कैंसर

कैंसर

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"रिर्पोटस अच्छे नहीं है, आपको जल्द ही सर्जरी करवानी होगी।"

अनुपम सर पकड़ कर बैठ गया, हैरान-परेशान जिसे वह मामूली पेट दर्द समझ इलाज करवाने अस्पताल में दाखिल हुआ वह गालब्लैडर का कैंसर निकलेगा उसने कभी सोचा भी न था। हमेशा हँसने-खिलखलाने वाले इन्सान के साथ ऊपर वाला यह साजिश कर रहा था। अनुपम के मन में ढेरों सवाल उपजने लगे, भगवान ! मैंने तुम्हारी भक्ति की फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों ? मुझे बुलाने की जल्दी क्यों, अभी मेरे बच्चे छोटे हैं, उनका क्या होगा।

पत्नी ने पति की पीड़ा को भाँप लिया व ढांढस बंधाते हुए कहा, "तुम मत घबराओ...हम इलाज करवायेंगे, जहाँ-जहाँ होगा, वहाँ ले जायेंगे तुम्हें।"

सारे टैस्ट के बाद सी टी करवाने के बाद डॉक्टर्स ने यह निर्णय लिया की जल्द ही सर्जरी कर गालब्लैडर को निकाल देंगे फिर कीमो द्धारा कैंसर के सैल्स को नष्ट करेंगे।

लेकिन सर्जरी के दौरान पता चला की कैंसर गालब्लैडर से होते हुए पेट के अन्दर फैल चुका था जिसे सर्जरी से नहीं निकाल सकते। उसे वह टैस्ट रिपोर्टस से पहले चरण का कैंसर मान रहे थे वह अन्तिम चरण में था। बायोप्सी रिपोर्टस से भी यह पुष्टि हो चुकी थी कि उसे मैटास्टेटिक्स कैंसर है। जब तक हो सका परिजनों ने उसकी बीमारी कितनी फैल गयी है छिपाया फिर डाक्टर्स के कहने पर अनुपम को यह बताना ही पड़ा कि वह गालब्लैडर नहीं निकाल पाये और उसके पास अपनी जिन्दगी का बेहद कम समय बचा था।

सारा परिवार सकते में था। यह क्या हो गया। भागती-दौड़ती जिन्दगी पर मानों विराम लग चुका था। वह दिन प्रतिदिन चिढ़चिढ़ा होता गया। सबकी चिन्ता और कुछ न कर पाने विवशता में अनुपम की झुंझलाहट बढ़ने लगी। बीमारी व तनाव दोनों हावी होने लगे। सभी परेशान व दुखी।

जल्द ही कीमो ट्रीटमेन्ट भी शुरू हो गया। परिजनों का एक पैर घर में तो दूसरा अस्पताल में होता। जितने लोग मिलते-जुलते संवेदना प्रकट करते। कुछ सहयोग करते तो कुछ कन्नी काटते। जिन लोगों के लिए हमेशा सहयोग रात-दिन अनुपम ने वक्त दिया अब वह दूर रहने लगे। बीमारी आयी तो साथ अपने परायों में भेद को भी समझा गयी।

अनुपम को समझ आने लगा जिन लोगों को वह अपना समझ हक जताता था ! वह उससे कितने दूर हैं, लालच रिश्ते नातों को अपने करीब लाना चाहता रहा, कुछ पास आये भी जिन्हें कुछ उम्मीद मिली।

जो परिवार बिखरा था वह फिर से जुड़ने लगा, उससे सहानुभूति से या फिर उसके किये उपकारों के बदला चुकाने के लिए या फिर सेवा के बाद कुछ मिलेगा इसलिए । इन सब में पत्नी व बच्चों की मानसिक और शारिरिक तकलीफों को समझने वाला कोई न था। परिजन भी उन्हे कहते ध्यान रखों पर वह उन्हें कैसे समझाते ,जिस इन्सान ने खुद ही सर्वोपरि मान अपना दबदबा पूरे परिवार पर कायम रखा आज उसे अपनी बीमारी के कारण उत्पन्न हुई स्थिति से कितनी मानसिक पीड़ा हो रही थी।

जैसे-जैसे कीमों के चरण चलते .....अनुपम की परिवार के साथ कभी जीने की उम्मीद बंधती तो कभी टूट जाती, कभी उसे लगता कि वह बामारी से चल रही उसकी जंग में जीत जायेगा तो कभी लगता शायद यही अन्तिम समय हो ! कैंसर मानो उसके साथ साथ पूरे परिवार को हो गया हो !


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