलती न करें, नहीं तो तुम्हें कोर्ट तक ले जाऊँगी ।
यह कह वह कमरे से बाहर निकल जाती है।जब से उसने हर वक्त नन्द रानी की सेवा करना क्या बंद किया कि उनका आना भी नाममात्र को रह गया।
सास-ससुर ने उसके सख्त रवय्यै के चलते पहले ही घुटने टेक दिए, पति परमेश्वर अब हाथ उठाने कि हिम्मत नहीं कर पाते, फिर भी सम्बन्धों में कटुता आ गई।खुशबू को उनसे घृणा होने लगी, अब तो वह केवल अपने और अपनी बेटियों पर ध्यान देने लगी।
