काम
काम
"आप बताइए बेटाजी, आखिर काम ही क्या रह जाता है....बरतन वाली बरतन कर जाती है ....सफाई वाली सफाई कर जाती है ...कपड़े धोने वाली कपड़े धो जाती है ....सब्जियाँ मैं काट देती हूँ ....चार फुलके बनाने होते हैं, वो बना कर बहूरानी कमरे में चली जाती है ।" जब भी शगुन उस गली से गुजरती अम्मा जी उससे यही बात कहती।
आज अम्मा जी के सुर बदले हुए थे। "बेटा आपको नहीं पता घर में छोटे- छोटे कितने काम हो जाते हैं, थक जाती हूँ.. सात- सात लोग हैं घर में सबके लिए फुलके बनाओ, थक जाती हूँ। रूआँसी हो कर अम्मा जी कह रही थी।
"बहू ठीक तो है अम्मा जी।" शगुन ने हौले से पूछा।
"उसे क्या होना था ....भली चंगी है, रोज सवेरे निकल पड़ती है पर्स टाँग के नौकरी करने।" अम्मा जी ने मुँह बिसोरते हुए कहा।
