ख़तों का सुनहरा दौर
ख़तों का सुनहरा दौर
मेरी प्यारी तरु ( एक माँ का ख़त)
बहुत दिन हुए तुम्हारा कोई समाचार मिले हुए। हर दिन तुम्हारे ख़त का इन्तजार करती हूँ। जानती हूँ बेटी, तुम परिवार की जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश में व्यस्त हो। एक समय मैं भी व्यस्त रहती थी जब तुम और कृष्णा छोटे थे, स्कूल जाते थे। अब सोचती हूँ तो लगता है वो दिन कितने सुन्दर और बेहतरीन थे तरु जब तुम दोनों मेरे आँगन में मेरी नज़रों के सामने खेलते,लड़ते और पढ़ते हुए उस चन्द्रमा की तरह जीवन में शीतलता भरते हुए मन के कोने - कोने में मुझे अनमोल सुख दिया।
कभी - कभी मैं भी इतनी खोई रहती थी तुम दोनों के साथ और इस गृहस्थी के बीच की अपनी माँ को यानी तुम्हारी नानी को समाचार नहीं भेज पाती थी। वो पढ़ी - लिखीं भी नहीं तो घर से आने - जाने वालों के हांथ कुछ मिठाइयाँ और कुशल मंगल बता देती थीं। हाँ जब वो ज्यादा परेशान होती हमारी कुशलता को लेकर तो खुद पहुँच जाती थीं मुझसे लड़ने या यूँ कहूँ अपनी फ़िक्र को विराम देने।
आज तुम भी उन्ही सुनहरे दिनों से गुजर रही हो तरु यह शौभाग्या की बात है। एक माँ के रूप में इतना
समर्पण स्वाभाविक है जो तुम कर रही हो।
लेकिन, एक बात मुझे खटक रही है की तुमने आगे की पढ़ाई पुरी तरह बन्द कर दिया है जबकी आत्मनिर्भर बनने का,अपने पैरों पर खड़े होने का वादा किया था तुमने तरु।अपनी शिक्षा व्यर्थ मत करो पुरी करो। आज के जमाने में स्वालम्बी होना कितना जरूरी है इसका अंदाज़ा तुम अपनी नानी और मुझे देख कर लगा सकती हो। दामादजी बहुत सुलझे हुए इंसान हैं वो अवश्य पुरा सहयोग करेंगे। तरु सम्पन्न घराना मिलना अलग बात होती है और अपनी पहचान बनाना अपने अस्तित्व से न्याय करना होता है। भविष्य के लिए लिए हम सबको थोड़ी तैयारी जरूर करनी चाहिए।
अपनी बुआ नीरजा को ही देखो। कितना बड़ा घराना था उनका। लेकिन तुम्हारे फूफा के बाद बेटों ने सब कुछ तुम्हारी फुआ से चिकनी और मीठी बातें कर के अपने नाम करा लिया और आज वो बेचारी अच्छा खाने और पहनने के लिए ही नहीं मान सम्मान और दो अच्छी बोल के लिए भी तरस रही हैं। तरु बेटा मैं ये सब इसलिए कह रही हूँ तुम इतनी सबल और साहसी बनो की किसी भी परिस्थिति में ना कमजोर पड़ो। हमारा भी हौसला मज़बूत रहेगा अगर तुम इतनी काबिल कामयाब बनोगी। मेरी बात पर गौर जरूर करना और जल्दी जवाब देना।
खुश और स्वस्थ रहो मेरी बच्ची
तुम्हारी माँ अरुणा।।
