Ragini Sinha

Abstract


4.3  

Ragini Sinha

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खोइचा तेरे प्यार का

खोइचा तेरे प्यार का

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सुबी अपने बालकनी में बैठी शाम में चाय का आनन्द उठा रही थी।अमित रूम में गाना के साथ चाय का आनन्द उठा रहा था। तभी सुबी के कानों में विदाई वाली गीत गूंज उठी।

"पापा मैं छोटी से बड़ी हो गयी क्यों,

पापा के निगाहों में,ममता की बाहों में,

कुछ दिन और रहती तो क्या बिगड़ जाता ।

पापा मैं छोटी से बड़ी......."

अचानक ही सुबी को माँ पापा की यादें आने लगी।भाई बहन सब के सब,और अतीत में खो गयी।

याद है उसे जब विदाई के वक्त सुबी पापा का पैर पकड़कर कितना रोई थी।उसके आंसू रुक नहीं रहे थे।उसे रोता देख अमित के आंसू भी निकल पड़े थे। माँ ने आँचल में अरवा चावल,हरी दुब (एक प्रकार का घास),हल्दी की डंठल,पँचमेबा,जीरा,नेग(रुपये) आदि बांध कर कमर में कस दी।जिसे खोइचा कहते है।भाई बहन सबसे कैसे गले मिलकर रोये जा रही थी।माँ, चाची,भाभी ,दीदी सबने मिलकर सजल आंखों के साथ डोली में बिठाया था।बैठने के बाद फिर से एक बार माँ से लिपट गयी,जैसे माँ से कितनी दूर जा रही।फिर भी बेमन से डोली में बैठ माँ पापा के आंखों से ओझल होती गयी।अमित ने अपने शरारत और चुहलबाजी से सुबी को रोते रोते हँसा भी दिया। कब ससुराल पहुँची पता भी नहीं चला।


सास ननद सबने मिलकर खूब स्वागत किया नई बहू का।ससुराल में आते ही सबसे ऐसे घुल मिल गयी जैसे पहले से ही सबको जानती पहचानती हो। हर दो तीन दिन या हफ्ते में पापा फोन करके जरूर पूछते कैसी हो बेटी,खुश रहो।माँ के आशीर्वाद में इतनी मिश्री घुली होती कि ऐसे लगता जैसे सामने खड़ी हो।


 वक्त गुजरते देर नहीं लगती।कुछ ही सालों बाद सुबी के गोद मे भी एक परी आ गयी।एक औरत की सबसे बड़ी खुशी हासिल की थी।माँ बनने के बाद सुबी अपनी माँ के ममत्व को और भी नजदीक से समझने लगी।हंसी खुशी जिंदगी बीत रही थी सुबी और अमित की।

मम्मी .......मम्मी....मम्मी ???


अचानक सुबी के कंधे पर किसी ने हाथ रखकर झकझोरा। देखा तो सामने बेटी खड़ी थी।सुबी ने पूछा क्यों इतना चिल्ला रही हो???

बेटी ने प्यार से बोला,मम्मी तुम कहा खोई थी!कब से तुम्हारा फ़ोन बज रहा है।मामा का फ़ोन आ रहा है।सुबी ने तुरंत फ़ोन घुमाया,दिल घबरा रहा था ,क्योंकि पापा कई दिनों से हॉस्पिटल में एडमिट हैं।भाई से बात करके हाल चाल पूछ ली ,कोई सुधार नहीं हुआ अभी तक।सुबी को पापा और माँ की बहुत याद आ रही थी।सबसे ज्यादा पापा की,क्योंकि हर 3-4 दिनों में पापा फ़ोन पर खोज खबर लेते रहते थे।इधर जब से हॉस्पिटल में एडमिट हुए है ,तब से पापा से बात करने को तरस गयी थी।उनका वार्तालाप सोच सोच कर रोने लगी।

"हेल्लो, पापा"

"हां बेटी खुश रहो।कैसी हो??"

ये,वो पता नहीं क्या क्या और कितना बात करते थे।कभी कभी अमित को चिढ़ होती थी।

माँ का भी आशीर्वाद याद करके सुबी बस रोये जा रही थी।माँ हमेशा बोलती-"खुश रह बेटी

सदा सुहागन रह,एक से इक्कीस होइह।

आज माँ पापा का आशीर्वाद विदाई वाले खोइचे से कम नहीं लग रहे थे।उनके आशीर्वाद मात्र से ही सुबी के शरीर मे अदृश्य ऊर्जा का आभाष होता।जैसे उसके साथ न होकर भी हर पल उसके साथ हो।

भगवान से प्रार्थना कर रही थी,मेरे पापा को जल्दी से ठीक कीजिये,ताकि मैं उनकी आवाज को फिर से अपने कानों में सुन सकूँ और महसूस करूँ।



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