जीवन की भाषा
जीवन की भाषा
इस जीवन में प्रेमिल भाषा ,
रहा सरल व्यवहार सा |
जहाँ प्रेम अधिकाधिक होता,
नही नियम आधार सा ||
नही भेद है ऊँच नीच का,
भाषा नही ये कोई चुनाव का |
प्रेमिल भाषा जो मुख आये,
बोल दिया वह भाव का |
ग्वाल- बाल सब सखियाँ कान्हा,
गाली देत हजार |
जहाँ प्रेम अधिकाधिक होता,
नही नियम आधार ||
तूतू मैं मैं भाषा होती,
झगड़ा होय अपार |
क्षण पल बीते पुन: सभी में,
आये खेल बहार |
नही किसी में बैर भाव था,
रहते सब तैयार |
जहाँ प्रेम अधिकाधिक होता,
नही नियम आधार ||
कृष्ण सुदामा चरित देख लो,
शुद्ध सरल आचार |
कृष्ण चरण रत प्रेम सुदामा,
बना मित्र सरकार |
कभी चरण रज कृष्णा लेता,
कभी सुदामा यार |
जहाँ प्रेम अधिकाधिक होता,
नही नियम आधार ||
अमरनाथ सोनी
