Ila Jaiswal

Drama Romance


4.0  

Ila Jaiswal

Drama Romance


यह कैसा रिश्ता ?

यह कैसा रिश्ता ?

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“प्यार को सब लोग महिमा मंडित करते रहते हैं| प्रेम की पवित्रता , महानता , ताकत,हिम्मत , जोश , अचम्भे आदि की कहानियों से इतिहास, वर्तमान सब अटा पड़ा है | प्रेम तो ईश्वर का वरदान है, प्रेम में दुनिया को बदलने की ताकत है, दुनिया को झुकाने की ताकत है |” यह सब देख-सुन कर सुहाना का तो दिमाग फटने लगता है | “सब बकवास है | ऐसा कुछ नहीं है और न होता है | यदि सचमुच ऐसा होता तो कोई प्रेम में किसी को धोखा नहीं देता , किसी का दिल नहीं तोड़ता, एसिड नहीं फेंकता | ऐसा तो कम ही होता है जब दोनों पक्ष अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्यार का नाटक कर रहे हों या एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हों | अधिकतर किसी न किसी एक पक्ष का प्यार तो सच्चा होता ही होगा | पर कितना ? प्रेम की पराकाष्ठा विवाह होता है | कुंवारेपन का प्यार, किशोरावस्था का प्यार , लड़कपन का प्यार सब अलग अलग होते हैं | कुछ सफ़ल हो जाते हैं तो कुछ असफ़ल | सफ़ल प्रेम की क्या परिभाषा होती है ? सफ़ल प्रेम को मापने का क्या पैमाना है ? कुछ तो होता ही होगा , तभी तो प्रेम को सफ़ल या असफल कहा जाता है | कुंवारे लोगों के प्यार की सफलता विवाह होने से आंकी जाती है | जिसे चाहा उसे पा लिया , हो गया प्यार सफ़ल | विवाहित लोगों के प्रेम की सफलता कैसे आंकी जाती है ? बच्चे हैं, घर कैसा है , रहते कैसे हैं , लड़ाई-झगड़े होते हैं या नहीं आदि-आदि | अगर यह सब अच्छा है तो मतलब विवाह सफ़ल, प्रेम सफ़ल | पर क्या यही प्रेम की सफ़लता है ?” वह सोचती रही | “उसकी गृहस्थी में हर वह चीज़ है जिस पैमाने से गृहस्थी को सफ़ल कहा जाता है | दो बच्चे , बढ़िया घर, ऐशो-आराम , कामयाब पति जिसे पत्नी से कुछ नहीं कहना होता | पर फिर भी क्या उसका प्रेम सफ़ल है ?” उसका मन हमेशा एक ही उत्तर देता है ,’नहीं’| “भगवान ने औरत का मन गूगल से भी तेज बनाया है जिसे सब पता होता है , समय से पहले पता चल जाता है | सब कुछ सूंघ लेती है औरत की छठी इन्द्रिय | वह भी एक औरत है तो भला वह कैसे इस गुण से अछूती रहती ? उसे भी सब पता लग जाता है जो वह जानना चाहती है वह भी और नहीं जानना चाहती वह भी | कई बार उसे गुस्सा आता भगवान पर , अपने ऊपर ,क्यों भगवान ने उसे यह गुण दिया ? अगर एक औरत बिना इस गुण के रह जाती तो क्या आसमान टूट पड़ता ? नहीं चाहिए , उसे यह गुण | यह उसे धीरे-धीरे दीमक की तरह खाए जा रहा है | वह खुश होना चाहती है, सब कुछ भूलना चाहती है पर नहीं भूल पाती | रह-रह कर उसका नारी सुलभ मन, उसकी लालसाएं जागृत हो जातीं किंतु हर बार उसका मन मरुभूमि की तरह शुष्क ही रह जाता | एक स्त्री की क्या इच्छा होती है ,’प्यार करने वाला पति, प्यारे बच्चे ,छोटा सा घर |’ इन सब के होने के बाद तो वह अपनी किसी भी चाह पर अंकुश लगा सकती है , कोई भी दुःख झेल सकती है ,किसी भी अभाव के साथ रह सकती है|” इसकी कमी होने पर ही वह खुद को ठगा सा महसूस करती है | इसमें भी उसकी सबसे पहली चाहत उसका पति होती है जिसके साथ वह कोई समझौता नहीं कर सकती | जिस पति के साथ सात फेरे लेकर, अपना सब कुछ छोड़कर , अंध विश्वास करके उसके पीछे चली आती है ,उस की कमी को वह कैसे बर्दाश्त कर सकती है ? अपनी घर-गृहस्थी को संभालने में वह इतनी व्यस्त हो जाती है कि अपने सपने, इच्छाएं , आकांक्षाएं आदि सब का त्याग कर देती है | इस त्याग करने को वह अपना धर्म समझती है और पूरे मन से उसे निभाती है फिर चाहे उसे कितनी ही तकलीफ़ क्यों न हो पर वह अपने चेहरे पर एक शिकन भी नहीं आने देती | किसी ने क्या खूब कहा है –“जिस घर को बनाने में,सँभालने में एक औरत अपनी उम्र लगा देती है उस घर की तख्ती पर उसका नाम भी नहीं होता | बच्चे अपने पिता के नाम से जाने जाते हैं और वह भी श्रीमती _____ बन कर ही निहाल हो जाती है | उसका कोई नाम नहीं | वह तो नींव के पत्थर की तरह अपनी गृहस्थी की ऊँची अट्टालिका को मजबूती से जकड़े रहती है | आजकल की औरतें भले ही शारीरिक श्रम कम करती हों पर मानसिक श्रम का किसी को अंदाज़ा भी नहीं क्योंकि वह दिखता नहीं | ऐसे में उसका सिर्फ एक अरमान होता है उसके पति की प्यार भरी नज़र , उसके कंधे पर पति का हाथ, एक मुस्कान | अपने बेमोल श्रम का इतना प्रतिफल तो उसे मिलना ही चाहिए | आख़िरकार सब कुछ पति का ही तो है, उसकी वंशबेल आगे बढ़ रही है , उसकी गृहस्थी , उसका घर ...| इन सब के लिए ही तो आई है पत्नी | जो पत्नी ऐसा नहीं करती , सारी दुनिया उसे बुरा-भला कहती है , स्वार्थी कहती है और उसके पति के लिए सब सहानुभूति रखते हैं | पर जो पत्नी ये सब कुछ करती है और बदले में उसे पति का प्यार न मिले तब भी दुनिया औरत को ही ज़िम्मेदार ठहराती है कि ज़रूर उसमें ही कोई कमी है वरना अपनी इच्छा पूर्ति के लिए पति क्यों घर के बाहर जाए ?” वह तो ऐसा कुछ भी नहीं करती , पति के हर फैसले में उसकी स्वीकृति होती है, कोई हस्तक्षेप नहीं करती , कोई सवाल नहीं करती, कहाँ जाता है ,किससे मिलता है आदि-आदि | बल्कि वह पूरे तन-मन से उसका ध्यान रखती है फिर भी उसका पति उसका क्यों नहीं है ? इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिलता | इसका जवाब किसी और के पास होगा भी नहीं क्योंकि इसका जवाब उसका पति ही दे सकता है और वह उससे बात ही नहीं करता | वह उससे कितनी ही बातें करने की कोशिश करती पर उसके पति का जवाब या तो होता ही नहीं या ठंडा जवाब कि उसके बाद सुहाना का बात करने का मन ही नहीं करता |

सुहाना अपनी सहेली स्नेहा से यह सारी बातें कर ही रही थी कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी | उसके पति नीरज का फोन था | सुहाना ने फोन उठाया और सामान्य आवाज़ में ‘हेलो’ कहा |

“खाना खा लिया ?”

“हाँ|” नीरज बोला |

“और?” सुहाना ने पूछा |

“बाय|”

नीरज ने बाय का जवाब सुने बिना ही फोन काट दिया |

 “अरे यह क्या ? ऐसे कौन बात करता है ? इससे ज़्यादा बात तो पडोसी का भी हाल पूछने में ही हो जाती है |” स्नेहा ने कहा |

“अरे , ऐसे ही होता है | शादी के दस सालों में प्यार खतम और बातें सिर्फ काम की या ज़रूरत की होती हैं | गप्पें नहीं होती और न ही दिल की बात |”

“कितने कमाल की बात है न , जिससे दिल लगाया उससे ही दिल की बात नहीं होती |”

“नहीं स्नेहा , यह बात ऐसे कहो कि न उससे दिल मिलता है और न ही बात होती है और न ही मन होता है |”

“ऐसे क्यों बोल रही हो ? तुम तो बड़ी रोमांटिक हो और तुममें क्या कमी है सुंदर,होशियार ,प्यार में समर्पित | ऐसी ही पत्नी की तो चाह रखते हैं पुरुष |”

“सब बकवास है | मुझे न प्यार पर विश्वास है और न लोगों की कही बातों पर |पुरुष हर बात सिर्फ अपने फायदे को ध्यान में रखकर ही कहता है | हकीकत इससे उलट है | उन्हें ऐसी पत्नी इसलिए चाहिए जिससे उनकी आज़ादी में, मनमानी में कोई खलल न पड़े | उन्हें सुंदर,समर्पित पत्नी चाहिए पर होशियार , जमाने के साथ कदम मिलाने वाली तो बिलकुल नहीं चाहिए |”

“क्या बात कर रही हो ? ऐसा नहीं है |”

“अच्छा , तुम्हें मीता याद है|”

“हाँ|वह तो बिलकुल सीधी-सादी| ”

“जी, उसके पति का किसी के साथ अफेयर था | जब मीता को पता लगा तो उसके पति ने उससे माफ़ी मांग ली और फिर कभी ऐसा न करने का वादा किया | पर कुछ दिनों के बाद जब मैंने उसे फिर उसे पति के अफेयर के बारे में बताया तो उसने मुझे ही झाड़ दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं है | वह अपनी किसी कुलीग के साथ होगा| अब तुम मुझे बताओ क्या हाव-भाव से पता नहीं चलता कि आपका सामने वाले के साथ कैसा रिश्ता है ?”

“बिलकुल पता चलता है |”

“पर मीता का पति अभी भी उसे बेवकूफ बना रहा है क्योंकि घर पर वह एकदम सीधा बन कर रहता है | समय-समय पर उसे तोहफे ला कर देता है, घुमाने लेकर जाता है और कभी उसकी तारीफ़ कर देता है | बस वह उसी में निहाल हुई रहती है |”

“वहीं मिताली , आजकल के ज़माने की लड़की | उसका पति भी उसको धोखा दे रहा था | उसके पति ने भी उससे माफ़ी मांगी और फिर कभी ऐसा न करने का वादा किया | मिताली ने उसे माफ़ तो कर दिया पर सावधान भी हो गई | नतीजा कुछ ही समय में उसके पति की पोल-पट्टी खुल गई | आज दोनों अलग हो गए | अब तुम ही बताओ , दोनों बातों में क्या अंतर है ? दोनों में पुरुष का व्यवहार समान था किंतु स्त्री का नजरिया अलग था | एक में तलाक नहीं हुआ और एक में हो गया | अब समझी पुरुष होशियार पत्नी क्यों नहीं चाहता या आजकल के स्मार्ट लोगों के रिश्ते ज़्यादा क्यों नहीं चलते |”

स्नेहा सोच में पड़ गई |

“यह सब छोड़ , अपनी सुना | तू भी क्या अफेयर ,तलाक की बातें ले कर बैठ गई |”

“मेरा क्या ? मैं भी इसी दुनिया में रहती हूँ | बस चल रहा है | तू बता , अचानक मेरी याद कैसे आ गई और एकदम ही मिलने चली आई |”

“मैं तुझसे नीरज के बारे में बात करने आई थी |”

“नीरज के बारे में क्या बात करने आई थी ?”

“मैंने नीरज को किसी लड़की के साथ होटल में देखा और उनकी भाव भंगिमा बता रही थी कि वे कुलीग नहीं हैं |”

“अच्छा|” सुहाना ने ठंडे स्वर में जवाब दिया |

“तू ऐसे शांत कैसे है ? चेहरे पर कोई भाव नहीं , बता , कुछ तो बोल |”

“मुझे पता है, बस तुमने आज इस बात की पुष्टि की है |”

“पता है, फिर तूने नीरज से बात की ? क्या कहा उसने ?”

“नहीं, मैंने कोई बात नहीं की और न मुझे करनी है ?”

“पर क्यों ?तू उसकी पत्नी है वह तेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता | फिर तूने उसके साथ क्या कमी कर दी , कौन सी कसर छोड़ दी जो वह किसी और के साथ अपना समय बिताता है | तू भी तो उसे दिलो-जान से चाहती है , उसकी हर बात पे बिछने को तैयार रहती है , तूने उसके लिए क्या कम कुर्बानियां दी हैं जो वह आज बेवफा हो गया है |”

“मुझे नहीं पता | वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? किसके साथ उनका अफेयर है ? कब से चल रहा है ? मेरे लिए उनका क्या फैसला है ? मेरे साथ रहना चाहते हैं या छोड़ना चाहते हैं ? मुझे कुछ नहीं पता और न मुझे जानना है ?”

“पर क्यों ? यह सब जानना तेरा हक़ है |”

“हक़, कौन से हक़ की बात कर रही हो ?जो हक़ छीन कर लिए जाते हैं न उनका कोई मोल नहीं होता | प्यार में हक़ दिए जाते हैं छीने नहीं जाते | मेरे मन ने , मेरी छठी इन्द्रिय ने मुझे बहुत पहले ही यह अहसास करा दिया था कि अब वे मेरे नहीं रहे | लेकिन मैं अभी भी खुद को उनका ही मानती हूँ |आजकल के ज़माने में प्यार की ऐसी बातें पागलपन ही कही जाएँगी | पर मैं क्या करूं ? मैं थक चुकी हूँ| मैं समझ चुकी हूँ कि कमी मेरी नहीं है , कमी उनकी है , वे मेरा बन कर नही रहना चाहते | मेरी सुंदरता, होशियारी, समझदारी की बातें सब करते हैं पर तुम्हे पता है कि मेरी यह सारी बातें घर में धूल फांकती हैं | मैं कैसी लग रही हूँ , क्या कर रही हूँ , इससे किसी को कोई मतलब नहीं | मैं प्यार के दो बोल को तरसती रहती हूँ | पर मैं क्या करूं ? प्यार भीख थोड़े न है और न ही आप ज़बरदस्ती किसी को अपने से प्यार करने के लिए मजबूर कर सकते हो ? यह तो मन से होता है | जब आपका मन ही नहीं किसी से प्यार करने का तो कोई क्या कर सकता है ?”

“पर ऐसे रहना भी तो कोई समझदारी नहीं | एक बार बात तो कर |”

“नहीं , इससे कुछ नहीं होने वाला | अगर उसको मेरी इतनी ही फ़िक्र होती तो मुझे घर में रखकर किसी और के पास क्यों जाते ? उसको पत्नी सिर्फ नाम के लिए चाहिए | तो यही सही |”

“तेरी जिंदगी का क्या ? ऐसे ही रहेगी क्या ? अपने मन को कब तक मार कर जिंदा रहेगी ?”

“पता नहीं , ऐसा कब तक चलेगा ?अपने आप को बहुत काबू में रखती हूँ | आसान नहीं है मन में दुःख और होठों पर मुस्कान रखना | मुझे तो यह भी नहीं पता कि मेरी गलती क्या है ? जहाँ तक मैं सोचती हूँ मैंने हमेशा उनकी हर इच्छा का ध्यान रखा है , उनको देवता की तरह पूजा है मैंने | इतना प्यार किया कि जितना किसी को नहीं किया पर उन्हें मेरा प्यार न रास आया और न समझ आया | कोई किसी को कैसे प्यार करता है , मुझे नहीं पता | जब आस पास लोगों को देखती हूँ तो मुझे लगता है कि यह सारी खूबियाँ तो मुझमें भी हैं पर अंत में एक ही बात रह जाती है फिर मेरा पति मेरा होकर भी मेरा क्यों नहीं है ? हमारा रिश्ता इतना खोखला क्यों है ?”

“पर सुहाना, तुझे कुछ तो करना ही होगा | हिचकोले खाती नाव कब तक तैरेगी ?”

“पता नहीं | कभी कभी मन आता है अपनी जान दे दूँ | पर उसमें भी सोचती हूँ कि पुलिस इन्हें तंग करेगी | किसी ने सच ही कहा है कि औरत को उससे शादी करनी चाहिए जो उसे प्यार करता हो , उससे नहीं जिसे वह प्यार करती हो | अगर आदमी को यह आभास हो जाए कि वह औरत उससे प्यार करती है तो वह उसके साथ खेलने लग जाता है फिर चाहे वह प्रेमी हो या पति | मैंने अपने पति को बहुत प्यार दिया , बदले में उसने मुझे क्या दिया , धोखा |”

तभी घंटी बजती है | सुहाना ने दरवाज़ा खोला , उसका पति नीरज था | दरवाज़ा खोलकर वह वापिस अपनी सहेली स्नेहा के पास बैठ गई | स्नेहा ने कहा ,” जा , उसे पानी- वानी दे दे | कुछ हाल चाल पूछ | पहले तू उसके आगे-पीछे घूमती थी | ”

“अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं रह गई , स्नेहा | मैंने कितने नखरे उठाए, पूरे मन से प्यार किया पर फिर भी वह मेरे प्यार में बंध न सका क्योंकि उसको मेरा प्यार स्वीकार ही नहीं करना | पहले मैं कोशिश करती थी अपनी तरफ़ खींचने की , अब वह भी नहीं करती क्योंकि थक चुकी हूँ| जिंदगी को और उन्हें , वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकार कर लिया है | रह गई बात बेरुखी की तो वह भी उनका ध्यान रखने के लिए ही करती हूँ | बेवफाई करने का कोई बहाना भी तो चाहिए | मेरा प्यार, समर्पण उनको कोई बहाना ही नहीं दे रहा तो मेरी बेरुखी से उन्हें बहाना तो मिल गया कि मेरी बीवी मेरा ध्यान ही नहीं रखती तभी तो मुझे अपने जीवन में कोई तीसरा चाहिए | जीवन कट ही जाएगा उनका घर के बाहर और मेरा घर के अंदर |सब ऐशो आराम घर में जुटा ही दिए हैं उन्होंने |मैं भी लड़ाई-झगड़ा न करके घर में शांति बनाए रखती हूँ | एक गृहणी के जो फ़र्ज़ होते हैं निभा रही हूँ और वे भी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटते बल्कि अच्छे से निभाते हैं | बस इस घर में नहीं है तो पति-पत्नी का रिश्ता , एक सफ़ल प्रेम |” 

स्नेहा से कुछ कहते न बना , बस अवाक् सुहाना को देखती रह गई और प्यार के इस नए रूप को...|



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