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Archna Goyal

Tragedy

2  

Archna Goyal

Tragedy

जीवन संध्या

जीवन संध्या

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"माँ, माँ, कहाँ हो तुम।"

सिद्धांत सारे घर मे आवाज लगाता घूम रहा था। देवकी के कानों में आवाज पड़ते ही, वो बोली- "मैं यहाँ हूँ पूजा घर में।"

माँ के पास आकर सिद्धांत कहने लगा- "माँ मुझे तुमसे कुछ कहना है।"

"हां बेटा कहो क्या बात है।" बड़ी ही आत्मीया से कहा देवकी ने।

"माँ मैंने ये मकान बेच दिया है। अब हमें ये घर खाली करना होगा तो और वो कहते कहते रुक गया।

"तो क्या बेटा, आगे बोलो।"

"माँ मे इतना ही कमा पाता हूं कि बस एक दो जन का ही पेट पाल सकता हूँ और किराये पर दो कमरे का फ्लेट लेने की मेरी औकात नहीं, मैं अपनी पत्नी को तो छोड़ नहीं सकता, उसे शादी कर के जो लाया हूँ तो फिर आप.." ये कह कर अपना मुंह फेर लिया और रुक गया।

भगवान की जोत जलाते जलाते बोली, "आप ‘ के आगे पुत्तर।"

मुड़कर देखा तो बेटा पीठ किए खड़ा है। माचिस की तिल्ली जलाते हुए देवकी ने अपनी बात फिर दोहऱाई।

सिद्धांत ने कहा, "माँ आप किसी वृद्धा आश्रम में चली जाओ।"

ये बात सुनते ही उसका तो मानो जैसे दम ही निकल गया हो। माचिस की तिल्ली उसके हाथ में जलती ही रह गई और उसका हाथ जल गया। ये बात उसे ऐसी चुभी कि हाथ के जलने का एहसास ही नहीं हुआ। उसे उस हवा में अब सांस लेना मुश्किल हो रहा था। वो यहाँ पल भर भी अब रहना अपराध महसूस कर रही थी।

आरती हाथ की हाथ में अधुरी रह गई, विस्फोट जो हुआ था सीने में।

"माँ आप अपना सामान बांध लेना, मैं कल ही आपको किसी अच्छे वृद्धा आश्रम मे छोड़ आऊंगा।"

वो पूजा अधुरी छोड़ अपने कमरे मे चली गई।

वो फूट फूट कर रोने लगी। पति को गुजरे 25 साल हो गए थे पर आज तक उनकी याद नहीं आई थी। कभी उनकी कमी महसूस नहीं हुई थी। अब तक अपने बेटे मे ही अपने पति की छवि को देखती आई थी। उसी के सहारे दिन काट रही थी।

बहू कमरे मे उसके लिए नाश्ता ले कर आती है।

"लीजिए माँजी नाश्ता।"

देवकी रुधे स्वर मे बोली, "नहीं बहू मुझे भूख नहीं है और फिर वैसे भी  खाना तुम्हारे लिए कम पड़ जाएगा।" बहू भी दोबारा टोके बिना खाना वापस ले कर चली गई।

अपने बिस्तर पर पड़ी घर को निहार रही थी देवकी की भीगी आंखें। कैसे उसने एक एक ईंट खड़ी करके ये मकान बनवाया था। हर एक चीज जमा कर ये घर सजाया था, हर एक चीज को सहेज कर रखी थी मैंने।

हर चीज से गहरी यादें जुड़ी है मेरी। पति सोरभ के मरने के बाद रात दिन एक कर पैसा कमाया था मैंने, भरी जवानी में विधवा होना कम बड़ा दुख था, उस पर गोद में बच्चा। दूसरा विवाह करना भी मुश्किल और अगर शादी कर भी ले तो उस बच्चे का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अगर उन्हें उसके अकेले पन का पता हो तो दूसरे मर्दों की और थाह पड़ती है।

ऊपर से रोजी रोटी भी कमाना पड़े तो दुखों की कोई सीमा नहीं क्योंकि सोरभ की मौत उसकी फैक्ट्री में आग लगने के कारण हुई थी। पति भी गया पैसा भी।

 एक जवान विधवा का घर से निकल कर बाहर नौकरी करना कोई मजाक नहीं। सबकी नजर उसकी जवानी पर ही टिकी रहती है। मुझे अच्छी तरह से याद है उसने अपनी लड़ाई लड़नी कैसे शुरु की थी। सोरभ के जाने के एक महीने बाद मैंने अपने माता-पिता के आगे अपनी नौकरी की इच्छा जाहिर की थी तो माँ ने कहा था बेटी तुम्हारा नौकरी करना ठीक नहीं रहेगा। मेरी मानो तो तुम किसी अच्छे लड़के से शादी कर लो पर माँ ये सिद्धांत।

ये हमारे पास रहेगा, या फिर वो बच्चे को भी अपनाले तो इससे अच्छी बात नहीं मगर ऐसा लड़का मिलना मुश्किल है। कई महीने गुजर गए पर कोई भी ऐसा रिश्ता नहीं आया जो मेरे साथ मेरे बेटे को भी अपनाले। 6 महिने गुजर गए। एक दिन बड़ी हिम्मत जुटा कर माता- पिता से कहा, मैं कब तक आप लोगो पर बोझ बनी रहूंगी, क्यूं न मैं नोकरी करलूं जब तक शादी न हो। कुछ सोच विचार कर उन लोगों ने हाँ कर दी।

नौकरी का पहला दिन मेरा बड़ी उलझनों में गुजरा। जितनी आसानी से मुझे नौकरी मिली थी उतनी आसानी से नौकरी करना मुश्किल था।

दपत्तर का पहला दिन, जाते ही सबसे जान पहचान हुई, थोड़ी देर बाद जब मैं वहाँ एडजस्ट हो गई, तब एक महिला कर्मचारी ने मुझे टोका- क्या आप बिंदी लगाना भूल गई क्या। मैं थोड़ी ये सुन कर सकपका गई, वो मैं, तभी मैं बोली नहीं, रुक गई थी ऐसे जैसे किसी ने जबान पकड़ ली हो। फिर मैंने सोच-विचार कर कहा, हाँ वो मैं जल्दी में भूल गई। मेरा छोटा बेबी है न इसलिए।

तभी पास में खड़े एक पुरुष कर्मचारी ने कहा- हमने तो सोचा था आप...

फिर माँफी मांगते हुए कहा- जी सुहाग चिन्ह तो लगाना जरुरी है ना।

तभी से देवकी ने फैसला कर लिया कि वो इस अंजान शहर में किसी को भी नहीं बताएगी कि वो अकेली है, विधवा है ताकि पुरुषों की बुरी निगाहों की शिकार न बनें।

अच्छा मैं ऑफिस जा रही हूँ, पापा सिद्धांत अंदर कमरे में सो रहा है देख लेना कही गिर न जाए बालकनी में बैठ अखबार पढ़ते हुए अपने पापा से कहते हुए देवकी अपने घर की सीढ़ियाँ उतरते जाती है। देवकी के पिता ने पढ़ते पढ़ते ही एक नजर जाती हुई बेटी की तरफ डाली और कहा, अच्छा बेटा। फिर वो अखबार में आँखें गड़ाने लगे, तभी महसूस किया जैसे देवकी ने साज श्रृंगार किया हो।

फिर सोचने लगे, ना ना ये मेरा वहम होगा। बेचारी जिसके चेहरे के रंग ही छिन गए हो वो चेहरे पर क्या रंग सजाएगी। अपनी शंका को आप ही मिटा कर देवकी के पिता अपनी दुनिया में वापस चले गए। फिर भी मन के किसी कोने में शंका के कुछ अंश रह ही गए थे पर वो जल्दी से जाती बेटी को ठीक से देख नहीं पाए थे, इसलिए अपनी शंका पर खुद ही शक कर रहे थे। वो फिर से बेटी की खबर छोड़ दुनिया की खैर खबर लेने लगे। तभी सिद्धांत के रोने की आवाज आई तो उन्हें लगा कहीं बच्चा पलंग से न गिर जाए, वो भाग कर गए और बच्चे को उठा लिया। चुप कराते कराते वो अपनी पत्नी के पास चले गए और उसकी गोद में देते हुए कहा लो इसे कुछ खिला पिला दो, शायद भुखा हो गया।

शाम को जब बेटी ऑफिस से  घर आई तो देखा माँ ने , बेटी के माथे पर बिंदी, उसने टोका, ये क्या ? देवकी को समझते देर न लगी, तपाक से उसने अपना ये कदम उठाने की वजह बता डाली। वजह सुन कर माता-पिता को भी उसकी ये बात उचित लगी और कहा, ठीक किया तुने, अच्छी बात है।

 अब वो रोज की तरह ऑफिस जाने लगी। कुछ दिनो में देवकी की दोस्ती एक पुरुष से हो गई। दोस्ती दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी मगर देवकी इस बात से सतर्क थी, कहीं रोहन को उसके विधवा होने का पता न लग जाए।

अब हम दोनों एक दूसरे के सुख- दुख के भागीगार बन गए थे। कुछ राज हम दोनों ने ही छिपाए हुए थे एक दूसरे से। एक दिन रोहन ने अपने घर पर माता के जागरण कि लिए सपरिवार बुलाया।

देवकी भी अपने माता-पिता के साथ बेटे को ले कर चली गई। रोहन को देवकी के साथ उसके पति नजर नहीं आए तो पूछ बैठा, क्या भाईसाब नहीं आए।

देवकी ने अचकते हुए कहा, जी वो काम के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते हैं, इसलिए मैं अपने माता-पिता के साथ ही रहती हूँ। देवकी के माता-पिता बेटी के शब्दो में सच्चाई ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें गर्व था अपनी बेटी पर कि वो अपनी पहाड़ जैसी जिंदगी अकेले ढोने को तैयार है।

रोहन ने कहा, जब भी आपके पति बाहर से लोटे, मुझे उनसे जरुर मिलवाना। देवकी ने मुस्कुराते हुए हामी में सिर हिलाया और जागरण में बैठ गई। जागरण समाप्त होने पर घर लोटते वक्त देवकी की माँ ने कहा, ये रोहन की पत्नी कहीं दिखाई नहीं दी पूरी रात। 

मम्मी रोहन जी की पत्नी का देहांत हो चुका है। देवकी के माता-पिता ने एक दूसरे की ओर ऐसे देखा जैसे कोई राह मिल गई हो मंजिल तक जाने की। दो एक दिन में मौका देख कर देवकी की माँ ने कहा, बेटी रोहन कैसा लड़का है ? देवकी भी माँ के शब्दो को भांप गई थी। देवकी ने भी आव देखा न ताव बस बरस पड़ी वो माँ पर, कहा- मम्मी अगर आप मेरी शादी के लिए ये सब पूछ रही है तो मेरे पास आपके सवालों का कोई जवाब नहीं।

देवकी की माँ ने कहा, बेटी अगर रोहन अच्छा लड़का है तो उससे शादी करने में परेशानी क्या है और मुझे लगता है वो सिद्धांत को भी अपना-लेगा।

तुमने देखा नही वो कैसे सिद्धांत से हँस बोल रहा था, कितना प्यार कर रहा था सिद्धांत को जैसे उसका सगा हो।

 पर मम्मी शादी में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं बहुत खुश हूँ अकेली भी। देवकी के मुँह से अकेली शब्द माँ के कलेजे को चीर गया। वो बोली तो कुछ नही पर रात दिन यही सोचती रहती कि वो समझती तो खुद को अकेला ही है न, चाहे हम उसके साथ है फिर भी वो तन्हाई का एहसास लिए हुए है। आखिर पति के सुख से तो वंचित ही है वो।

अपने मन की बात देवकी की माँ ने उसके पिता से कही- तो उन दोनों ने बहुत सोच समझ कर ये फैसला किया कि क्यों न रोहन को सारी बातें सच सच बता कर देवकी को शादी के लिए मनाने के लिए कहे तो।

इस पर माँ ने कहा, अगर रोहन को ये रिश्ता मंजूर न हुआ तो। नहीं पहले हम रोहन की मर्जी जान कर ही बात करेगें, तो ठीक है ।

कुछ दिनो के बाद मौका देख कर माता-पिता ने रोहन को घर बुला कर सारी बात की।  रोहन झट से राजी हो गया। उसने भी अपने बारे में सब सच सच बताया, क्यूंकि ये जिंदगी का फैसला था।

रोहन ने जब देवकी से इस बारे में बात की तो उसने साफ साफ इंकार कर दिया। बुझे मन से रोहन वापस लौट आया लेकिन धीरे धीरे वो फिर भी कोशिश करता रहा उसे मनाने की पर उसकी सारी कोशिश ना काम रही।

एक दिन रोहन ने कहा, मैं एक वृद्धाआश्रम खोलने की सोच रहा हूँ। क्या तुम मेरा साथ दोगी इस कार्य में। देवकी ने मुस्कुराते हुए हाँ कर दी।अब खाली समय में देवकी, रोहन के साथ वृद्धा आश्रम में काम करने लगी। रोहन ने धीरे धीरे कई शहरो में आश्रम खोल लिए थे। धीरे धीरे देवकी रोहन के नजदीक आने लगी। ये एहसास देवकी को था कि वो दिल से रोहन के करीब आने लगी है मगर दिमाग मानने को तैयार नहीं था।

उसने अकेले रहने की जो ठान रखी थी अपने बेटे के लिए। वर्षो बीत गए, दोनों एक दूसरे के साथ होते हुए भी कोसों दूर थे। बेटा जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ने के लिए दूर हॉस्टल में भेज दिया। उसकी पढ़ाई की वजह से देवकी ने भी उसी शहर में अपनी बदली करवाली और वही बस गई। धीरे धीरे रोहन और उसके बीच दूरियाँ बढ़ती गई और उस दोस्ती पर भूल की धूल की परत बिछती गई।

बेटा पढ़ लिख कर अच्छा व्यवसाय करने लगा। उसकी शादी हो गई, सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक रोजगार में नुकसान हो गया और मकान बैचने की नोबत आ गई। तब मेरी रजामंदी से बेटे ने मकान का सौदा कर लिया और जब तक कोई अच्छा काम न मिले, तब तक कोई छोटी सी नौकरी कर ली।

 जब मुझ पर दुखों का पहाड़ टूटा था तो मैंने इसे दुख पाकर भी पाला था। अपनी खुशियाँ भी दफन कर दी थी इसके लिए। लेकिन जब इस पर संकट आन पड़ा है तो मुझसे किनारा कर रहा है। अपनी पत्नी के लिए मुझे आश्रम भेज रहा है। आज पछता रही हूँ अपनी माता-पिता की घर बसाने की बात न मानकर। रोहन ने कितना जोर दिया था मुझ पर शादी के लिए मगर मैंने उसकी एक न सुनी। आज ये ख्याल आ रहा है कि अच्छा होता इसे किसी अनाथ आश्रम में छोड़ देती और खुद दूसरी शादी कर लेती। आज ये दिन तो न देखना पड़ता पर क्या करे माँ का दिल कभी पत्थर नहीं होता चाहे बेटे कैसे भी हो जाए।

 सोचते सोचते सांझ हो गई पता ही न चला, सुबह की भुखी प्यासी थी वो फिर उसकी भूख कहाँ गई पता नहीं। भूखी ही फिर सो गई मगर नींद कहाँ है आज उसकी आँखों में। आँखों ही आँखों में रात गुजार दी।

 सुबह जब कमरे में सिद्धांत आया, कहा, माँ कुछ खालो फिर हमें चलना है, 9 बजे की गाड़ी है।

देवकी ने कहा, नहीं बेटा मुझे भूख नहीं है, मेरा आज उपवास है। 

तो ठीक है माँ कुछ फल खा लो।

नहीं, बस अब तो यहाँ से चलना है। घर से निकलते वक्त देवकी की इतनी हिम्मत न हुई कि वो पीछे मुड़ कर देखे। और चल दी अपने नये बसेरे में। 

वृद्धाआश्रम में पहुँच कर वो निढ़ाल सी कुर्सी पर बैठ गई। दो दिन से कुछ खाया पिया नहीं था तो बीमार सी हो गई थी। 55 साल की उम्र में वो आज 75 साल की लग रही थी। आश्रम के एक कर्मचारी ने पूछा- आपका नाम पता ठिकाना क्या है, रजिस्टर में लिखना है।

पता ठिकाना होता तो यहाँ क्यूँ आती देवकी ने कहा।

देवकी को कमरे में भेज दिया और उसके लिए खाना पीना भी भेजा। दो दिन बाद जब आश्रम का मालिक आया तो नये सदस्यो से मिलने गया। देखा देवकी है, दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया था मगर कुछ कह न सकी देवकी, रोहन से। आज देवकी रोहन के सामने एक गुनेहगार की तरह खड़ी है। मौन जुबान नम आँखें देवकी की जैसे ये कह रही हो कि मैं तुम्हारी अपराधी हूँ रोहन। जिसकी आज मुझे सजा मिली है और रोहन की आँखों में देवकी ने यही पाया कि काश तुम जब मेरी बात मान ली होती तो आज यूँ बेघर न होती।


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