किस ओर
किस ओर
सुधा की ज़िंदगी घड़ी की सुइयों की नोक के अनुसार चलती थी। सुबह पांच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह चकरघिन्नी की तरह घूमती रहती थी। सब काम करके, बच्चों को स्कूल भेजकर, पतिदेव की भी ऑफिस जाने की तैयारी करके, वह स्वयं भी तैयार होकर निकल जाती थी। दोनों कंधों पर एक - एक बैग, लगता था जैसे कहीं सफ़र पर जा रही हो। सफ़र ही तो था। वह एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका थी। अध्यापन उसे पसंद था, बच्चों के साथ और भी मज़ा आता था । बाहर निकलते ही उसने ऑटो वाले को आवाज़ लगाई," भईया, स्कूल चलोगे ?
" बैठिए मैडम जी, पूरे पचास रुपए लगेंगे ।", ऑटो वाले ने भी थोड़ा जोर से कहा। उसे पता था कि सुबह का समय है, मैडम को जाने में देर हो रही है। कुछ कम ज़्यादा नहीं करेंगी। गेट पर पहुंचते ही सुधा ने फटाफट पैसे दिए और तेज़ क़दमों से अंदर की तरफ भागी। "ओहो, इतनी जल्दी सब काम करके भागी, ऑटो वाले को ज़्यादा पैसे भी दिए पर एक मिनट ऊपर हो ही गया।आज तीसरा लेट लग गया।
अब पता नहीं, तनख्वाह कटेगी या सी. एल. जाएगी।", उसने दुखी स्वर में साथी अध्यापिका पूनम से कहा। ' हां यार, दोनों ही हालातों में नुकसान तो अपना ही है ना। कितनी बार काम के नाम पे हमको छुट्टी के बाद भी देर तक रोकते हैं। तब कोई लेट नहीं और न ही उसके एक्स्ट्रा पैसे देते हैं।और हम एक मिनट भी लेट हो जाएं तो तुरंत पैसे काट लेते हैं।", पूनम ने कहा। " हां, दुखता तो है पर जब इन बच्चों के चेहरे देखती हूं तो सब भूल जाती हूं, यहां तक कि अपने निजी दुख भी। इनके साथ खुद को तरोताजा और जवान महसूस करती हूं।", सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा।
इतने में घंटी बज गई और दोनों अपनी - अपनी कक्षाओं की ओर चल दीं। बच्चों ने बड़ी गरमजोशी के साथ उसका स्वागत किया। वह बच्चों की भी चहेती अध्यापिका थी, अभिभावक भी खुश रहते थे और स्कूल वाले भी क्योंकि बहुत मेहनती थी। काफी समय हो गया था, उसे स्कूल में। पर आजकल पहले जैसी बात नहीं रही। एक के बाद एक कोई न कोई घटना ऐसी हो जाती थी जिससे वह दुखी हो जाती थी।
पिछले महीने लेट होने के कारण उसकी एक दिन की तनख्वाह काट ली थी । इस महीने उसे शादी में जाना था जिसके लिए उसने छुट्टी के लिए आवेदन किया था पर उसे एक ही दिन की छुट्टी मिली थीं जबकि अभी उसकी पांच सी.एल. शेष थीं। उसने बहुत प्रार्थना की," मैम, प्लीज़ छुट्टी दे दीजिए । घर की शादी है।" "तुम्हें जाना है जाओ पर तुम्हारी दो दिन की तनख्वाह कटेगी ।", प्रिंसिपल ने कड़े स्वर में कहा। बेचारी सुधा,"कहीं न कहीं तो समझौता करना ही पड़ेगा", बस यही सोचती रही। तनख्वाह कटवाए या रिश्तेदारी, दोनों में ही उसका नुकसान था। घर जाकर पति को बताया तो उसने भी गुस्सा किया। पर सुधा कर ही क्या सकती थी
उसे तो दोनों तरफ ही बना कर चलना था, नौकरी भी तो बचा कर रखनी थी। आजकल के ज़माने में एक की तनख्वाह से खर्चा कहां चलता है? वह थोड़ा सा ही सही पर कुछ तो मदद कर ही रही थी।
अगले दिन स्कूल पहुंची तो पता लगा कि किसी अभिभावक की शिकायत अाई हुई थी। बस, वह उसका स्पष्टीकरण देने में लग गई। झाड़ खाकर बाहर निकली तो सोचने लगी," कौन सी टीचर चाहेगी कि उसकी कक्षा में कोई हादसा हो। वह तो पहले ही सावधान रहती है। पर इसमें भी टीचर का ही दोष निकाल कर सब अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। फंसी रह जाती है बस टीचर । एक टीचर को सब अपना सस्ता और सुलभ साधन मानते हैं । स्कूल में कुछ भी हो उसका ज़िम्मेदार टीचर को ही बनाया जाता है। पढ़ाने के साथ पता नहीं कितने अतिरिक्त काम करते हैं, उन्हें स्वयं ही पता नहीं होता। बस कठपुतली की तरह काम करते रहो, नाचते रहो। कामों की कोई गिनती नहीं होती। गिनती होती है तो बस शिकायतों की, लेट आने की, छुट्टियों की। किस ओर जाए बेचारी अध्यापिका जिनकी सुरक्षा और अधिकारों के लिए न कोई कानून है और न ही कोई आचार संहिता।"
