आखिर क्यों ??

आखिर क्यों ??

32 mins 820 32 mins 820

" क्या माँगती हो भगवान से पूजा पाठ कर ! " पूजा गृह से वापस लौटी सन्जना पर तंज कसता हुआ नवीन मुँह टेढ़ा कर मुस्कुरा रहा था।

सन्जना उसका व्यंग्य समझ गयी लेकिन खामोशी से अपने काम में लग गयी, क्या कहती वह ! कुछ पल के लिए ही सही मंदिर में भगवान की मूरत देख वह अपना हर दर्द भूल जाती फिर हिम्मत जुटा अपने दिन की शुरूवात करती। उसकी खामोशी देख नवीन तिलमिला गया वह उसे बर्दाश्त नही कर पा कर पा रहा था कोई न कोई बहाना खोजता उससे लड़ने का हर दिन काम में मीन मेख निकालता ताकि उसे घर से और अपनी जिन्दगी से निकाल फेंके लेकिन उसकी हर चाल उल्टी पड़ती घर वालों ने उसे सर चढा रखा था। नवीन कोशिश करता कि सब उससे नफरत करे लेकिन वह अपनी इन कोशिशों में विफल रहा।

रात दिन उसके दिमाग में यह जदोजह्द चलती रहती कैसे अपने और पालुमी के रास्तें की सन्जना रूपी दीवार को गिरायें उसे कामयाबी नही मिल पा रही थी , उसकी हर चाल उल्टी पडती ..दिन पर दिन उसकी झुंछलाहट बढ़ती गयी।

लैपटॉप पर पालुमी से वीडियों चैट करते नवीन की सारी रात बीत गयी दोनो की नजदीकियाँ बढ़ती ही जा रही थी। दोनो के शहरों में दूरियाँ बहुत थी लेकिन नेट ने इनकी दूरियों को कम किया था।

"वह इतनी आसानी से तुम्हारा पीछा नही छोड़ेगी आखिर क्या कमी है उसे अपने घर जाकर भी रह सकती है जब तुम उसे पंसद नही करते तो तुम्हारी जिन्दगी में चली क्यों नही जाती। "

'तुम शांत हो जाओ पालोमी मै कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लूंगा अपनी जिन्दगी से तो क्या इसे दुनियां से ही मिटा दूंगा बड़ी सती सावित्री बनती है क्या मै नही जानता जब मै बाहर टूर पर जाता था तो क्या गुल खिलाती थी। जब से तुम मेरी लाईफ में आयी हो पालुमी मै जीने लगा हूँ वरना तो मेरे स्वार्थी परिवार वालों ने मेरा जीना हराम किया हुआ था बस हर वक्त पैसा चाहिए इन्हे , मेरी कोई परवाह नही !

मतलबी है सबके सब। "

लैपटॉप की स्क्रीन पर पर पालुमी अपनी कातिलाना

मुस्कान फेकती है अपने निवस्त्र शरीर पर हाथ फेरती हुई कहती , " मै तो कब की तुम्हारी हूँ पर तुम्ही ने देर की हुई है | " उसकी आदाओं से नवीन पागल हुआ जाता है, " तुम फ्रिक न करो मै जल्द ही इसे घर से निकाल दूंगा फिर उसके बाद तुम यहाँ होगी मेरे इस घर में इस कमरे में इस बिस्तर पर हमेशा के लिए |"

' ठीक है अब मै सोने रही हूँ तुम भी सो जाओ कल फिर मिलेगे। ' पालुमी ने अपना पुरा हुस्न नवीन के सामने परोस दिया जिसे संवारने के लिए नवीन अच्छी खासी रकम उसके बैंक एकाउन्ट में जमा करता था जब भी मौका मिलता उससे मिलने पहुंच जाता।

....

आभागी सन्जना इस बात को अच्छे से समझ चुकी थी कि उसका पति उसका है ही नही लेकिन परिवार वालों की मान मर्यादा के चलते वह खामोश रहती कहती भी तो किससे अपनी बीमारी से लाचार उसके सुंदर चेहरा कुम्हला गया था उस पर बच्चों का पालन पोषण और परिवार जनों की सेवा में खुद को समर्पित कर वह ससुराल में तो सम्मान पा चुकी थी लेकिन पति की चाहतों के आगे उसकी एक न चल पायी उसकी जली कटी सुनना और मार खाना यही उसने अपनी नियति मान हालातों से समझौता किया हुआ था।

...

बेटी को ट्यूशन से घर वापस लेकर लौटी सन्जना पर नवीन बहाना बनाता हुआ भडकने लगा ..." कहाँ गयी थी हीरोईन बन कर अपने यारों से मिलने "....

सन्जना ने कोई जवाब न दिया वह समझ चुकी थी नवीन फिर उससे लडने के मूड में है सारी उसने लैपटॉप पर गुजारी है यह उसका कमरा देख सुबह ही समझ गयी थी लेकिन उससे उलझने वक्त बर्बाद न कर घर के काम में लग गयी ...नवीन पर तो पालुमी के ईश्क और हुस्न का नशा चढा था | किसी भी तरह सन्जना खुद ही से घर चली जाये या खुद उससे तलाक ले ले, इसके लिए आज फिर वह उसे उकसाना चाहता थी बिना वजह अनाप शनाप शब्दों की बौछारें करने लगा | " रन्डी जवाब नही दे रही " और सन्जना को बालों को जोर से पकड खींच घर के बाहर ले आया ..".साली बार बार पूछ रहा हूँ कहाँ गयी थी बता नही रही बहुत ऐंठ आ गयी है "...बेटी भागते हुए बाहर आयी पापा मम्मा को क्यों मार रहे हो वह तो मुझे लेने गयी थी और जोर से रोने लगी बेटी को रोता देख नवीन कुछ होश में आया ..."मै पूछ रहा हूँ जवाब नही दे रही रही इसलिए मारा इसे हरामखोर को। "

कहता हुआ नवीन घुमने चला गया।

"मम्मा आपने पापा को बताया क्यों नही क्यों मार खायी अगर मै बता देती तो वह तब भी मारते बेटा। "

वह बच्चों से क्या कहती उनका पिता क्या कर रहा है अपना दर्द भुल सन्जना ने बेटी के आँसु पूछ सीने से लगा लिया बच्ची रोते रोते कहने लगी ...." मम्मा आप यहाँ से दूर चलों हम यह घर छोड कर चले जायेगे | पापा गन्दे है। "

' ऐसे नही कहते बेटे '! सन्जना ने जब पिता के प्रति बच्ची के मन में नफरत का भाव देखा तो वह सोच में पड़ गयी आखिर क्यों नवीन ऐसा क्यों करता है लैपटॉप पर सारी रात क्या करता है ... बच्चों के कोमल मन पर कितना गहरा बुरा असर पड़ रहा होगा सोच कर वह सहम गयी साथ ही कुछ फैसला लेने के लिए सोचने लगी।

अपनी सारी हिम्मत जुटा सन्जना चुपचाप नवीन के कमरे में गयी और उसका लैपटॉप खोल देखने लगी आखिर वह क्या करता है जैसे ही उसने गुगल हिस्ट्री चेक की तो जो कुछ उसे दिखा उसके होश उड़ गये

नवीन इस हद तक गिरेगा वह कभी सोच भी नही सकती थी तभी वह उसके साथ ऐसा बर्ताव करता है अपनी हवस के लिए वह एक बजारू औरत को घर में रखने को तैयार हो गया।

उसने ठान लिया कि वह अब और बर्दाश्त नही करेगी क्रोध से उसका र्सवांग काँप रहा था।

उसने घर में सबकों बताया और अपना फैसला भी

सभी सकतें में थे। काम करने के बहाने कई कई दिनों तक घर से बाहर रह नवीन यह गुल खिला रहा था सबके सर शर्म से झुक गये।

नवीन की माँ गु्स्से से भर गयी , " आज इसे आने दो बहु पर तोहमते लगाता है खुद क्या कर रहा है यह पूरा घर बर्बाद कर दिया इसने |"

तभी देवेन भागा हुआ आता है ..."माँ ! भाभी जल्दी चलों! "

क्या हुआ देवेन ! "माँ भैया का एक्सीडेन्ट हो गया उन्हे हॉस्पिट्ल में ले गये है। मै बाजार में था मुझे मेरे दोस्तों ने बताया जल्दी चलों"

सन्जना भी अपना गुस्सा भुल गयी, " क्या ! भैया ! जल्दी चलों |"

सब हॉस्पिटल पँहुचते है वहाँ बेड पर खुन से लथपथ नवीन पड़ा था बेहोश।

माँ जोर से चिल्लायी , " यह क्या हो गया ! " वह लगभग बेहोश होने को थी सन्जना की भी रूलाई फुट पड़ी नवीन को इस हाल में नही देख सकती थी भले ही उसने उस पर कितने भी जुल्म किये हो।

डॉ0 ने बतलाया की एक्सीडेन्ट में गंभीर चोटे आयी है उन्हे सर्जरी करनी होगी , अधिक देर नही कर सकते वरना नवीन की जान पर खतरा हो सकता है काफी खुन बह चुका है उसे ऑपरेशन थियेटर ले गये।

नवीन का भाई रो रहा था उसने ही बताया कि भैया बहुत तेज गाड़ी चला रहे थे उन्होने बहुत ड्रिंक की हुई थी नशे में वह खुद को और गाडी को संभाल नही पाये तेज गति से सामने से आ रहा ट्रक उनकी गाडी जा टकरायी उसकी स्पीड इतनी तेज थी पूरी गाड़ी चकनाचूर हो गयी बड़ी मुश्किल से लोगो ने गाड़ी से बाहर निकाला।

"तुम चुप हो जाओ देवेन सन्जना ने ढांढस बंधाया तुम्हारे भैया ठीक हो जायेगे कुछ नही होगा उन्हे |"

" तुम ठीक कहती हो बहु बुरा ही सही बेटा है वो मेरा उसको ऐसे हाल में नही देख सकते है!" बेबसी उनके चेहरे से साफ झलक रही थी दोनो हाथों कों जोड भगवान से प्रार्थना करनी लगी ," हे भगवान उसके गुनाहों को माफ कर दे ! "

तभी ऑपरेशन थियेटर से एक डॉक्टर बाहर आता है सभी उसकी तरफ बढते है , " कैसा है मेरा बच्चा माँजी ने डॉ0 पूछा , " थोडी देर हो गयी यहाँ लाने में मरीज की दोनो टांग काटनी पडेगी नही तो बचाया नही जा सकता एक्सीडेन्ड में पूरी तरह से कुचल गयी है ! "

क्या ! माँ यह सुनते ही बेहोश हो गयी देवेन ने उन्हे संभाला भाभी, पापा आप यही रहो मै माँ को घर छोड कर आता हूँ इन्हे यहाँ रखना ठीक नही है |"

" तुम जाओ मै देख लूंगी!" सन्जना ने खुद को संभालते हुए कहा।

" क्या करना है आप अपना निर्णय जल्द बताये"

"आप पापा जी से पुछ लीजिए"!

सन्जना ने ससुर की ओर इशारा करते हुए कहा उसकी रूलाई फूट पड़ी ससुर ने कहा , " खुद को संभालो सन्जना, होनी को कौन टाल सकता है |"

'आप वही कीजिए जो उचित हो डॉक्टर , '

'ठीक आप यहाँ साईन कर दीजिए |'

नवीन के पिता ने बुझे मन से साईन तो कर दिया पर दुख का पहाड़ जो उनके परिवार पर टूट पड़ा था, उसे उन्होने समझ लिया था | वह बच्चों के आगे कमजोर नही पडना चाहते थे इसलिए अपने आँसुओं को अपने अन्दर जज्ब कर गये और अस्पताल में रखे सोफे पर निढाल पड़ गये। सन्जना समझ नही पा रही थी कि क्या करे।

....

ऑपरेशन हो चुका था नवीन बेहोश था उसकों दुसरे रूम में शिफ्ट कर दिया गया, सिर्फ एक ही व्यक्ति रूम में रहे डॉक्टरस ने बोल दिया था सन्जना रो रही थी ससुर ने सांत्वना दी।

"चुप हो जाओ बेटा होनी पर किसका बस चला है भगवान की शुक्र मनाओ वह जीवित तो है वर्ना तो जिस तरह उसका एक्सीडेन्ट हुआ था उसे देख वह जिन्दा भी बच भी पाया यही गनीमत समझों मै तुमसे क्या कहुँ उस नालायक ने जो सलुक तुम्हारे साथ किया आज तक उसी का फल मिला है उसे। अब अपाहिज की जिन्दगी जीयेगा |"

सन्जना ने अपने ससुर का चेहरा देखा वह गुस्से और नफरत के साथ साथ दयनीय स्थिति में थे।

सन्जना ने कहा , "ऐसी बात नही है पापाजी बस वह भटके हुए है वर्ना पहले उनका व्यवहार मेरे प्रति ऐसा न था |"

" यह तो सही कह रही हो बहु तुम नवीन पहले ऐसा न था उसकी बुरी संगति ने ही उसे इस हाल में पहुँचाया है ईश्वर उसे अब सही राह दिखाये |"

तभी देवेन के साथ नवीन के दोनो बच्चे भी आ पहुँचे

" पापा कैसे है मम्मा बताओं न |"

'ठीक है बेटा '

दोनो वही माँ के साथ बैठ गये , ' देवेन तुम यही रूकों, भाभी के पास मै जरा घर जाकर तुम्हारी माँ को देख आता हूँ ! अब वह कैसी है

"वह ठीक है पापा उनका वी,पी लो हो गया साथ आने की जिद कर रही थी पर मै नही लाया। ठीक किया आखिर माँ ही तो है वह अपने बेटे को इस हाल में कैसे देख सकती है |"

सन्जना के ससुर घर जाते वहाँ पूजा घर में पत्नी को बैठा देख वही चले जाते है ! वह अधीर हो उठती है " कैसा है नवीन बताओं और रोने लगती है वह उसे सीने लगा खुद भी रोने लगते है नवीन की माँ ..हमारा बच्चा अपाहिज हो गया मना करता था ! "बहु के साथ प्यार से रहा कर पर नही माना पता कैसा भुत सवार था उस पर हर समय गुस्से में रहता था।

यह सब उस औरत की वजह से हुआ जिसके चगुंल में वह फंसा था घर में बहु थी बच्चे थी पूरा परिवार था लेकिन उसे हमसे कोई खुशी कहाँ थी तुम ठीक कहती हो नवीन की माँ अगर वो यहाँ खुश होता तो ऐसे चक्करों में न पडता अब क्या अपने लायक भी न बचा। "

"बेचारी बहु अभी भी उसके साथ खडी उसी के लिए रो रही है। "

उस बेचारी की क्या गलती वह वही करती है जो उसे करना चाहिए जलील तो नवीन ही है। "

'ऐसे मत बोलो नवीन के पिता उसे उसके किये की सजा मिल गयी |'

उस बजारू को घर ला रहा था अब ले आ अब आ जायेगी आपाहिज के साथ कर लेगी इसकी सेवा उसी को बुलाओ आँख तो खुलेगी , जो करेगा वही करेगा हम क्या करे बुढापे में यह दुख देखने को मिल रहा है अच्छी खासी बहु है उसके साथ खुश नही रह सका नालायक! "

कहते हुए नवीन के पिता सुबकने दोनो पति पत्नी गम में डूब चुके थे | मंदिर में कृष्ण भगवान मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे |

वहाँ आभागी सन्जना बच्चों को अपनी बातों बहला कर उन्हे बहका रही थी ताकि अपने पापा का हालत देख वह घबराये नही |

....

नवीन हॉस्पिटल के कमरे में बेड पर बेहोश था उसे अभी तक होश नही आया था सन्जना ने चेकअप करने आये डॉक्टर से पूछा इन्हे कब तक होश आयेगा डॉक्टर्स ने कहा कल तक होश आ जायेगा |

बच्चों ने पापा को कमरे में बेहोश देखा तो वह मायूस हो गये उन्हे यह नही पता था कि पापा दोनो पैर एक्सीडेन्ट में गंवा चुके है न ही किसी ने बताया | उनके मायूस चेहरों को देख सन्जना ने उन्हे देवेन के साथ घर भेज दिया और वहाँ लाने के लिए मना कर दिया ताकि उनके दिमाग पर बुरा असर न पडे |

थोडी देर में सन्जना के ससुर गोपालदास भी वहाँ आ पहुंचे . ..."तुम खाना खा लो बहु कल से तुमने कुछ नही खाया ! " सन्जना रोने लगी..." मत रो बेटी सब ठीक हो जायेगा | "उन्होने ढांढस बंधाया और अपने आँसुओं को पी गये |

" पानी .....पानी ...आह आह ....सुबह सुबह नवीन की आवाज सुन पास में रखे स्टूल पर औधीं पड़ी सन्जना के कानों में जैसे ही पँहुची वह हडबडा गयी दो दिन बाद नवीन ने आँखे खोली सामने सन्जना को देख चीखने लगा , ," तू मेरे सामने से हट जा ...आ गयी मेरे सामने ! हट यहाँ से , मै कहाँ हूँ ....! "तभी गोपालदास वहाँ आ जाते है नवीन को पकडते है, " खुद को संभालों बेटा ! नवीन उठने की कोशिश करता है लेकिन उठ नही पाता ! क्या हुआ मुझे ? मै कहाँ हूँ " और ...चीखता हुआ अपने पैरों पर ढकी हुई चादर हटा देता है दोनो पैर नदारद सिर्फ दोनो घुटनों पर पट्टीयाँ बंधी थी नवीन यह देख! " मेरे पाँव...

" क्या हुआ मेरे साथ " कहता हुआ दोबारा बेहोश हो जाता है।

डॉक्टर आते है उसे इन्जेक्शन लगाते है वह फिर होश में आता है सुबकने लगता है गोपालदास उसे सर पर हाथ फेरते है वह उनसे लिपट जाता आँसुओं का दरिया बह निकलता है ...माँ भी पहुँचती है ! " नवीन मेरे बच्चें मत रो" ...माँ मेरे पाँव!

" .. मत रो बेटा जो हो गया सो हो गया तू बच गया यह क्या कम है !"

तभी सन्जना कहती है.." माँ जी दवाई का टाईम हो गया" ! वह दवा ले नवीन के पास आती है वह उसका हाथ छिटक देता है, " यह सब इस मनहुस की वजह से हुआ हट जा मेरे सामने से मै तेरी सूरत भी नही देखना चाहता |" सन्जना सहम जाती है और चुपचाप बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल जाती है | बाहर बैन्च पर बैठती है उसकी रूलाई नही रूकती तभी नर्स वहाँ पहुंचती है उसे रोता देख पूछती है कि क्या हुआ , " आपके पति है न वह जिनका परसों एक्सीडेन्ड के बाद ऑपरेशन हुआ था | " सन्जना सर हिला देती है उसका मन किसी से बात करने को नही था | " आप बाहर क्यों बैठे हो अन्दर चले जाओं आपके पति है वो आपकों उनके पास होना चाहिए उन्हे दवा दे दी थी |"

सन्जना चुप रहती है नर्स ने कहा , " ठीक है वही दे देगी |"

"आपने अपनी दवाई ली"

नवीन चुप रहा माँ बोली बेटा, " मुझे बता दे कौन सी दवाई देनी है !

"मैने इनकी पत्नी को सब बता दिया था वह बाहर क्यों बैठी है उनकों बुलाओं , माँ उसे अन्दर ले आती है। नर्स के सामने नवीन चुप रहा चुपचाप दवा ले ली।

वह सन्जना को नफरत से देख रहा था।

बहु तुम घर चली जाओं वहाँ बच्चे अकेले है देवेन को भेज देना। सन्जना घर आती दोनो बच्चें अपनी माँ से लिपट जाते है , " मम्मा पापा कब आयेगे वह ठीक हो गये न हाँ बेटा ठीक हो गये जल्द ही हम उन्हे यहाँ ले आयेगे |"

सन्जना बच्चों के सामने अपने को कमजोर नही दिखाना चाहती थी इसलिए समान्य बनी रही।

उधर नवीन की हालत सुधर रही थी वह बैठने लगा था डाक्टर्स ने जल्द ही डिस्चार्ज के लिए बोल दिया।

....

"तू ...जो मेरा न हुआ ....किसी का नही .... "!

देवेन गाना गा रहा था सन्जना उसके पास पहुँची, " क्या गा रहे हो देवेन भैया ! कुछ नही भाभी भैया की वजह से परेशान था उन्होने आपके साथ कितना गलत किया न अगर वह आपकों नापंसद करने लगे थे तो तलाक ले लेते इस तरह आप पर जुल्म तो न करते आपकों जगह जगह बदनाम तो न करते ऐसा कर उन्हे क़्या मिला ...अब क्या करेगी उनका! वो क्या ऐसे इन्सान को पंसद करेगी जिसके दोनो पाँव कट चुके हो अब तो उन्हे व्हील चेयर पर आना होगा।

सन्जना उदास हो गयी अचानक ही क्या हो गया

अब क्या होगा ! नवीन उस पर और जुल्म करेगा ऐसी हालत में वह कोई फैसला भी नही ले सकती अपनी जिन्दगी का न ही इस हाल में वह नवीन को छोड़ सकती है उसका मन घबरानें लगा।

" क्या करूं भगवान यह सब क्या हो गया देवेन से अपने आँसु छिपा कर मंदिर में चली गयी और दोनो हाथ जोड दिए मूरत के आगे , "हे कान्हा जी यह कैसा इम्तहान है |"

उसका पति जो उससे इतनी नफरत करता है अब तो वह उससे और भी नफरत करेगा |

तभी देवेन वहाँ आया!" अरे भाभी आप अभी तक यही हो वहाँ अस्पताल से माँ का फोन आ रहा है वह आप को बुला रही है !

"मै क्या करूँगी?

तुम्हारे भैया मुझे देखते ही गुस्सा हो जाते है मै उनकी तकलीफों को और नही बढाना चाहती|"

"अच्छा मै माँ से पूछ लेता हूँ |"

माँ भाभी कह रही है कि वह वही बच्चों के पास है ,

अरे बहु को ले आ मुझे इतना पता नही है सारा सामान दवाईयाँ वही तो संभालती है मुझसे नही होगा बेटा नवीन कुछ नही कहेगा।

सन्जना जाने को तैयार हो जाती है तभी उसे कुछ याद आता है ! " भैया आप गाडी बाहर निकालों मै अभी आती हूँ |"

हॉस्पिटल में माँ काफी परेशान हो रही थी नवीन को संभाल नही पा रही थी गोपालदास हॉस्पिटल से डिस्चार्ज पेपर ले रहे थे। सन्जना और देवेन भी वहाँ आ पहुंचते है आते ही सन्जना ने सब संभाल लिया नवीन खामोश था वह बेबस हो चुका था अब वह एक कदम भी बिना सहारे के कही आ जा नही सकता था। तभी व्हील चेयर ले वार्ड ब्वाय आ पहुंचा

, सबकी आँखे नम थी। सन्जना सारा समान गाडी में रखवा दिया नवीन हाईपर न हो जाये इसके लिए वह उससे दुर ही रही। देवेन और गोपालदास ने नवीन को व्हीलचेयर पर बैठा दिया नवीन पूरी तरह चुप था।

सन्जना ने मंदिर से लाया हुआ प्रसाद माँ जी हाथों में रख दिया माँ जी नवीन को खिलाने की कोशिश की "ले बेटा प्रसाद खा ले "! उसने गुस्से से माँ का हाथ छटक दिया उस बेशर्म औरत को बोलो मेरे पैर कटने की खुशियाँ मना रही है .अब तो बहुत खुश हो रही होगी रन्डी ,साली बदजात तेरा बदला पूरा हो गया अब तो खुश है न तू ! " इतनी जोर से चीखा कि हॉस्पिटल के लोग अचरज से देखने लगे कितना बदतमीज आदमी है अपनी बीवी से कोई ऐसे बात करता है , वहाँ खड़ी एक औरत ने कहा तो माँ बोली

" उसकी तबियत ठीक नही है अभी इतने बडे ट्रामा से गुजरा है |"

"नवीन चुप हो जा बेटा यहाँ तमाशा न कर घर चल"! गोपालदास ने कहा।

सन्जना बेटा तुमने नवीन का कमरा ठीक कर दिया था न। माँ जी ने सन्जना से पूछा , "जी माँ सब ठीक करके ही आयी थी |"

नवीन अपने कमरे में शिफ्ट हो चुका था सभी उसकी तीमारदारी में लगे थे। व्हील चेयर पर बैठा नवीन खिडकी से बाहर झांक रहा था। वह बेहद मायुस था जो वह चाह रहा था पूरा नही हो सका वक्त की मार से बेबस हो चला था।

"मुझे बिस्तर पर लेटा दो देवेन , "

उसने अपने भाई से कहा देवेन ने व्हीलचेयर से उठा बिस्तर पर लेटा दिया अपने बडे भाई को, " आप थोडी देर आराम करो भाई मै जरा अभी आता हूँ!"

"राजू को आपके पास भेज देता हूँ ! "

"रूकों देवेन एक मिनट मेरा लैपटॉप दे दो जरा और हाँ मेरे लिए दूसरा मोबाईल ले आना पुराना तो एक्सीडेन्ट में डैमेज हो गया | "

"भैया अभी आप आराम करों लैपटॉप बाद में चेक कर लेना |"

" छोटे तुझे जो कहा, वो कर "

मैने कहा न लैपटॉप दे !

" जी भैया देता हूँ " कहता हुआ देवेन

लैपटॉप नवीन को थमा कमरे से बाहर चला गया।

नवीन की बैचेनी पालुमी से बात करने की जिसे

वह जाहिर नही कर पा रहा था उससे बात करे कई महीने हो चले थे न जाने वह किस हाल में होगी यह जानने वह बेकल था न जाने वह उसके बारे में क्या सोच रही होगी ,नवीन ने लैपटॉप आन किया पालुमी के मैसेज, वीडियो काल्स की बाढ आयी हुई थी उसने जल्द ही उसे वीडियों काल की और अपने बारे में बताया , "ओह पालोमी मै तुमसे मिलने नही आ सकता लेकिन मै मरा भी नही हूँ |"

"यह सब कैसे हो गया "...उसी मनहूस की वजह से "उसी की हाय लग गयी!" मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था !

" मै जैसे ही उसकी शक्ल देखता हूँ मुझे गुस्सा आने लगता है यह क्यो है काश उसकी जगह तुम यहाँ होती उस दिन गुस्सें में मैने बहुत पी ली थी न जाने कैसे ट्रक से टकरा गया कुछ पता नही पालुमी मै तो तुम्हारे नशे में था |"

अच्छा !

पालुमी ने अपनी आदायें दिखानी जारी रखी!" मै कब से तुम्हे देखने को परेशान था मेरे घर वाले मुझे छोड ही नही रहे थे मेरा मोबाईल डैमेज हो गया है जल्द ही तुम्हे कॉल करूगा | एक काम करों तुम्ही यहाँ आ जाओ अब तुम्हे यहाँ आने से कोई नही रोकेगा | "

"ठीक है मै आती हूँ लेकिन कैसे इतनी दुर आने के लिए मेरे पास अभी मनी नही है तुमने कितने दिनों के बाद मुझे कानटेक्ट किया |"

" ठीक है मै तुम्हारी फलाईट की टिकट बुक कराता हूँ और तुम्हारे एकाउन्ट में मनी ट्रांसफर करवाता हूँ |"

" ठीक है मै आती हूँ तुम्हारे पास फिर तुम्हारी उस मनहूस की कैसे छुट्टी करती हूँ तुम देखना |"

" मुझे उस दिन का इन्तजार है मै उसे और देर बरदाश्त नही कर सकता लेकिन बच्चों को मनाना होगा वह बच्चों को तो कलेजे से लगाये रहती है इतनी आसानी से नही जायेगी |"

"यह तुम देखों मै या वह दोनो में से एक चुन लो |"

" तुम ! चुन लिया अब तो खुश हो हाँ हाँ हाँ..." नवीन जोरो से हँसने लगा।

नवीन सोचने लगा पालुमी को बुला तो लुंगा लेकिन घर वालों को कैसे तैयार करूं अब उसके पास जाना भी मुमकिन नही है।

तभी सन्जना कमरे में चाय लेकर दाखिल होती है नवीन का मुंह बन गया अभी बताता हूँ इसे मन ही मन कुछ सोचने लगा जैसे सन्जना ने चाय उसे पकड़ाने की कोशिश की उसने कप को पकड़ जोर से दीवार पर दे मारा ! " यह चाय है साली इतनी गन्दी बनायी है "! और जोर जोर से गालियां देने लगा सभी कमरे में चले आते है !

"माँ कैसे चाय बनाई इसने "

"अरे हमने भी तो पी ठीक ही तो है |"

"तुम्ही इसे सर पर रखों मुझे मार दो जान से यह मुझे मार देगी माँ आह मेरे पैर !

बेटे की तकलीफ में माँ को भी पीडा हुई।

"सन्जना तुम जाओं यहाँ से"! सन्जना मौके की नजाकत भाँपते हुए चुपचाप चली जाती है।

" माँ तुम क्यो नही समझती मुझे तकलीफ में देख तुम्हे अच्छा लगता है क्या ? जो बार बार इसे भेजते हो मेरे पास | अच्छा तो तू क्या चाहता है मै क्या करूँ मेरा पीछा छोडवा दो प्लीज मै और बरदाश्त नही कर सकता |"

" ठीक है बेटा मै उससे तुम्हारा कोई काम नही करवाऊंगी। बच्चों को मेरे पास भेज दो। ठीक है बेटा , "

"बुढापे में यह दिन देखने पड रहे है ..."माँ बुदबुदा रही थी। उन्होने बच्चों को नवीन के पास भेज दिया।

...

नवीन बच्चों से बात करता है कि वह उससे कितना प्यार करते है दोनो बच्चे अपने पापा पर चिपक जाते है और रोने लगते है !

नवीन बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाता है और उन्हे बताता है पालुमी उनकी दोस्त उनसे मिलने आ रही है और वह अब रहेगी उसी घर में !

बच्चे कुछ नही कहते चुपचाप कमरे से चले जाते है और जाकर दादी को बताते है दादी खामोश रहती है और बच्चों को समझाती है करने दो उसकों जो करना है खुश रहने दो।

वह सन्जना को समझाती है उसे आने देते बहु उसे खुश रहने दो हमने अपनी दिल पर पत्थर रख लिया है | सन्जना चुप थी वह घर के हालातों के आगे बेबस थी अपनी जिन्दगी का फैसला करने जा रही थी लेकिन हालात ऐसे बन गये कि वह मझधार में थी उसके जीवन की डगमगा रही थी |अभी तक तो वह यही सहन करती रबी उसका पति निर्दयी है ....लेकिन अब सौत को भी अपने सामने कैसे बरदाश्त करे !

नवीन बच्चों से बात करता है कि वह उससे कितना प्यार करते है , दोनो बच्चे अपने पापा पर चिपक जाते है और रोने लगते है !

नवीन बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाता है और उन्हे बताता है पालुमी उनकी दोस्त उनसे मिलने आ रही है और वह अब रहेगी उसी घर में !

बच्चे कुछ नही कहते चुपचाप कमरे से चले जाते है और जाकर दादी को बताते है दादी खामोश रहती है और बच्चों को समझाती है करने दो उसकों जो करना है खुश रहने दो।

वह सन्जना को समझाती है उसे आने देते है बहु उसे खुश रहने दो हमने अपनी दिल पर पत्थर रख लिया है | सन्जना चुप थी वह घर के हालातों के आगे बेबस थी अपनी जिन्दगी का फैसला करने जा रही थी लेकिन हालात ऐसे बन गये कि वह मझधार में थी उसके जीवन की नैया डगमगा रही थी। अभी तक तो वह यही सहन करती रही उसका पति निर्दयी है ....लेकिन अब सौत को भी अपने सामने कैसे बरदाश्त करेगी उसकी आँखों के आगे अंधेरा आ रहा था वह जाकर मंदिर में रोने लगी।

सन्जना के अन्दर हिम्मत न थी कि वह सौतन को देख सके। जब वह घर में आ पहुंची तो सन्जना अपने कमरे से बाहर नही निकली , आँसुओं के सिवा उसके पास कुछ न था बच्चे सब समझ रहे थे लेकिन अपने पिता का हाल देख उनकी खुशी के लिए खामोश थे।

पालुमी के घर में आने से नवीन के चेहरे पर रौनक आ गयी जिससे वह छिप छिप कर मिलता था लैपटॉप से मुलाकातें करता था अब वह उसके सामने थी।

वह नवीन के कमरे में पहुंची ... और कहती है , "अब मै आ गयी हूँ सब ठीक हो जायेगा। " उसके शरीर से खुशबु की तेज गन्ध आ रही थी ...तन दमक रहा था और चेहरा चमक रहा था।

हरे रंग के लिबास में उसकी खुबसुरती निखर रही थी नवीन के माँ -बाप ने जब उसे देखा तो शर्म से उनका चेहरा झुक गया उनके बेटे ने उन्हे कही का नहीं छोड़ा सन्जना के घर वालों को जब पता चलेगा तो क्या होगा गोपालदास ने अपनी पत्नी दीपाली से कहा कि वह बहु से कहे के कुछ समय के लिए अपने बच्चों को लेकर मायके चली जाये ...देवेन उसे छोड़ आयेगा।

वह सन्जना को बोलने गयी लेकिन सन्जना ने मना कर दिया कि अगर उनके माता-पिता को जब पता चलेगा कि नवीन का एक्सीडेन्ट हो गया है और वह ऐसी हालत में अपने पति की देखभाल न कर मायके आ पहुंची है तो उन्हे दुख होगा इससे बेहतर होगा कि उन्हे कुछ पता ही न चले। नवीन की माँ दीपाली ने "सर पकड लिया जैसी तुम्हारी इच्छा बहु बाद में हमें कुछ न कहना |"

पालुमी नवीन के साथ बातें करती रही हंसती रही कोई उनके कमरे में नही गया किसी ने बात नहीं की देवेन घर से बाहर चला गया उससे यह सब नही देखा जा रहा था।

बैठे बैठे नवीन थक गया तो पालुमी से कहा कि उसे लेटा दे पालुमी ने उसकी लेटने में मदद की वह नवीन से बात तो कर रही थी लेकिन उसे कुछ चुभ रहा था वह सोच रही थी इसी कमरे से नवीन उससे बात करता था जब उसने उसके कटे हुए पांव देखे तो डर गयी। उसने मन ही मन सोचा कैसे अपाहिज हो गया यह इसकी पत्नी कही नजर नही आ रही उसने नवीन से पूछा , " तुम्हारी पत्नी कहा है नजर नही आ रही है यहाँ नही है क्या ?"

"क्या पालुमी तुमने किस मनहुस का नाम ले लिया यही कही होगी |"

"तुम्हें उससे क्या अब तुम्ही मेरा काम करोगी उसे यहाँ नही आने देना। " वह अचकचा गयी ...'ठीक है' पालुमी उससे अब तक बाहर ही मिली थी घर में उसका रूप एकदम अलग था।

तक पालुमी नवीन के कमरे में रहती है , वहाँ कोई नही आता न बच्चे न भाई न माता पिता और सन्जना ने तो मानो खुद को कैद ही कर लिया हो लेकिन एक दिन जब सन्जना रसोई में काम कर रही थी तो पालुमी वहाँ पहुंच गयी उसने चुपके से देखा सन्जना को ....

वह एक खुबसुरत भरी पूरी औरत थी उसकी ममतामयी रूप देख पालुमी सिहर गयी उसकी अंतरआत्मा चीत्कार उठी यह वह क्या कर रही है देवी समान स्त्री के सुहाग पर डाका डाल दिया। नवीन का भयानक रूप देख वह समझ गयी यह इन्सान ही सही नहीं है तभी तो पूरा परिवार होते हुए इतनी सुंदर सुशील पत्नी के होते हुए मुझ जैसी औरत के पीछे तबाह हो गया। यह उसकी हवस है और कुछ नही उसका पति इतना गलत कर रहा है भगवान ने सजा भी दे दी फिर भी मुझे यहाँ बुला कर एक घरेलु स्त्री की तरह बर्ताव करने की उम्मीद कर रहा है , इतना सुंदर शरीर वह इस अपाहिज की देख रेख में बर्बाद नही कर सकती उसके रूप रंग के बहुत कद्रदान है।

जिस तरह नवीन उसे अपनी पत्नी के बारे में बताता रहा उससे तो लगता था कि वह कोई बेवकूफ सी औरत है लेकिन यहाँ तो कहानी ही उलट है इस परिवार की रीढ़ तो यही है नही नही... मुझे अपाहिज नही बनना! नही छीनना इसका सुहाग ! लेकिन इस खुदगर्ज आदमी को रास्ते पर लाना ही होगा |

उसने मन ही मन कुछ ठान लिया।

नवीन को बहुत तेज प्यास लग रही थी ...पालुमी बाहर टहल रही थी उसे यहाँ आये दो दिन हो चुके थे उसकी आँखों ने बहुत कुछ भांप लिया ....

तभी नवीन उसे आवाज लगाता है ....' पालुमी ' वह वापस नवीन के कमरे में जाती है उस वक्त वह कयामत ढा रही थी उसकी बड़ी-बड़ी सुंदर आँखे चमक रही थी।

'क्या है '

वह लगभग चिल्लाई उसके तेवर देख नवीन रूआंसा हो गया , "कुछ नहीं ..पानी दे सकती हो!" नवीन ने कहा , "यह लो और उसने गिलास पकड़ा दिया।

"तुम यहाँ आओ मेरे पास किसी ने तुम्हे कुछ कहा क्या मेरे घर वालो ने या फिर उस मनहुस ने |"

पालुमी चुप रही नवीन को लगा उसके घर वालो ने कुछ कहा होगा अच्छा बाहर चलते है मै ड्राईवर को बोलता हूँ गाडी निकाले बच्चों को भी ले चलते है , पालुमी बोली नही , 'पहले हम चलते है बच्चों को बाद में ले चलेगे |'

'ठीक है ' वह अपनी व्हील चेयर पर बैठता है पालुमी उसकी मदद करती है ड्राईवर ने पूछा कहा चलना है, "वही चलो उसी रेस्ट्रोरेन्ट में जहाँ मै जाता हुँ !

'ठीक है |'

पालुमी और नवीन कॉफी पीते है नवीन का दोस्त तभी खन्ना वहाँ पहुंचता है और पालुमी जैसे हुस्न को देख रूकता है नवीन से हालचाल पूछता है व इशारा कराे है कि कौन है नवीन कहता वह उसकी दोस्त है उसके एक्सीडेन्ट के बारे में सुन उससे मिलने आयी है | खन्ना वही बैठ जाता है वह काफी हैडसम था पालुमी की नजरें बार बार उस पर ठहर जाती वह भी उसे ताड रहा था ..नजरों के जाम आपस में टकराने लगे नवीन सब देख रहा था उसे गुस्सा आ गया पर चुप रहा ..." चलो पालुमी घर ..."

" अरे थोड़ी देर रूकते है न कितना अच्छा म्यूजिक चल रहा है "....यह है रेशमी जुल्फों का अन्धेरा न घबराईये .... हुस्न और जवानी आमने सामने थे बीच में वह अपाहिज!

कुदरत भी खुल कर हँस रही थी तभी तेज बारिश होने लगी खन्ना ने नवीन की व्हील चेयर पर बिठा कर अन्दर बिठा दिया पालुमी ने कहा कि जब बारिश रूक जायेगी तब चलेगे |

नवीन को एक कोने में बिठा कर खन्ना और पालुमी हाथ पकड़ कर बाहर चले गयी थोड़ी देर में वापस आये! , " मैडम को वॉशरूम जाना था अब तुम तो ले जा नही सकते थे तो मै ही ले गया | "

"अब मै चलता हूँ किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे फोन करना जहाँ जाना होगा मै ले जाऊगा ! " वह अजीब ढंग से हँस रहा था आदमी की फितरत आदमी न समझे यह हो ही नही सकता | बेबस नवीन चुप रहा बार में दो तीन पैग लगा लिए उसने पालुमी "बोली चलो अब चलते है, बारिश रूक गयी थी खन्ना उसे हाथ हिला कर बॉय कह रहा था। नवीन ने पालुमी को देखा उसकी आँखों में शरारत थी।

जब दोनो वापस घर पहुँचे तो बच्चे बाहर खेल रहे थे दोनो ने अपने पापा को देखा तो लपक कर उनके पास पहुँच गये ! "पापा हमारे लिए क्या लाये आप आन्टी को लेकर गये घुमने हमे नही ले गये ...!"

ऐ ! तुम दोनो !

" जाओ यहाँ देख नही रहे तुम्हारे पापा थके हुए है चलो जाओ यहाँ से ",

दोनो अपने पिता को देखने लगे नवीन चुप रहा उसके दिल में चुभन हुई उसके बच्चों को पालुमी ने ऐसे बोला उसे पंसद नही आया लेकिन वह थक गया था आराम करना चाहता था इसलिए चुप रहा दोनो बच्चे चुपचाप अपनी माँ के कमरे में भाग गये।

पालुमी ने अपनी आदायें दिखानी शुरू की ... " बहुत थक गये न डार्लिंग चलो खाना खा लो मै लेकर आती हूँ ! "

पालुमी रसोई में गयी वहाँ कुछ खाने को न मिला वह नवीन की माँ दीपाली पास जाती है | उसे देख उन्होने मुंह घुमा लिया | पालुमी मन मार कर वापस नवीन के पास आती है और नवीन से पूछती है खाना कैसे खायेगे वहाँ कुछ नही नवीन माँ को बुलाता है माँ उसे लताडती है वह गुस्से से लाल पीली हो जाती है "जिसके साथ घुमने गया था उसी से अपना खाना बनवा ले |"

नवीन पालुमी का चेहरा देखता है , " न बाबा न मुझे खाना बनाना नही आता " हालाँकि पालुमी को सब आता था लेकिन वह नवीन को सबक सिखाना चाहती थी।

नवीन होटल से खाना मंगवाता है फिर दोनो कमरे में बैठ कर खाते है होटल का खाना खा कर नवीन बीमार हो जाता है। माँ ने साफ मना कर दिया उनसे काम नही होगा नवीन परेशान हो जाता है उसे लगता है पालुमी को घर में बुला कर उसने आफत मोल ले ली है और वह खन्ना भी बहुत बेतकुलफ हो रहा था

तभी उसे खन्ना आता हुआ दिखायी दिया कैसे हो दोस्त तुम्हारी दोस्त कहा है , " वह यहाँ नही है ."..नवीन कहता है तब तक पालुमी भी वहाँ धमकती है खन्ना उसे देख खुश हो जाता है पालुमी उसका हाथ पकड़ अपना आंचल लहराती हुई घुमने निकल जाती है | नवीन गुस्से से दांत भीचता है उसे विश्वास नही होता की पालुमी जो उससे इतना प्यार करती है इतनी दुर उसके पास रहने आयी यहाँ आकर वह यह करेगी।

आज से इसे छोडुगा नही इसे यहाँ से वापस भेजूंगा।

तभी बच्चे खेलते हुए वहाँ आ धमके ! " पापा हमारे साथ खेलो वह कहता है , हाँ चलो खेलते है" और बच्चों के साथ खेलने लग जाता है | उसे अपने पुराने दिन याद आते है जब वह पालुमी से नही मिला था पूरे परिवार के साथ हँसता खेलता था उसे जोरो की भुख लग रही थी वह मायूस हो बैठा था तो बेटी पूछती है |" क्या हुआ पापा आपकी तबियत खराब है?" वह कहता है वह ठीक है उसे भुख लगी है , बस इतनी सी बात अभी मम्मा को बोलती हूँ वह आपके लिए कुछ बनाये।

संजना ने खाना बनाया हालांकि उसे बहुत जोर से बुखार था लेकिन वह नवीन को परेशान नही देख सकती थी उसे बच्चों ने सब बता दिया।

खाना खाने के बाद नवीन ने बच्चों से पूछा कि उनकी माँ कहाँ है तभी बेटी बोल पड़ी मम्मा को बुखार है पापा उन्होने कुछ नही खाया "

क्या ?

नवीन के दिल में कुछ चुभ रहा था।

शाम को पालुमी वापस आयी तो नवीन उस पर बरस पडा , "तुम यहाँ मेरे ले आयी हो या खन्ना के लिए वह मुझ से ज्यादा हैडसम है क्या ? नवीन उसे बोलता है और गुस्से में बोलता ही गया है तो तू वेश्या ही पैसा भरो तो तू बात करेगी , पैसा दो तो मिलने आयेगी तू कैसे मेरे साथ इस घर में रहेगी , मेरा काम कैसे करेगी तुझे तो बिस्तर चाहिए मर्द चाहिए तूझे अब वो मिल गया |"

पालुमी ने एक थप्पड उसके गाल पर जड दिया ,

"साले अपाहिज कही के तू होता कौन है मुझे बोलने वाला तेरी बीवी नही हूँ जो तेरी बकवास सुन लुंगी |"

तेरी हिम्मत कैसी हुई मुझे बोलने की तेरी सेवा कर अपनी जवानी बर्बाद करू तुझमें अब रखा ही क्या है तूने पैसा दिया तो ब्याज समेत वसुला भी अपना शरीर नोचवा कर तेरी हवस भी तो पूरी की मै कोई घर की औरत नही जो शरीर भी दुंगी और बदले में कुछ भी न लुंगी |"

नवीन उसके तेवर देख बौखला गया उसे उम्मीद नही थी पालोमी उसके साथ ऐसा करेगी।

वह उसे वहाँ से चले जाने को बोलता है पालुमी गुस्से से बोलती है," तेरे संग रहेगा भी कौन ? लंगडे मेरा हुस्न देखा है! बहुत है मुझे चाहने वाले तेरी देखभाल करू ! तेरी बीवी हूँ क्या और सून तेरे दोस्त को भी मैने ही यहाँ बुलाया था तू अपनी बीवी का नही हुआ मेरा क्या होगा तू तो उस शरीफ औरत को मनहूस का ताना देता रहा मनहूस वो नही तू है वह तो इतना बर्दाश्त कर रही है। तूने अपनी आग बाजार में बुझा ली कभी उसके बारे में सोचा वह भी तो शादीशुदा है अगर तेरी तरह वह भी ऐसा करती तो। तू अपनी बीवी का नही हुआ क्या क्या नही कहा कितना बडा झूठा है तू। अच्छा हुआ तेरे साथ यह हुआ मै तो बजारू हूँ बहुत मिल जायेगे लेकिन तेरी बीवी तो शरीफ है उसे तो खुश रख। अपने माँ बाप की भी नही सोची ...तेरे जैसे कितने... मेरे एक इशारे पर मर मिटे |"

पालुमी के आँख से आँसु बह निकले अपना अपमान वह बर्दाश्त न कर सकी। वह सन्जना के पास जाकर माफी मांगती है कहती है उसने उसे अच्छा सबक सिखा दिया है अब यह किसी और गैर औरत की ओर आँख उठा कर भी नही देखेगा और चली जाती है।

सन्जना रोती है उसे नवीन के लिए दुख होता है लेकिन चुपचाप रहती है बुखार से उसका पूरा शरीर अकडा हुआ था।

नवीन अपने कमरे में बैठा हुआ सोचता है कि पालुमी ने उसकी आँख खोल दी पैसे देकर वह जिन खुशियों को खरीदता था वह तो अस्थायी थी जब उसने चाहा कि वह हमेशा के लिए मिल जाये पालुमी जो उसकी जान थी अपने साथ रख ले ऐसा हो नही पाया। उसे शिद्दत से सन्जना की याद आती है जिस पर इतने जुल्म करता था जब उसके साथ वही हुआ तो वह टूट गया वह समझ गया जो सितम उसने सन्जना पर किये उसे कभी कोई खुशी न दी उसके बदले में उसे यह लाचारी भरी जिन्दगी मिली है उसकी आँख से आँसु बह निकलते है तभी गोपालदास और दीपाली वहाँ आते है और उससे कहते है , "अच्छा किया जो तूने उसे खुद ही भेज दिया |" माँ ...कहता हुआ नवीन माँ से लिपट जाता वह कहती है , " बेटा तू अपने गुनाहों की माफी मांग ले सन्जना से तभी इस घर में खुशियां वापस आयेगी नही तो पूरे समाज में तो उनकी इज्जत जा ही चुकी है |"

माँ सन्जना को उसके पास भेजती है नवीन बिस्तर पर लाचारों की तरह लेटा हुआ आँसु बहा रहा था सन्जना को देखता है तो उसे अपने पास बुलाता है और उसे बैठाने को कहता है सन्जना उसे उठाती है उसका शरीर बुखार से जल रहा था .... " तुम्हे तो बुखार है सन्जना ! "

सन्जना खामोश थी उसका दर्द आज नवीन को साफ दिख रहा था | आखिर क्यो वह भटका उसे खुद से ही घृणा हो रही थी जिसके साथ पवित्र अग्नि के फेरे ले अपना बना कर इस घर में लाया था ....फिर दूसरी औरत को देखा ही क्यूं।

सन्जना को इतने सालों के बाद पति की आँखों में प्यार दिख रहा था लेकिन वह बेहोश हो गयी !

सास ससुर व बच्चे भागते हुए आते है , तब तक देवेन भी वापस आ जाता है जो शहर से बाहर अपने दोस्त

के यहाँ था।

माँ सन्जना को दवा दी वह होश में आयी तो नवीन उसको ही देख रहा था उसके चेहरे पर नफरत की जगह प्यार था बच्चें उसके करीब आ गये मम्मा जब आप बेहोश हो गयी तो पापा ही आपकी देखभाल कर रहे थे अब वह आपसे गुस्सा नही है आप भी पापा से हाथ मिलाओं ... नवीन सन्जना से माफी मांगता है | सन्जना अपनी पलकें झुका लेती है वह खामोश थी किसी से कुछ नही कहती चुपचाप मंदिर चली जाती है सामने कान्हा जी की मूरत मुस्कुरा रही थी , वह पूछती है आखिर क्यों ? ...यह सब हुआ ..... उसे कोई जवाब नही मिलता सिर्फ , 'हरे कृष्णा हरे रामा ' का उच्चारण सुनाई दे रहा था चारों और असीम शान्ति थी।


Rate this content
Originality
Flow
Language
Cover Design