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Ruchi Singh

Abstract Inspirational


4.5  

Ruchi Singh

Abstract Inspirational


जैसी नियत वैसी बरकत

जैसी नियत वैसी बरकत

5 mins 590 5 mins 590

शांति निवास बहुत ही सुंदर सफेद, लाल फूलों और लाइटों से सजा हुआ है। शांति निवास में आज शांति नहीं, हर जगह चहल पहल है। ढेरों मेहमान इकट्ठा हुए हैं। पकवानों की भीनी -भीनी खुशबू पूरे वातावरण को महका रही है। वसुधा मौसी आज बहुत ही खुश है। 

करण बेटे के आलीशान बंगले का गृहप्रवेश था। पूरे

एक हफ्ते पहले से आने का न्योता दिया था करन और मिताली ने। अब बच्चों की जिद के आगे कैसे ना कर पाती। वह पहले से ही आ गयी। 

शांति बहन जिनका कई साल पहले देहांत हो गया। अपने पीछे करन और उसकी दो बहन और दो भाइयों को छोड़ गई। करन उस समय बारहवीं में पढ़ता था और घर का बड़ा था। घर की जिम्मेदारी बड़ी जल्दी उसने सभाँल ली । घर की माली हालत ज्यादा ठीक ना थी। करन के पिता जी दफ्तर में क्लर्क थे। एक छोटी सी तनख्वाह उसमें यह 5 बच्चे। करन ने भी जल्दी ग्रेजुएशन करके बैंक में एग्जाम क्लियर करके नौकरी करना शुरू कर दिया।

अभी सब कुछ संभलना शुरु ही हुआ था कि परिवार पर एक और वज्रपात पिता जी कि आकस्मिक मृत्यु के रुप मे हो गया। सारे भाई बहनों मे ज्येष्ठ होने के कारण परिवार के लालन पालन व भरण पोषण की सारी जिम्मेदारियों ने करन को कम उम्र मे ही बहुत प्रौढ़ बना दिया।

उसने धीरे-धीरे पैसे जोड़कर एक-एक करके अपने दोनों बहनों की शिक्षा व विवाह का कर्तव्य निर्वहन किया। दोनों बहनों को अपनी हैसियत से ज्यादा अच्छे घरों में शादी की।

परिवार के दुखः सुख की साक्षी वसुधा मौसी ने एक बार करन को बोला "बेटा अब तुम्हारी भी शादी कर देनी चाहिए। ताकि ये घर कोई सभाँल सके।"

मौसी ने एक गरीब घर की लड़की देख कर करन की शादी मिताली से कर दी। यद्यपि मिताली विपन्नता मे ही पली बढ़ी पर बहुत ही सुशील और समझदार लड़की थी। उसने आते ही घर को अच्छे से संभाल लिया। 

करन के पास ज्यादा पैसे तो नहीं थे और उसके भाई पढ़ने में अच्छे भी नहीं थे। बडे भाई होने का फर्ज निभाते हुए उसने धीरे-धीरे करके दोनों भाइयों को बिजनेस करा दिया और भाई भी खाने कमाने लायक हो गए। पर दोनों बड़े भाई समान उदार व समझदार न थे। दोनों बहुत ही चालाक थे और घर खर्च में कुछ भी मदद नहीं करना चाहते थे।

 कुछ सालों में करन का भी परिवार बढ़ने लगा। उसके भी दो बेटे हो गए। फिर उसने अपने भाइयों की शादी करने को सोचा और एक-एक करके दोनों भाइयों की शादी का दायित्व भी सम्पन्न किया। 

भाई राजू की पत्नी बहुत ही तेज आई और शादी के कुछ ही दिनों बाद राजू को लेकर परिवार से अलग हो गई। 

छोटा भाई समर की पत्नी भी संयुक्त परिवार में रहना नहीं चाहती थी। वह एक स्कूल में टीचर थी और उसको भी साथ रहना गवारा नहीं हुआ।

करन ने अपना सारी कमाई व जीवन का अधिकांश भाग घर खर्च और अपने भाई बहनों की जिंदगी संवारने में लगा दिया था। छोटे भाई कमाने के बाद भी करन का पैसा जो कि उन्हे बिजनेस शुरू करने के लिए दिया था वो लौटाना नहीं चाहे। पर कहते हैं ना भगवान हमेशा अच्छे के साथ अच्छा ही करता है। ठीक करन के साथ वैसे ही हुआ।

करन की नीयत तो इतनी अच्छी थी कि भगवत कृपा से उसके सारे कार्य स्वतः बड़े सहज ढंग से होते ही चले जाते। इतनी छोटी सी आमदनी के बावजूद उसने न सिर्फ अपने माता पिता की अमानत इस कुटुंब को दिलो जान से सहेजा बल्कि सभी भाईयों की जिंदगी सवाँरी और बहनों की भी अच्छे घर में शादी कराई।

समय के साथ भाई तो बदल गए, पर बहनें अपने करन भैया भाभी पे अब भी अपनी जान छिड़कतीं। हर तीज- त्योहार पर मिताली भी सब शगुन उपहार वगैरह नंदो के घर भेजती तथा गर्मी की छुट्टियों में प्यार से उन्हें मायके आने का न्योता भी जरूर देती। जिससे उन्हें मायके के प्यार और दुलार का एहसास बना रहे। माता पिता व मायके की कभी कमी न महसूस हो।

गृह प्रवेश के इस आलीशान समारोह में वसुधा मौसी यह सब बातें मिताली की मम्मी को आज बता रही थीं और बताते बताते अपने आँचल से आंसुओं को पोछती भी जाती। फिर बोली "आज बहन शांति होती तो कितना खुश होती है। आज अपने इस बेटे को इतना तरक्की करता देखतीं। करन मिताली परिवार की जिम्मेदारियों को दिल खोल के कितनी तन्मयता व ईमानदारी से निभाते रहे हैं। आज की इस दुनियां मे ऐसे सपूत बहुत विरले ही होते हैं।" 

"हां बहन जी करन बहुत ही अच्छा है, पर इस परिवार की यह सब पुरानी बातें मुझे अभी तक नहीं पता थीं। इन बच्चों ने अपने इन सद्कर्मों को आज तक मुझसे जाहिर भी न किया। पर ये सुन के आज मेरा मस्तक भी गर्व से ऊंचा हो उठा है।"

 फिर मौसी बोलीं "बचपन से ही मुझे बहुत मानता है करन। सारे कामों में मुझे जरूर याद करता है।" कहते-कहते वो छलकती आखों के बीच मुस्कुरा दीं। मौसी करन को खूब दुआएं दे रही थी की खूब तरक्की करें हमारा बेटा।

 तभी करन कमरे में आता है। मौसी से पूछा" मौसी खाना खाई ?"

" ना बेटा कोई बात नहीं, पहले बाकी मेहमानों को देख लो।"

" मौसी मकान कैसा है अच्छा लगा, कोई कमी तो नहीं? देखिए आप सब के आशीर्वाद व दुआ से मैंने आज मकान बनवा ही लिया।"

 मौसी खुश होकर बोली," बहुत ही सुंदर मकान है बेटा" तभी मिताली खाना लाकर मौसी और मम्मी को देते हुए बोली "लीजिये मौसी खाना खा लीजिए। नीचे तो बहुत भीड़ है। वहां आप खाना नहीं खा पाइगी। मैं आपके लिए खाना ऊपर ही ले आई हूं।"

 नीचे बड़ा भोज बहुत चल रहा था। सब तारीफ कर रहे थे। करन की और उसके मकान की। सभी मेहमान बातें कर रहे थे कि करन की नियत हमेशा से ही अच्छी रही। इसने हमेशा परिवार के लिये अच्छा सोचा जिसकी वजह से इतनी कम आमदनी के बाद भी भगवान ने इसको इतनी बरक्कत भी दी। 


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