Kanchan Pandey

Drama


4.7  

Kanchan Pandey

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कल-युग में त्याग

कल-युग में त्याग

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हे भगवान कैसी दुनिया आ गई है जीना मुश्किल हो गया है अब मैं इस घर में नहीं रह सकता हूँ।

गीता पीछे पीछे दौड़ती हुई,रुक जाइए यूँ खाना छोड़ कर नहीं जाते हैं।वे तो पागल हो गए हैं मन तो करता है घर से बाहर कर दूँ।

रामा- चुप हो जाओ अब एक शब्द भी उनके खिलाफ बोली तो मैं तुम्हें मायके भेज दूँगा।

गीता- ओहो, मैं क्यों जाऊं मायका, जाना है तो उसकी वह जाए और इतना प्यार आता है तो क्यों थाली फेंक कर आए।

रामा- देखो, इतना दखल मत दे,मैं क्या करता हूँ वह मेरा मन है।

सुखु- क्या रे रामा सुबह हो या शाम तुम्हारे आँगन से वही हल्ला वही हल्ला अब तो हमलोगों का भी रहना मुश्किल हो गया है।

सुखु- हाँ,एक और बात, आजकल दुलारेकान्त दिखता नहीं है क्या हुआ, बीमार है [मुस्कुराते हुए मुँह को कपड़े से ढक लिया ] कि

रामा उलटे पैर आँगन आया और बर्तन में रखे हुए सारा खाना को उठा कर फेंक दिया, हद हो गई बेज्जती की शर्म है भी की नहीं बेशर्म सा पड़े रहते हैं।

दुलारेकांत- क्या हुआ रे रामा, बहुत तमाशा दिखा रहा है जीवन में तुम्हारा बस यही रह गया है इस घर में खाना का कोई इज्जत नहीं है।

रामा- हाँ हाँ इज्जत का तो आपको हीं फिक्र है इसलिए तो ..... कुछ नहीं समझते हैं।

दुलारेकांत- क्या इसलिए, और मैं नहीं समझता,तुमलोगों को पालने में मेरी जिन्दगी बीत गई ठेला खीँच खीँच कर पूरे शरीर में ठेला [गांठ ]हो गया है अपने परिवार को तो कुछ समझे नहीं और मुझे अच्छे बुरे का ज्ञान देते हो दो रूपया तुमने कभी घर नहीं लाए, जब भी कमाने गए घर का पैसे डूबा कर आए हो और खाना का अनादर करते हो।

दुलारेकांत दुलारेकांत कहाँ हैं

मिटठू- दादा दादा मालकिन आई हैं बुला रही हैं।

दुलारेकांत का एक मन हुआ की मिटठू को बोलकर कहला दें कि वे घर में नहीं हैं लेकिन फिर जो जीवन भर नहीं किया वह करके जीवन पर धब्बा नहीं लगा सकता हूँ यह सोचकर।

दुलारेकांत- जी मालकिन क्या हुआ ?

मालकिन- क्या हुआ,बहुत दिन हो गए, गए नहीं

दुलारेकांत- क्या कहे मालकिन अब उम्र हो गई है काम नहीं हो पाता है दम फूलने लगता है शरीर में ताकत नहीं रहा

मालकिन- गीता, क्या सुन रही हूँ दुलारी [दुलारेकांत की पत्नी] के जाने के बाद दुलारेकांत का ख्याल नहीं रखती हो,रामा से तो कोई उम्मीद नहीं है।

ओह !दुलारी थी तब तो सेवा में कभी कमी नहीं की बेचारी घर का सारा काम करके खाना लेकर जहाँ दुलारेकांत रहते थे वहाँ पहुंच जाती थी और दिन भर वहीँ बैठकर आते जाते दुलारेकांत को निहारती रहती थी और शाम में दोनों दो मैना की जोड़ी की तरह साथ- साथ घर की ओर चल देते थे।

दुलारेकांत- वह तो छोड़ गई मुझे अकेले इस दुनिया में अब तो सिर्फ कर्तव्य है जिसका निर्वाह कर रहा हूँ।

रामा- हाँ- हाँ, अच्छा निर्वाह कर रहे हैं, यही तो सिला दिया है मेरी माँ के प्यार का आज उनकी आत्मा भी रो रही होगी।

मालकिन-रामा क्यों ऐसे बात करते हो पिता से, क्या हुआ?

दुलारेकांत- कुछ नहीं मालकिन,मैं कल आऊँगा।

मालकिन- आज क्यों नहीं मैं इतनी दूर से आई हूँ और...,थोड़ी ठहर कर ठीक है,कल आ जाइएगा।

कितने दिन बीत गए लेकिन दुलारेकांत मालकिन के यहाँ नहीं पहुँचे।

मालकिन- क्या समझतें हैं, उस दिन घर तक गई लेकिन यह हुआ कि मालकिन के साथ जाएँ, नहीं आज बताती हूँ।

ठाकुर जी- क्या हुआ? क़िस पर इतना गुस्सा आ रहा है ?

मालकिन- वही राजा साहब, दुलारेकांत

ठाकुर जी- अरे बूढा है बेचारा बीमार हो गया होगा और इतना गुस्सा करके अपनी तबियत ख़राब मत करो।

मालकिन- नहीं -नहीं आज जाकर मैं बताती हूँ कि कैसी- कैसी परिस्थिती में उसके परिवार के लिए मैने क्या नहीं किया है।

घर से निकली हीं थी कि दूर से झूमते हुए दुलारेकांत को देख मन को थोड़ी देर के लिए राहत मिली लेकिन अंदर का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फुट पड़ा,हद करते हैं दुलारेकांत बूढ़े हो गए हैं इसलिए दिमाग काम नहीं करता है।

दुलारेकांत- हाँ हाँ मालकिन आप सही कह रही हैं मेरा दिमाग ख़राब हो गया है, रामा भी यही कहता है यह मेरा कर्म है जो मेरे कारण सभी दुःख भोग रहे हैं, क्या करूँ कुछ समझ नहीं आता है।बहते हुए आँसू को छिपाकर पोछ लिए।

ठाकुर जी- पुष्पा [मालकिन] यहाँ आना जब तक वे आतीं।

तब तक ठाकुर जी हीं आ गए।

ठाकुर जी- क्या कर रही हो? बेचारा कितना दुखी लग रहा है और तुम,यह ठीक बात नहीं है कि तुमने विषम परिस्थिती में उनकी मदद की लेकिन उसने भी जीवन भर हमारे परिवार की सेवा की जब बुलाते थे दुलारेकांत आ जाते थे अब उम्र हो गया है बेटा भी नालायक है।

मालकिन- यही बुरी आदत है आपमें कि समय परिस्थिती देखते नहीं और किसी के सामने मुझे हीं भला बुरा कहने लगते हैं,अब आप हीं काम कराइए मैं चली।

अब मालकिन की गुस्सा का रुख मालिक की तरफ हो गया 

दुलारेकांत- अरे क्यों गुस्सा कर रही हैं क्या करना है।

दुलारेकांत अपने काम में लग गए लेकिन अचानक एक आवाज ने उन्हें विचलित कर दिया और बिना कुछ बताए वह ना जाने कब चले गए।

मालकिन को लगा कि हो सकता कोई कारण से इधर उधर गए होंगे लेकिन कई घंटों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह चले गए हैं यह बात मालकिन के गुस्से की आग को हवा दे गई,अब बहुत हो गया यही एक मजदूर नहीं है जब भूख से मरने लगेगा तब एक कौड़ी से मदद नहीं करुँगी स्वयं में बुदबबुदाते हुए सभी सामान को समेटने लगीं।

कई दिन बीत गए लेकिन मालकिन के मन की आग की लपटों ने धधकना कम नहीं किया था,दुलारेकांत के उस दिन के व्यवहार ने मालकिन को चैन नहीं लेने दे रहा था कि कब दुलारेकांत सामने आए और वह उसको अपनी क्रोध रूपी यज्ञ में उनकी आहुति दे सकें लेकिन मौका नहीं मिल रहा था।

एक दिन सुखु मौका देखकर मालकिन के घर पहुँच गया

सुखु- मालकिन बहुत दुःख में हूँ कुछ दिनों के लिए कुछ रूपए दे देती तो आपकी मेहरबानी होती आपलोग तो बड़े लोग हैं।

पुष्पा [मालकिन ]-नहीं नहीं, एक तो मेरे पास रूपये नहीं है दूसरा रहता भी तो तुम्हें कभी नहीं देती, बड़े तो आपलोग हैं।

सुखु- क्यों मालकिन,

मालकिन- क्यों का बात हीं छोड़ दो और ....कभी एक काम की आशा नहीं तुमसे, एक दुलारेकांत थे पता नहीं उसे भी क्या खजाना हाथ लग गया है।

सुखु मन हीं मन खुश हो गया क्योंकि उसके काम बनने के आसार दिख गया था अब तो नब्ज हाथ में थी वह बोल पड़ा।

सुखु- मालकिन अब आप भूल हीं जाइए,अपने दुलारेकांत को और आप तो कितनी ज्ञानी हैं देखिए घर बैठे समझ गई अब वह वह दुलारेकांत नहीं रहा और सही में खजाना हाथ लग गया है।

पुष्पा [मालकिन ]-लाटरी वाटरी लगी है क्या? और आप का दुलारेकांत कहना बंद करो अब बताओ भी क्या बात है।

मालकिन की मन की उत्सुकता बढ़ते देख सुखु के मन में लड्डू फुट रहे थे, काम बनता दिख रहा था।

सुखु- क्या बताएं मालकिन हमारे समाज में तो थू थू हो रहा है कोई विश्वास नहीं करेगा कि वही दुलारेकांत है हे भगवान रहना मुश्किल हो गया है रात दिन परिवार में किचकिच, ऐसा परिवार होता है क्या ?

पुष्पा [मालकिन] ने कुछ रूपये हाथ में पकड़ाते हुए, अब बोलो और नहीं बोलना तो .....कुछ रूक कर जाओ मेरा दिमाग ख़राब मत करो

सुखु- मत गुस्सा कीजिए मालकिन बड़ी शर्मनाक बात है आपका, नहीं- नहीं दुलारेकान्त दूसरी औरत ले आया है, सोचिए दुलारी के गए अभी दिन हीं कितने हुए हैं क्या बीत रही होगी बेचारी दुलारी की आत्मा पर और बिना शादी किए, हे भगवान कोई कहने वाला भी नहीं है।

मालकिन को सुनहरा मौका मिल गया अब तो दुलारेकांत की ख़ैर नहीं थी।

शाम के समय मालकिन पहुंच गई चुपके से खाना बना रहे दुलारेकांत के बगल में खड़ी हो गई। क्या हो रहा है दुलारेकांत आजकल यही काम पकड़े हैं क्या यही विचार है सारा सामान निकाल कर यूं हीं छोड़ कर भाग कर चले आए।

आखिर, मैं भी तो सुनु कि क्या बात है,मैने तो बहुत कारनामे सुनी है,अपने मुँह से बोल देंगे तो अच्छा लगेगा।रामा रामा गीता कहाँ हैं सब के सब

दुलारेकांत- वेलोग नहीं सुनेंगे मालकिन कहिए क्या काम है

तब तक गीता आ गई, रामा भी नशे में झूमता हुआ आँगन में आकर खड़ा हो गया।                                     

गीता -जी मालकिन क्या है ?

रामा- प्रणाम मा मा मालकिन।

मालकिन- छि! रामा तुम से बात करना बेकार है और गीता तुम्हें शर्म नहीं आती है ससुर खाना बना रहे हैं और तुम बातें करती फिर रही हो |                                                                  

गीता- मालकिन माफ़ करना शर्म क्या चीज का, शर्म तो इन्हें आना चाहिए बुढ़ापे में ले आए वही बनाकर खिलाए खाना, आप बोलिए माँ जी के जाने के बाद सारा काम करती थी या नहीं इन्हीं से पूछिए।

रामा- छि! मुझसे क्यों मालकिन इनसे पूछिए

दुलारेकांत- छोड़िए मैं कल आता हूँ फिर बताऊंगा |

रामा- कल क्यों आज क्यों नहीं।

मालकिन- मुझे इसमें नहीं पड़ना लेकिन मुझे यह सिर्फ जानना है कि उस दिन आधा अधूरा काम छोड़ कर क्यों भागे आपके पास इसका जवाब है कि आप इतना धोखेबाज निकलेंगे मुझे मालूम नहीं था।

दुलारेकांत- हे भगवान इस जन्म में हीं सब सुनना पड़ेगा मालूम नहीं था| आपको सुनना है ना मालकिन तो मैं कहता हूँ और रामा तू भी चाहता था ना कि मैं यहीं सारी सच्चाई मालकिन को बताऊँ और तुम सुखु भाई टाट{लकड़ी की दीवार ] के पीछे से सुनने की आवश्यकता नहीं है आइए मालकिन यह सावित्री है।

सावित्री नीचे एक चटाई पर कराह रही थी।

दुलारेकांत- इसी के कारण मैं काम पर नहीं जाता हूँ उस दिन की हीं बात देख लीजिए मैं आप के यहाँ गया और इन दुष्टों ने पैर हीं तोड़ दी बेचारी का।अब बताइए कैसे कहीं जाऊंगा।

रामा- बेचारी! यह कभी नहीं, मेरी माँ के गए कितने दिन हुए और आ गई मेरे घर में राज करने।

मालकिन -तुम चुप रहो रामा,मैं बात करती हूँ यह क्या है दुलारेकांत, आपको शर्म नहीं आई पोते -पोती के होते हुए इस उम्र में यह हरकत शोभा नहीं देता है सच तो कह रहा है रामा

दुलारेकांत- मालकिन एक वह सावित्री थीं जो अपने पति के प्राण बचाने के लिए यमराज से लड़ गई लेकिन यह मेरा प्राण बचाने के लिए मुझे दुलारी के हाथ सौंप मेरी जिन्दगी से चली गई।

रामा- इस औरत के कारण मेरी मरी हुई माँ पर झूठा इल्जाम मत लगाइए।

दुलारेकांत- अगर वह तुम्हारी माँ थी तो मेरी पत्नी भी विश्वास नहीं हो तो उस ज़माने के एक हीं इन्सान जिन्दा है| वह विन्देश्वरी काका जाओ ले आओ उनको अगर उनको याद हो।

विन्देश्वरी काका- क्या हुआ दुलारे तुम्हारे बेटे की जिद तो हद कर दी,क्या हुआ ?

दुलारेकांत- काका क्षमा चाहता हूँ क्या ..

रामा- इस औरत को जानते हैं आप ?बीच में बात काटते हुए

विन्देश्वरी- अब तो आँख से भी कम दिखाई देता है,अरे सावित्री तू जिन्दा हो, हे भगवान हमें तो लगा था कि तुम मर गई, वे आश्चर्यचकित हो गए।

रामा- कौन है यह औरत।

विन्देश्वरी-यह दुलारे की पहली पत्नी है तुम्हारा दादा एक वेद था परिवार बहुत सुंदर लेकिन दुलारी को तुम्हारे पिता से प्यार हो गया और दुलारी के पिता माफ करना उस ज़माने का नामी गुंडा था क्या जेल और क्या घर,दुलारी ने तो हद कर दी जब इसके गोद से मासूम रामा को छीन ली थी।तुम इसी सावित्री के बेटे हो इसकी सेवा करो यह तो साक्षात् देवी है इस कलयुग में इतना बड़ा त्याग संभव नहीं।

रामा के होश गुम हो गए नशा जैसे एक मिनट में छूमंतर हो गया, माफ कर दो मुझे माँ,मैं अभागा मुझे जब भगवान यह मौका दे रहे हैं कि मैं अपनी माँ की सेवा कर सकूं तब मैं हीं दुश्मन बन गया माफ कर दीजिए पिता जी अपने इस निक्कमें बेटे को।

दुलारेकांत- नहीं -नहीं बेटा, मुझे तो भगवान नहीं माफ करेंगे एक विवाहिता स्त्री,एक माँ को जीवन भर मेरे कारण दुःख हुआ, मैं क्यों इतना डरपोक था उस परिस्थिती के आगे झुक गया।

मालकिन- माफ कीजिएगा दुलारेकांत मैं भी अपने धनी होने के घमंड में सोच भी नहीं पाई कि किसी की कोई मजबूरी हो सकती है। कोई धन से बड़ा नहीं होता है मन से बड़ा सबसे बड़ा होता है आपदोनों पति पत्नी से हमें सीख लेना चाहिए परिवार क्या होती है और परिवार के लिए त्याग क्या होती है धन्य हैं आपदोनों और धन्य है आपदोनों का त्याग। 


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