ख़ामोश एहसास.....
ख़ामोश एहसास.....
आज जब मोहल्ले में रूढ़ीवादी रीती रिवाज़ो के नाम पर चर्चा चली तो मेरा मन उन पुराने गलियारों मैं चला गया जब किसी स्त्री का रिवाज़ो को तोड़ना किसी जुर्म से कम नही होता था अपनी हकीकत को एक कहानी का नाम देकर अपने उस गुजरे पलों को फिर से रूबरू करने चली हु मैं हकीकत को अपने मन के पन्नो पर से इन कागज के पन्नो को रंगने लगी हु में एक 6 साल की बच्ची की नींद खुलती हैं , वो देखती हैं उसके पास कोई भी नहीं है, पर बहुत आवाज आ रही है ... इधर-उधर वो उस आवाज की तलाश करती हैं जो उसे बेचैन करती हैं..... तभी वो देखती है ये आवाज तो उसकी अपनी माँ की है, वो और बेचैन हो जाती हैं,वो समझने की कोशिश करती हैं पर उसे कुछ समझ नहीं आता.... समझ पा रही है तो बस इतना.... मेरी मां रो रही है जो हमारे आस-पास रहने वाले है वो लोग घर आ रहे हैं.... पर क्यों ये उस नन्हीं बच्ची से परे था..... वो हिम्मत कर अपनी मां के पास जाती हैं और चुप होकर अपनी मां का आंचल पकड़ सहमी सी खड़ी हो जाती है.... उसको इतना समझ आ रहा है बस मेरी मां रो रही है.... थोड़ी देर बाद घर पर बहुत सारी बर्फ लाई जाती हैं और उस पर उसके पापा को लेटाया जाता है.... सफ़ेद चादर से ढका जाता हैं.... फिर वहां सब उसकी मां को बैठाया जाता हैं ... ये सब क्या हो रहा हैं उसके समझ से परे हैं.... कुछ घंटों बाद उसके पापा को ले जाते है.... सब कहे रहे है उस बच्ची से तू रो पापा बोलकर रो, पर उसके गले से कोई आवाज नहीं निकलती ..... वो अपने छोटे भाई की उंगली पकड़कर एक कोने में सहमी सी खड़ी होती हैं..... अचानक से उसका वो छोटा भाई उल्टियां करने लगता है .... वो मां जो अब तक रो रही थी वो अपने आंसुओं को पोंछकर अपने उस छोटे बच्चे को संभालने जाती हैं उसको साफ करती हैं पानी पिलाती हैं अपने गले से लगा लेती है थोड़ी देर में उस लड़की को भी उल्टी आती हैं और वो मां को कहती हैं..... दिन पर दिन बीतते गए हर समस्या आती उसकी मां उसे परेशान दिखती , हर बात को वो सुनती पर समझ नही पाती थी पर आज समझ आया ये रूढ़ीवादी परंपराएं तो उसकी मां कब से तोड़ चुकी हैं.... पंद्रह दिन मैं वापस नौकरी पर जाना.... समाज के लोगों का विरोध करना और मेरी मां का जवाब देना जाने वाला चला गया पर मेरे पास दो बच्चे है उनकी परवरिश कौन करेगा .... मुझे उन्हें पालना है तो नोकरी पर जाना मेरे लिए जरूरी है ..... समाज को जवाब देना की जाओ जिसको इतनी तकलीफ हो रही है वो बैठे मेरे पति के नाम से और शोक मनाए मैं तो मेरे बच्चों के लिए जाऊंगी नौकरी के लिए...... अकेले हम भाई बहन को पालना अच्छी शिक्षा देना और उनकी जिम्मेदारी को सही से निभाना ...... जाने कितनी मजबूरी मेरी मां कै सामने आई होगी और उन्होंने कितनी निडरता से कितने हौंसले से उन्होंने हर परम्परा को तोड़ा होगा आज याद कर रही हूं तो जो बाते तब समझ नही आई थी आज वो हर बात समझ रही हूं ...... आंखों से अश्रु निकल रहे है मन में मां की पीड़ा का दर्द समझ रही हूं पर होठों पर हल्की मुस्कान और चेहरे पर अपने मन में मां के लिए गर्व हो रहा हैं की मैं उस मां की बेटी हूं जो अपने संघर्ष से खुद भी आगे बढ़ी और अपने बच्चो को भी अच्छे संस्कार दिए.... हा मेरी मां ये सब परम्परा को तोड़कर अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए हमारे परवरिश की और आज उस मुकाम पर बैठा दिया कि वो विरोध करने वाले लोग आज उनको सम्मान की दृष्टि से देखकर अपना सर उठाकर उनकी प्रशंसा करते हैं ....... #
