Prafulla Kumar Tripathi

Abstract Action Inspirational

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Prafulla Kumar Tripathi

Abstract Action Inspirational

ख़ुद को ढूंढ़ने निकला !

ख़ुद को ढूंढ़ने निकला !

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कारवां गुजर गया 

साल 2015 की शुरुआत में ही 4 जनवरी की सुबह समाचार आया कि गोरखपुर में मेरे घर के सामने की माता जी (मक्खू बाबू की पत्नी ) का देहांत हो गया है। जाना चाहता था किन्तु नहीं जा सका क्योंकि उसी बीच दिल्ली भी जाना था। वर्ष 2010 में जब से मेरे दाहिने हिप ज्वाइंट का री- रिप्लेसमेंट हुआ तब से मुझे हर साल फालो अप के लिए अपने चिकित्सक के पास दिल्ली जाना होता है। सो वर्ष 2015 की 16 तारीख की रात में हम लोग नई दिल्ली के लिए रवाना हुए। वहां मैक्स में डा. एस. के. मार्या से चेकअप करवा कर, बेवज़ह कुछ शापिंग करते हुए हमने वापसी के लिए रात की लखनऊ मेल पकड़ ली। अभी यात्रा का क्रम जारी था। 6 फरवरी को अपने श्वसुर जी के साथ हमलोग अब बरेली वाराणसी एक्सप्रेस से वाराणसी की यात्रा पर थे। वहां मेरे दूर के ससुराली एक रिश्तेदार श्री नरेंद्र मिश्र की पुत्री की शादी थी। डी .एल.डब्ल्यू. के गेस्ट हॉउस में ठहरने को मिल गया। 7 को अपाला (बेटी)और अनुराग की शादी अटेंड करके हम 8 की काशी विश्वनाथ से वापस चल दिए। वहीँ मेरी फुफेरी बहन बड़ी गैबी, वी.डी.ए.कालोनी,महमूरगंज में रहती थीं किन्तु वहां जा नहीं सके।  

मेरे बेटे मेजर दिव्य इन दिनों 631 EME बटालियन वर्कशाप झांसी में नियुक्त थे। उन्होंने अभी तक सेना में रहते हुए बी.टेक ., एम्.टेक. के अलावे अनेक कोर्स यथा -ADP (SAP), YTO, OAME-67,JC-141,WCC-94,डिप्लोमा इन Jr.Def.Mgt. कर लिया था। बावजूद उनके सी.ओ. कर्नल से अच्छे सम्बन्ध न होने की सूचना से हम व्यथित थे। सेना में अगर सीनियर नाराज़ हुआ तो समझिये कि आपकी शामत आ गई। कोई अफसर फिर आपकी मदद नहीं किया करता है। इसी विषम परिस्थिति में दिव्य फंस चुके थे। मैंने कुछ अनहोनी को भांप लिया किन्तु हम असहाय ही तो थे ! 

 आगे चलकर लगभग वैसा ही हुआ,उन्हें सेना के उच्च पद पर प्रमोशन में अनेक रुकावटें आई ...जिसकी कहानी आगे के के कालखंड में लिखूंगा। मीना मेरी पत्नी,जो केन्द्रीय विद्यालय कैंट लखनऊ में उन दिनों कार्यरत थीं, को ग्वालियर के किसी वर्कशाप में जाना था और मैं भी बच्चों के पास रहने के लिहाज़ से उनके साथ 4 अप्रैल 2015 को 12593 लखनऊ भोपाल गरीब रथ पर सवार हो लिया। लगभग आठ दिनों तक मैं झांसी में रहा। मीना ग्वालियर में अपना वर्कशाप अटेंड कर लीं। झांसी पहले का घूमा हुआ था फिर भी एक दिन हमलोग झांसी किला,सेंट ज्य्यूड शाइन,गंगाधर राव की छतरी,बरुआ सागर झील,सिपरी बाजार आदि देखने और बाज़ार घूमने गए। बेटे ने जीप दिला दी थी और साथ में पौत्र दर्श भी थे। एक दिन हमने टैक्सी करके ओरछा की भी सैर की। ओरछा फोर्ट,चतुर्भुज मन्दिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, ताऊजी की कोठी, हनुमान मन्दिर, शहीद स्मारक आदि। जाने क्यों पुत्रवधू और पुत्र के सम्बन्धों में भी कुछ असामान्यताएं महसूस  किया। अन्ततः हमलोग 12 अप्रैल की दोपहर ग्वालियर बरौनी मेल से वापस चल दिए। अब लखनऊ वापस आते ही इस बार अगली यात्रा यूरोप की निर्धारित हुई और हमनें इसके लिए Cox & King के मोहम्मद अली की सेवायें लीं। खर्चों का विवरण कुछ इस प्रकार आया –

Tour Cost(Per Person Twin Basis) - 2,28,730 (Discount – 35,000/-) After Discount- Rs 1,93,730 Compulsary 1500,GST 3.50%6,833 कुल 2,02063-00 . कुछ औपचारिकताओं की शुरूआत हुईं और वीसा के लिए हमें दिल्ली जाने का परामर्श मिला। 13 मई को मैं, मीना kk किरन,अविनाश जी और किरण दिल्ली में थे। विदेश जाने की कल्पनामात्र से हम सभी रोमांचित थे। नेहरू इन्क्लेव में ब्रिटिश वीसा की औपचारिकता  हुई। मो.साहिल और मि.विक्रम का सहयोग मिला। हमलोग किरण की छोटी बहन के यहाँ सामान रखकर नाश्ते के बाद चले आये थे। शाम के चार बज गए और तय हुआ कि किसी बाज़ार में चलकर कुछ खा पी लिया जाएगा। रात की ट्रेन से वापसी हुई। आश्वासन मिला कि एक हफ्ते में वीसा चला जाएगा। एक हफ्ते बाद भी जब मेरे एक पार्टनर (अविनाश जी)का वीसा नहीं आया तो हमारी परेशानी बढ़ती गई। Cox & King के बड़े अधिकारियों (हेड आपरेशन फ्रेंचाईज़ी,मिस रसप्रीत कौर सकारिया,कस्टमर सर्विस सेल के,मि.रफीक,विनोद डोगरा आदि से सम्पर्क साधने का भी कोई लाभ नहीं मिला और हमारी पूर्व निर्धारित इस पहली विदेश यात्रा योजना को ग्रहण लग गया। वीसा ना मिल पाने की वज़ह से अंतत यात्रा कैंसिल हो गई और प्रति व्यक्ति 25,479 रूपये का कैंसिलेशन चार्ज हमें देना पडा। कुछ सप्ताह बाद वीसा आ गया और फिर अगली तारीख 27 जून से 8 जुलाई तय हुई। मि.अनिरुद्ध काक्स एंड किंग के मनी एक्सचेंजर ने यूरो और डालर मुहैय्या करा दिए। उत्तम दादा कलाकार, मेरे रेडियो मित्र ने यूरोप के लिए मैट्रिक्स का मोबाईल नंबर दिलवा दिया जो आज भी याद है, 44 74 52 17 91 45 इसके अलावे एक और नंबर साकेत (फुफेरे बहनोई) ने दे दिया था 44 74 66 54 98 57 . हमारा कौतूहल उन्माद पर था|

मिस्टर गुरप्रीत ने सारी औपचारिकताएं करा दी। एक सहयात्री किरन जी का हवाई यात्रा का भय भी चरम पर था। वे कतई जहाज़ की सवारी के लिए तैयार नहीं हो रही थीं| हम मायूस थे कि मीना ने अन्तत उनको कुछ गुरूमंत्र दिया। और, वह घड़ी आ ही गई जब हमलोग दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 से एयर इंडिया के बोईंग 777 -300 में 2 बज कर 5 मिनट पर सवार होकर लन्दन के हीथ्रो हवाई अड्डे के लिए रवाना हो चुके थे। कुल 9 घंटे 25 मिनट की यह अद्भुत और रोमांचकारी उड़ान थी। किरन जी को नींद की गोलियां देकर उनको लगभग अर्ध निद्रा अवस्था में हम लोग जहाज़ में सवार करने में सफल हो गए थे।

जब हम हीथ्रो हवाई अड्डे पर रात में लगभग 9 बजे उतरे तो वहां टूर मैनेजर मि. Bryan Azavedo मिले जिन्होंने बहुत अच्छी दो गाड़ियों से हमें होटल "हालीडे इन" पहुंचाया। आगे की यात्रा कुछ यूं थी – दो दिन लन्दन में रुकने के बाद,29 से 1 तक पेरिस में, 1 से 3 तक लेसिन (स्विट्ज़रलैंड) के होटल Alpine Classic Budget में, 3 से 4 लूक्रेन में,4 से 5 AXAMS (होटल Olympia) आस्ट्रिया में,5 से 7 AREZZO में,7 से 8 होटल POSTA PADOVA में,और 8 जुलाई को मिलान के मेल्पेन्सा एयरपोर्टके टर्मिनल 1 से 23-30 बजे एयर इंडिया की फ्लाईट A/122 से दिल्ली की वापसी उड़ान थी।

 मिलान से दिल्ली की सीधी उड़ान 7 घंटे 15 मिनट की थी। विदेश के लिए हम सबने अल्पकालिक ट्रेवेल कार्ड ICICI Bank के ले रखे थे और मेरे कार्ड में 499 यूरो Equivilent to 36,427 @73-भारतीय रूपया और मीना ने 170 पाउंड अर्थात 17,510 भारतीय रूपया @103 भारतीय रूपया तथा मैंने 500 यूरो Equivilent to 36,500/- नकद भी ले लिए थे। उसी होटल में मेरी ट्रिप के अन्य सहयात्री भी ठहरे थे। अगले दिन अर्थात 28 जून से घूमाने का सिलसिला शुरू हो गया। यूरोप के सबसे ऊंचे {440 फिट } लंदन आई, फिर टावर आफ लन्दन, जहां आज भी कोहिनूर रखा है ,फुल ग्लास बिल्डिंग, हैमर स्मिथ एरिया, बोट बिल्डिंग (G.E.Building), विक्टोरिया –600 कि.मी.तक फैली थेम्स नदी,बकिंघम पैलेस और उसमें नित्य गार्ड बदले जाने की रस्म,हाइड पार्क और उसका वह बहुचर्चित स्पीकर कार्नर जहां आप कभी भी स्टूल लगा कर बोल सकते हैं...... आदि जगहों पर हमें ले जाया गया।

 अगली सुबह 29 जून को 8 बजे हम सभी उसी खूब सूरत और सुविधाजनक बस से मय सामान पेरिस की यात्रा पर थे। पूरी की पूरी बस Sortie नामक जगह से चैनल ट्यूनल से पेरिस पहुंचे और हमें Appart City Hotel में ठहराया गया। मैंने कहीं पढ़ रखा था कि पहली Longest Subsea tunnels 1988 में Soikam, जापान में बनी थी जो 53850 मीटर और 176 .67 फिट है और दूसरी फ़्रांस को इंग्लैण्ड से जोड़ने वाली चैनल ट्यूब ट्यूनल जो 1994 में बनी और जो 50,450 मीटर – 165.518 फिट है और हर साल 16 मिलियन यात्रियों का आना जाना होता  है।  पहली जुलाई की सुबह पेरिस से जेनेवा  पहुंचे। अगली सुबह 2 जुलाई समुद्र तल से 3000 फिट की ऊंचाई पर हम स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियर पर थे। वहां तक हम केबिल कार से गए थे। ग्लेशियर का दृश्य मनोरम था। अल्फाइन कोस्टर,आइस एक्सप्रेस,चेयरकार,व्यू प्वाईन्ट,पीक वाक्,2148 मीटर का सस्पेंशन ब्रिज आदि। 3 जुलाई की सुबह 6-30 बजे लुक्रेन की ढाई घंटे की यात्रा CogWheel Train से की। अब हम Jungfrujoch नामक Top Of Europe ग्लेशियर नामक स्थान पर थे।  

4 जुलाई की सुबह 8 बजे Lusan के लिए प्रस्थान हुआ। हमने अपना लंच वाडूस नामक शहर में लिया जो विश्व का पांचवां सबसे छोटा शहर है। लूसन में यूरोप का प्राचीनतम पुल जो अब भी चालू था हमने अपनी आश्चर्यजनक आँखों से देखा और फोटो ली। वहीं सोरोवस्की क्रिस्टल{Led Cross Cristal) के शोरूम भी गए। रात्रि विश्राम ओलंपिया होटल मेंहुआ। सुबह आस्ट्रिया से इटली (टस्कनी )और रास्ते में फ्लोरेंस, ब्रेंटा नदी और Duomo Largest Cathedril of the world हमने देखी। 6 जुलाई 25 डिग्री तापमान सुबह 8-30 बजे हमलोग वैटिकन सिटी,जिसे एक देश का दर्जा मिला हुआ है, में थे।

 एक ओर इटली को जहां फैशन कैपिटल कहते हैं और दूसरी ओर वैटिकन सिटी ईसाई भाइयों का प्रमुख धर्म स्थल है। साफ- सुथरा। गाइड ने बस में ढेर सारे इटली शब्द के मायने बताये। जैसे- I don’t want to steal her thunder, I trust and love you .....रास्ते में सूर्यमुखी के दूर दूर तक फैले खेत मिले। गाइड बोले जा रहा था –Italians are similar to Indians but they are lazy. If you tied their hands they will be dumb. उसने इटली की सडकों पर फर्राटा भर रहीं स्मार्ट छोटी कारें दिखाईं। उसने यह भी बताया कि Papa शब्द से Pope पादरी बना। इसे माफिया भी कहते हैं।  

7 जुलाई, मंगलवार। अब हम राजस्थान होटल में खाना खाकर 1-10 बजे Tuskany में हैं जहां Pisa की तीन Field of miracle tower हैं। हमने सदियों पहले के इस चमत्कार को नमन किया। बताया गया कि भौतिक शास्त्र के वैज्ञानिक गैलीलियो परमात्मा में विश्वास नहीं करता था इसीलिए पोप ने उसे मार डाला और उसी की स्मृति में ये पीसा की मीनारें बनाई गईं। 12-45 बजे हमने Tuskany छोड़ दिया और शाम 4 बजे पदोवा, वेनिस पहुंच गए। राज दरबार होटल में लंच लिया। गाइड ने बताया कि वेनिस की स्पेलिंग Venezia है। याद आया बचपन में पढ़ी गई वेनिस के सौदागर की कहानियां| 

  इस आइलैंड पर यहां से वहां तक पानी ही पानी था।कुछ लोगों ने गंडोला से पानी वाली सडकों पर सैर की। वेनिस और कुछ अन्य जगहों पर लूजियाना (पेशाब करने के लिए )50 सेंट देना पड़ता है। रात्रि विश्राम वेनिस के एक होटल POSTA-77 में हुआ। इस होटल का डबल बेडरूम का एक दिन का किराया 180 यूरो लंच का 22 यूरो और दीनार का 28 यूरो था। पूरी यूरोप यात्रा में पहली बार वेनिस के इस होटल में हमें पंखा मिला। और हां, वेनिस में जगह जगह हमने सेक्स शाप का बोर्ड भी लगा देखा। यहां का तापमान भी 32 डिग्री था। कुल 42 सहयात्रियों के साथ यात्रा अब लगभग अपने अंतिम पडाव पर थी। यहां (Praia) से 18 कि.मी. दूर मिलानो के रास्ते में हमने एक जगह रूक कर ग्रुप फोटो लिया। बस में गाइड ने फीड बैक फार्म भराया। पिंग, पंग, पांग खेल हुआ। गीत संगीत हुआ। गीताली और ईरा नामक दो बहनों ने विदाई गीत गाये। अविनाश जी ने भी गाना गाया।

  हम जब मिलान में थे तो गोरखपुर से भाई साहब प्रोफेसर एस.सी.त्रिपाठी ने सूचना दिया कि उनके पुत्र विपुल आदित्य को द्वितीय संतान पुत्र हुआ है। मिलान बहुत बड़ा देश है और यहां अनेक दर्शनीय स्थल हैं। यहां की सड़कें इतनी अच्छी कि अपनी बस 1-30 मिनट में 1 कि.मी.की दूरी नाप ले रही हैं। शाम 5-16 पर हमलोग मिलान के Malpensa नामक शानदार एयरपोर्ट के टर्मिनल एक पर थे। अब हमारी चेक इन की औपचारिकताएं होनी थीं और वहां के हिसाब से रात 23-30 पर यहां से 6,600 कि.मी. दिल्ली के लिए एयर इंडिया की सीधी उड़ान थी। अब केबिन क्रू मेंबर हरकत में आ चुके हैं और विमान के पायलट जगमोहन सिंह सोलंकी की आवाज़ हमें सीट बेल्ट बांधने का आदेश दे रही थी। अब हम दिल्ली की सीधी उड़ान पर थे। हालांकि जहाज तो बहुत अच्छा था लेकिन परोसा गया रास्ते का खाना एकदम घटिया मिला।

  अगली सुबह हम दिल्ली में थे। 9 जुलाई मेरे विवाह की वर्षगांठ थी और हम लोग यूरोप की यात्रा समाप्त करके शाम 16-45 की गो एयर फ्लाईट से लखनऊ की उड़ान पर थे। घर आकर देखा पर्स में पौंड के 150 करेंसी नोट,फ्रैंक के कुछ सिक्के,390 यूरो नकद और कार्ड में 480 यूरो बचे रह गये हैं जिसे बाद में हमने वापस करके भारतीय मुद्रा ले लिया। अथ श्री यूरोप यात्रा कथा ! 

वैसे आप मेरे इस विषय पर लिखे और छपे यात्रा लेख को भी पढ़ सकते हैं।

ज़िंदगी का कारवाँ चलता चला जा रहा है।इन पंक्तियों को आप तक पहुंचाते हुए आधुनिक काल के महाकवि में शुमार नीरज जी की वे पंक्तियां एक बार फिर मन में उभर रही हैं, जानना चाहेंगे कौन सी ?......

”-नींद भी खुली न थी की हाय धूप ढल गई,

पांव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,

पात-पात झर गए कि शाख- शाख जल गई,

चाह तो निकल सकी न पर उम्र ही निकल गई,

गीत अश्क बन गये, छंद हो गये दफन, 

साथ के दिए धुंआ- धुंआ पहन गये, 

और हम झुके -झुके, मोड़ पर रुके- रुके,

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे .... “।

एक - एक करके रेडियो के संगी साथी अब मुझे भूलते जा रहे हैं। अब तो आकाशवाणी लखनऊ के कंसर्ट आदि के कार्ड भी मुझे भेजने की आवश्यकता वे लोग नहीं समझते है। शायद यही जीवन है। अब मैं अपने परिजनों,कुछ मुहल्लेवासियों, पत्र-पत्रिकाओं और मोबाईल-लैपटाप की दुनियां में सिमटता जा रहा हूँ। हाँ, लेखन शीर्ष पर है।  दो तीन पुस्तकों को अंतिम रूप दे रहा हूँ। लेकिन कभी कभी लगता है कि ऐसे जीवन से क्या लाभ जो संकुचन की ओर हो ?

 अम्मा मेरी ज़िम्मेदारी की एक अंग हैं इसलिए मुझे लगभग हर महीने गोरखपुर जाना ही पड़ता है। पहली अगस्त 2015 से 5अगस्त तक गोरखपुर रहा। इस बीच 7 मैके.इन्फैन्ट्री से उनके सालाना जलसे में शामिल होने का निमंत्रण मिला। हमलोग हावड़ा -अमृतसर एक्सप्रेस से 9 सितम्बर की शाम को अम्बाला के लिए रवाना हुए। अगले दिन सुबह 5 बजे अम्बाला पहुंच कर हमें पटियाला ले जाने के लिए आर्मी की जिप्सी मिली। हमें बताया गया कि पटियाला का नामकरण कुछ यूं हुआ था – Patti = A strip of law, Ala = Maharaja Ala Singh और यहाँ के पग (Turban) फुलकारी,परांडा (पराठा), और जूत्ती मशहूर हैं। हमें 601 EME Bn Offr.Mess में ठहराया गया।

  सुसज्जित दो कमरे में थे। एक कमरे में बुक शेल्फ में ला मार्टीनियर स्कूल लखनऊ के छात्र रह चुके मुकुल देव की आतंकवाद पर पुस्तक Major Lashkar,और Saleem must die और कर्नल नरिंदर कुमार PVSM,AVSM की लिखी किताब नीलकंठ- The first Ascent थी जो मैंने सरसरी नज़र में पढ़ डाली। कर्नल नरिंदर कुमार, तेनजिंग नोर्गे के बाद पहले भारतीय थे जिन्होंने 28,300 फिट की ऊँचाई 1976 में त्रिशूल एक्सपीडीशन में की थी।

  कुछ और पुस्तकें देखीं- The Indian Army- A Brief Histry By Maj,Gen.Ian Cardozo, आदि। सी.ओ.कर्नल राहुल सिंह राठौर और उनकी पत्नी नीता राठौर,पुराने सी.ओ. कर्नल एल. पी. सिंह, ब्रिगेडियर संजीव शर्मा, नायक मुकेश कुमार,जवान अनिल कुमार आदि ने हमारा भरपूर ख़याल रखा। एक युवा लेफ्टिनेंट विकास खत्री जाने क्यों अपनी ढेर सारी मानसिक व्यथाओं को लेकर हमारे पास अक्सर जुटा रहा। हम दोनों तीन दिनों तक पटियाला में अपने शहीद बेटे के संगी साथियों के साथ रहे। योजना पटियाला से एयरफोर्स स्टेशन हलवारा भी जाने की थी जहाँ ग्रुप कैप्टेन विपुल मिश्रा नियुक्त थे किन्तु जा नहीं  सके।  

  12 सितम्बर को लंच लेकर हमें उसी जिप्सी ने अम्बाला पहुंचाया और वहां से हमने रात में 11 बजे अमृतसर हाबड़ा पकड़ कर लखनऊ की वापसी यात्रा की। ऎसी यात्राओं से जाने क्यों बेटे यश की स्मृतियों में उबाल आ जाता है,उसकी कमी और ज्यादा खलने लगती है।

30 सितम्बर को गोरखपुर गया और 4 अक्टूबर की सुबह लौट आया।  वहां सब कुछ ठीक था। नवम्बर आते आते बड़े बेटे दिव्य के बीमार होने और झांसी के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती होने की सूचना मिली। हम लोग इंटर सिटी से 9 सित० को रात में उनके चामुंडी।  इन्क्लेव कैंट स्थित आवास पर पहुंचे। पता चला कि वे दो दिनों से बीमार हैं और अस्पताल में हैं। अगली सुबह हम उन्हें देखने गए। वे फील्ड से लौटे थे और उन्हें सीवियर ब्रांकाइटिस हो गया था। इतना ज्यादा इन्फेक्शन हो गया था कि आई.सी.यू. में लाईफ स्पोर्टिंग सिस्टम पर उन्हें रखा गया था। उनके सी.ओ. कर्नल त्यागी से तनावपूर्ण सम्बन्ध तो थे ही इसलिए उन्हें कोई बड़ा अफसर देखने भी नहीं आ रहा था। सेना की इस अन्दरुनी राजनीति में हम असहाय थे। बस, भगवान् से प्रार्थना करते रहे कि वे जल्द ठीक होकर घर लौटें। तीन चार दिन बाद वे घर लौटे और तब हमलोग लखनऊ वापस आये।

 ज़िंदगी का कारवां आगे बढ़ता जा रहा था। 15 नवम्बर को छोटी बहन प्रतिमा और बहनोई राकेश के आफर पर सड़क मार्ग से मैं गोरखपुर गया। अगले दिन वे लोग तो चले आये किन्तु मैं वहां 20 नवम्बर तक रहा। मुझसे बड़ी एक बहन डा. विजया द्वारा बिना किसी की जानकारी के अम्मा से अपने और अन्य के पक्ष में “विल” करा लेने पर चर्चाएं हुईं और यह तय हुआ कि एक रिश्तेदार को बीच में डालकर एक नया विल बनवाया जाय। कुछ वकीलों की सहमति लेकर वैसा ही कराया गया।  

  पाठकों सच मानिए संभवतः उस दशक का यह सबसे कठिन दौर चल रहा था जहां मैं और मेरे बड़े भाई एक तरफ जिन्हें पैतृक संपत्ति से अलग कर दिया गया था और वे षड्यंत्र कारी लोग एक तरफ थे। हम दोनों भाइयों को गोरखपुर के घर से बेदखल करने की साज़िश रची जा चुकी थी।

 यह तो तय हो चुका है कि अब मुझे गोरखपुर को छोड़ ही देना होगा। मैं भी ऐसी अप्रत्याशित पारिवारिक उलझनों से लगभग तंग हो चुका हूं लेकिन जो थोड़ी बहुत गांव में खेती है उसी के निस्तारण का यक्ष प्रश्न खड़ा रहता है।सुख सुविधा,धन सम्पत्ति से सम्पन्न विजया बहन की इस धोखाधड़ी के चलते उनसे सम्बन्ध सामान्य नहीं रह गए थे।

 दिसम्बर में मीना की छुट्टियों में इस बार उनकी मित्र किरन और उनके पति अविनाश जी के साथ शिरणी के साईं बाबा के दर्शन का कार्यक्रम बना। 17 दिस.को पुष्पक से अगले दिन दोपहर में लगभग 3 बजे हमलोग मनमाड पहुंचे। वहां से 60 कि.मी. की यात्रा हमने सडक मार्ग से टैक्सी से की।

  पहुँचते ही होटल में सामान रखकर हाथ मुंह धोकर दर्शन की लाइन में लग गए। देर रात में दर्शन हो सका। बाहर आकर भोजन करके शिरडी में रात्रि विश्राम किया गया।अगली सुबह एक बार फिर सुबह की आरती में शामिल हुए और ब्रेकफास्ट लेकर वापस पुष्पक ट्रेन पकड़ने के लिए मनमाड चल दिए। दोपहर 12-30 पर ट्रेन मिली और अगली सुबह लखनऊ आ गए।

 इस साल की अंतिम यात्रा में 25 दिस. की रात फरेंदा के मूल निवासी अपने साढू श्री ओमप्रकाश मणि त्रिपाठी,सेवानिवृत्त डिप्टी एस.पी. के साथ गोरखपुर जाना हुआ और नए साल की पहली जनवरी को वापस लखनऊ आ गए। किसी ने ठीक ही कहा है-

“उम्र बीत गई लेकिन,

सफर ख़त्म न हुआ।

इन अजनबी सी राहों में जो,

खुद को ढूंढ़ने निकला !”


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