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Meera Jain

Abstract

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जानवरों की हड़ताल

जानवरों की हड़ताल

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रोज रोज इंसानों के द्वारा की जा रही टिका टिप्पणी से आहत सभी जानवरों ने एकमत हो विरोध स्वरूप हड़ताल का ऐलान कर दिया बैल ने हल चलाने , गधे ने बोझा ढोने, श्वान ने रखवाली करने आदि से मना कर दिया। मालिकों द्वारा प्रताड़नाएं भी दी गई लेकिन

वे टस के मस नहीं हुए अंतत: मालिकों ने ही हथियार डाल प्यार से पूछा-

' हम लोग तुम्हारा पूरा ख्याल रखते है समय पर खाना, दाना-पानी रहने के लिए स्थान साफ सफाई , दवा आदि का पूरा ख्याल रखतेहैं फिर तुम लोगों ने हड़ताल क्यों की बताओ ?'

इस पर जानवरों ने अपना मौन तोड़ते हुए कहा-

' मालिक ! हमारे भी अपने संस्कार है उसूल है पानी सिर से ऊपर हो गया है अब हममेंऔर जिल्लत बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं बची है खाना आदि कम मिले तो हमें कोई चिंता नहीं है लेकिन--'

तभी मालिकों ने खीझते हुए पुनः प्रश्न किया-

' लेकिन क्या-----?,

उनमें से एक जानवर ने साहस कर सकुचाते हुए जवाब दिया-

' मालिक ! दरअसल बात ये है कि आपके इंसानी समाज मेआये दिन छोटी - छोटी बच्चियों से बलात्कार की घिनौनी घटनाएं हो रही हैं और आप लोग हो या मिडिया सभी की जुबां पर उस बलात्कारी के लिए घृणा स्वरूप सबसे पहला शब्द जो आता है वह होता है 'जानवर।'

अपनी बात आगे जारी रखते हुए जानवर अपनी दिल की व्यथा उजागर की -

' मालिक जी ! हम जानवर जरूर हैं किंतु दरिंदगी नहीं करते है सामने वाले की उम्र का पूरा ख्याल रखते हैं।'

जानवरों के मुख से सत्य सुन मालिकों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी आँखें शर्म से झुक गयी।

प्रस्तुत लघुकथा मे उठाई गई समस्या को हमारे समाज की सबसे घृणित , विभत्स , अनीतिगत , अस्वाभाविक , अमानवीय अपराध कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि आज नन्ही नन्ही बालिकाओं के साथ बलात्कार होने की घटना आये दिन देखने,सुनने व पढ़ने को मिलती है। अनेक

दिल को दहलाने वाली घटनाओं को देख महसूस होता है कि मनुष्य रूपी इन दरिंदों से तो जानवर ही भले।


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