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Sonia Jadhav

Tragedy Crime


4.4  

Sonia Jadhav

Tragedy Crime


लौट आना मुसाफिर

लौट आना मुसाफिर

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आज बापू ने फिर से माँ को मारा है। मैं गया था बचाने माँ को बीच में, पर उसने धक्का दे दिया और मैं गिर पड़ा। मेरा सर चारपाई के कोने से लग गया और खून बहने लगा। बापू मुझे मारने के लिए और आगे बढ़ा ही था, कि माँ ने हाथ में छुरी ले ली।

" खबरदार जो तूने उसे हाथ लगाया तो, मैं यह छुरी सीधा तेरे पेट में उतार दूंगी। मैं खाती हूँ ना तेरी मार चुप रहकर, मुझे मार। मेरे बेटे को कुछ कहा तो मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगी।"

पतला- दुबला सा बाप था मेरा, पर उसमें ताकत गजब की थी। एक थप्पड़ मारा उसने माँ को और माँ नीचे गिर पड़ी। 

मुझे मारेगी साली.....

आज तुम दोनों माँ - बेटे का वो हाल करूँगा की फिर से छुरी उठाना भूल जायेगी।

उसने बेल्ट निकाली ही थी मुझे मारने के लिए, कि मैंने पास में पड़ी उसी की शराब की बोतल उसके सर पर दे मारी।

वो ज़ोर से चीखा और नीचे गिर पड़ा। खून में लथपथ उसका शरीर नीचे पड़ा था, बिलकुल निर्जीव। माँ ने मुझे अपने सीने से लगाया और अपनी कसम देकर वहां से भाग जाने को कहा।

मैं रोने लगा, माँ मैंने जानबूझकर नहीं मारा। मैं ना मारता उसे तो वो मुझे मार डालता बेल्ट से, मार-मारकर। मैं कहाँ जाऊंगा माँ, मुझे डर लगता है.... तू जानती है ना रात को।

माँ ने मेरे माथे को चूमा, कुछ कपड़े और पैसे एक बैग में डालकर दिए। कहा.... भाग जा ! तू यहाँ रहा तो तुझे पुलिस पकड़कर ले जायेगी। मैं खुद पुलिस को जाकर कह दूंगी की मैंने मारा है। तू अब जा यहाँ से, देर मत कर।

मैं निकल गया घर से, उन तंग गलियों से रोते-रोते। रात के 12 बजे थे, मेरा डर, मेरा घर, मेरी माँ सब कुछ पीछे छूट गया। किसी ने ध्यान नहीं दिया, मुझे यूँ रोते हुए, जाते हुए देखकर। कौन देता? सीलमपुर की झुग्गियों में आधे से ज्यादा लोग पीकर गलियों में पड़े रहते हैं और जो घर के अंदर होते हैं, वो अपने बीवी बच्चों को मारने में व्यस्त होते हैं।

14 साल की उम्र में मुझे लगा, मैंने सब कुछ देख लिया। मेरी ग़लतफहमी थी, अभी तो बहुत कुछ बाकी था....

भागते भागते थक गया था मैं, एक पुल के नीचे जाकर सो गया। इतनी गहरी नींद आयी थी मुझे की सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। एक ही रात में सारा डर निकल गया और वक़्त ने मुझे समय से पहले बड़ा कर दिया।

सुबह देखा तो भिखारी अपने-अपने चौराहों पर जाने की तैयारी कर रहे थे और नशेड़ी घोड़े बेचकर सो रहे थे। एक भिखारी ने पूछा..... कौन है रे तू, यहाँ कैसे? घर से भागकर आया है साला, लगता है.......

मैंने कहा मेरे माँ बाप मर चुके हैं, मैं अनाथ हूँ। चाचा-चाची ने घर से निकाल दिया है, इसलिए सड़क पर हूँ। मुझे मालूम था मैं डरूंगा तो दुनिया और डराएगी और वैसे भी मेरे डर को यहाँ प्यार से पुचकारने वाला कोई नहीं था.........

हाँ मैंने झूठ बोला क्योंकि मेरा सच सिर्फ मेरा था।

रघु था उस भिखारी का नाम, और मेरा सुमित.... शुरुआत में बताना भूल गया था।

धीरे-धीरे मैं रघु के साथ इधर-उधर घूमने लगा, भीख मांगने लगा। छोटी-मोटी चोरियाँ भी करने लगा।

भीख मांगने के बाद काम करने का किसका दिल करता है साहब! पैसा कमाने लगा था मैं, तो सोचा सिगरेट और मोबाइल का शौक भी पाल लेता हूं। वैसे भी किसको पड़ी है अब मेरी। पता नहीं मेरी माँ के साथ क्या हुआ होगा, होना क्या है जेल ही गई होगी(मुस्कुराते हुए)।

मैं एक ऐसा मुसाफिर हूँ जिसके लिए हर रास्ता अपना है, लेकिन उन रास्तों की कोई मंजिल नहीं है। कोई घर नहीं, किसी को अब मेरा इंतज़ार नहीं.......

यह मुसाफिर कभी लौटकर नहीं गया फिर उस गली में। माँ ने कसम जो दी थी कभी लौटकर ना आने की।

10 साल बीत गए मुझे घर को छोड़े हुए और मैंने हर वो काम किया, जो मुझे नहीं करना था। इस बात का एहसास था मुझे। 24 साल का हो गया था मैं, अपनी इस जीवन यात्रा में सब कुछ देख चुका था। सोचता था, माँ को अगर कभी पता चला मेरे बारे में तो क्या सोचेगी। कहेगी..... इसी दिन के लिए भगाया था तुझे, तेरे खून का इल्जाम अपने ऊपर लिया था। इससे अच्छा तू जेल ही चला जाता, कम से कम गलत रास्ते पर तो नहीं चलता।

क्या करें पथ से पथिक राह भटक चुका था 

अब ....

आज एक कोठी को लूटने की योजना बनाई है रोहिणी सेक्टर-24 में। बड़े दिनों से रेकी कर रहा था उस घर की। आज मौका अच्छा है। दो बूढ़ा-बूढ़ी रहते हैं घर में और एक नौकरानी। 

नौकरानी को ज्यादा गौर से देखा नहीं मैंने, पर वो भी ज़्यादा जवान नहीं है। मारने का विचार नहीं है किसी को, बस पैसा लेकर भागने का विचार है।

रात के 12 बजे थे, जनवरी की कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। सड़कें सुनसान थी, कुत्तों के रोने की आवाज आ रही थी बस। मैं दीवार टाप कर अंदर पहुंच गया और पीछे की खिड़की के रास्ते अंदर दाखिल हो गया। हॉल में अँधेरा था, एक औरत जमीन पर सोई हुई थी। मैं सीधा बैडरूम में गया, देखा तो खाली था। शायद बूढ़ा-बूढ़ी अपने बेटे के घर गए हुए थे। मैंने मौका अच्छा देखकर सब सामान भरना शुरू किया। मैंने कई तिजोरियों के ताले तोड़े थे, इसलिए यह ताला खोलना भी मेरे लिये बड़ी बात नहीं थी। पैसे और ज़ेवर भर ही रहा था बैग में कि पीछे से मुझ पर किसी ने डंडे से वार किया और मैं गिर पड़ा। वो मुझे डंडे से मारती जा रही थी और मैं उसे एकटक देखता जा रहा था। 

मैं ज़ोर से चिल्लाया माँ.. माँ रुक। पहचान मुझे मैं तेरा सुमित।

वो मारते-मारते रुक गयी और मेरे पास नीचे आकर बैठ गयी। मुझे ध्यान से देखने लगी। मेरे चेहरे को छूकर महसूस करने लगी कि मैं उसका बेटा हूँ की नहीं।

झूठ बोलता है, तू मेरा बेटा कैसे हो सकता है? वो चोरी नहीं कर सकता। वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, मैं भी उसके सीने से लिपटकर रोने लगा। आज इतने सालो बाद मैं रोया था। माँ क्या करता मैं, तेरे बिना कैसे संभालता मैं अपने आपको और क्यों संभालता?

और मैं फूट-फूटकर रोने लगा....

माँ ने कहा उसे 7 साल की सज़ा हुई थी और जब से वो जेल से छूटी थी मुझे ढूंढ रही थी। इन बूढ़ा-बूढ़ी ने मुझे सहारा दिया है। एक दिन भरी दुपहरी में मुझे गाड़ी वाले ने टक्कर मार दी थी। इन्होंने ही मेरी जान बचाई और मुझे अपने घर अपनी देखभाल के लिए रख लिया। बहुत भले लोग हैं ये।

तू इनका सारा सामान तिजोरी में अभी वापिस रख दे और ये जिंदगी छोड़ दे।

जानती हूं तू बहुत दूर निकल आया है पर अभी भी वापसी के लिए एक राह बाकी है। हम यहाँ से कहीं दूर चले जायेंगे और नई जगह जाकर मेहनत से अपनी दुनिया बसायेंगे।

सुमित तुझे कसम है मेरी...

वही कसम, वही सुमित...

ठीक है माँ, तू जानती है तेरी कसम तब भी मैंने निभाई थी और आज भी निभाऊंगा। मैंने सारा पैसा और ज़ेवर वापिस तिजोरी में रख दिए। 

माँ ने कहा...... कल ये लोग वापिस आ जायेंगे, मैं उन्हें बताकर नौकरी छोड़कर कश्मीरी गेट के बस अड्डे पर मिलूंगी तुझे शाम को। तू मेरा इंतज़ार करना, मैंने माँ को अपना फोन नंबर दिया और वहाँ से खाली हाथ चला गया।

मैं सुबह तड़के ही अपना बैग लेकर घर से निकल गया था बस अड्डे के लिए, जानता था माँ शाम को पहुंचेगी। लेकिन मेरा अब उस पुरानी जिंदगी में रुकना नामुमकिन था।

माँ पहुँच गयी शाम को बस अड्डे पर और हमने वहां से हिमाचल, धर्मशाला के लिए बस पकड़ ली।

दो मुसाफिर फिर से एक नयी यात्रा पर जा रहे थे और आँखों में कई ख़्वाब लिए, जिंदगी की तरफ लौट रहे थे......



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