हँसमुख होना कोई अपराध नहीं
हँसमुख होना कोई अपराध नहीं
एक पुराने शहर के बीचों-बीच बसा एक मोहल्ला था। वहाँ की गलियाँ बहुत चौड़ी नहीं थीं, लेकिन लोगों के दिल और उनकी बातें बहुत दूर तक जाती थीं। किसी के घर में क्या बना, कौन कहाँ गया, किसने किससे बात की, कौन किससे नाराज़ है—इन सब खबरों का आदान-प्रदान इतनी तेजी से होता था कि कई बार लोगों को अखबार की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।
उसी मोहल्ले में एक ऐसी महिला रहती थी, जिसके बारे में लगभग हर कोई कुछ न कुछ जानता था, या यूँ कहिए कि जानने का दावा करता था। उसकी पहचान केवल उसके चेहरे की सुंदरता तक सीमित नहीं थी। उसका व्यक्तित्व ऐसा था कि जहाँ से गुजरती, लोग अनायास ही उसकी ओर देख लेते। उसके चेहरे पर हमेशा एक आत्मविश्वासी मुस्कान रहती, चलने में एक सहज लय होती और बातचीत में ऐसा अपनापन कि सामने वाला कुछ देर के लिए अपने सारे तनाव भूल जाता।
वह जब सुबह घर से निकलती तो साधारण कपड़ों में भी आकर्षक लगती। वह सजना-संवरना पसंद करती थी, लेकिन उसमें दिखावे की भावना नहीं थी। उसे अच्छे कपड़े पहनना अच्छा लगता था, बाल सँवारना पसंद था और अपने व्यक्तित्व को व्यवस्थित रखना उसकी आदत थी। वह मानती थी कि खुद को अच्छे ढंग से प्रस्तुत करना आत्मसम्मान का हिस्सा है।
मोहल्ले के कई पुरुष जब उसे देखते तो सम्मानपूर्वक नमस्ते करते। वह भी मुस्कुराकर जवाब देती और दो शब्द हालचाल पूछ लेती। उसकी यही आदत धीरे-धीरे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई। कुछ लोग उसकी तारीफ करते, कुछ लोग उसकी आलोचना, और कुछ लोग दोनों काम एक साथ करते।
अक्सर देखा जाता कि मोहल्ले के बाहर रहने वाले परिचित लोग जब अपने किसी मित्र से मिलने आते तो बातचीत के दौरान उस महिला का जिक्र जरूर छेड़ देते। कोई उसकी हँसमुख प्रकृति की तारीफ करता, कोई कहता कि उसके आने से माहौल में जान आ जाती है। कुछ लोग मजाक में उसके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करते, जैसे वह कोई फिल्मी किरदार हो।
समय के साथ उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। लोगों को उसकी मुस्कुराहट अच्छी लगती थी। बच्चों से वह प्यार से बात करती, बुजुर्गों का सम्मान करती और किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में पूरे उत्साह के साथ शामिल होती। यदि किसी के घर शादी हो, जन्मदिन हो या कोई धार्मिक आयोजन हो, तो उसकी उपस्थिति से माहौल जीवंत हो जाता।
लेकिन जहाँ प्रशंसा होती है, वहाँ आलोचना भी जन्म लेती है।
मोहल्ले की कुछ महिलाएँ उसकी लोकप्रियता को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाती थीं। उन्हें लगता था कि लोगों का ध्यान उस पर जरूरत से ज्यादा जाता है। जब भी कोई उसकी तारीफ करता, उनके मन में हल्की-सी कसक पैदा हो जाती।
धीरे-धीरे यह कसक तुलना में बदलने लगी।
वे सोचतीं कि आखिर ऐसा क्या है उसमें जो लोग उसे इतना पसंद करते हैं। कुछ को उसका फैशन पसंद नहीं आता, कुछ को उसकी खुलकर हँसने की आदत। कुछ को लगता कि वह जरूरत से ज्यादा मिलनसार है।
जब वह सामने होती तो सब उससे अच्छे से बात करते, लेकिन उसके जाते ही कई बार चर्चा का विषय वही बन जाती।
कोई कहता, "बहुत होशियार है।"
कोई कहता, "हर किसी से इतनी घुलने-मिलने की क्या जरूरत है?"
कोई कहता, "ज्यादा भोली बनने की कोशिश करती है।"
हालाँकि इन बातों का कोई ठोस आधार नहीं होता था। वे केवल धारणाएँ थीं, जो लोगों के मन में बनी हुई थीं।
वास्तव में वह महिला लोगों से इसलिए अच्छी तरह मिलती थी क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा था। उसे लोगों से बातचीत करना अच्छा लगता था। वह किसी को देखकर मुस्कुरा देती, किसी का हाल पूछ लेती, किसी की समस्या सुन लेती। उसके लिए यह सामान्य व्यवहार था।
एक दिन मोहल्ले में एक छोटा-सा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। शाम को जब लोग इकट्ठा हुए तो माहौल थोड़ा शांत था। सब अपने-अपने समूहों में बैठे थे। तभी वह महिला वहाँ पहुँची।
उसने आते ही सबसे नमस्ते की, बच्चों के साथ कुछ देर बातें कीं, बुजुर्गों के पास बैठकर उनका हाल पूछा और फिर कार्यक्रम की तैयारी में लग गई।
धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा।
लोग हँसने लगे, बातचीत बढ़ गई, बच्चे और उत्साहित हो गए। कार्यक्रम पहले से कहीं ज्यादा जीवंत लगने लगा।
यह देखकर कई लोगों ने महसूस किया कि कुछ व्यक्तित्व वास्तव में अपने साथ सकारात्मक ऊर्जा लेकर चलते हैं।
लेकिन हर कोई ऐसा नहीं सोचता था।
कुछ लोगों को लगा कि वह जानबूझकर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। उन्हें उसकी लोकप्रियता से असहजता होती थी।
मानव स्वभाव भी बड़ा विचित्र है।
जब कोई व्यक्ति उदास रहता है तो लोग कहते हैं कि वह घमंडी है।
और जब कोई व्यक्ति हँसता-मुस्कुराता रहता है तो लोग कहते हैं कि वह जरूरत से ज्यादा मिलनसार है।
उस महिला के साथ भी कुछ ऐसा ही था।
यदि वह किसी पुरुष से सामान्य बातचीत कर लेती तो कुछ लोग उसके पीछे तरह-तरह की कहानियाँ गढ़ने लगते। यदि वह किसी महिला की मदद कर देती तो वही लोग उसकी प्रशंसा भी कर देते।
अर्थात लोगों की राय परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती थी।
एक और दिलचस्प बात थी।
मोहल्ले के कई पुरुष जब किसी तनाव में होते, काम के दबाव में परेशान होते या घर की समस्याओं से घिरे होते, तब यदि रास्ते में वह महिला मिल जाती और मुस्कुराकर पूछ लेती, "कैसे हैं आप?" तो उन्हें कुछ क्षणों के लिए अच्छा महसूस होता।
कारण यह नहीं था कि वे उससे कोई विशेष लगाव रखते थे।
कारण यह था कि सच्चे मन से पूछे गए दो शब्द कई बार बड़ी दवा का काम करते हैं।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग एक-दूसरे की बातें सुनने का समय नहीं निकालते। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से आपका हाल पूछ ले तो मन हल्का हो जाता है।
उस महिला की यही विशेषता थी।
वह लोगों को महत्व देती थी।
उसे यह एहसास था कि हर व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी संघर्ष से गुजर रहा है।
इसलिए वह कोशिश करती कि जहाँ तक संभव हो, लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला सके।
समय बीतता गया।
एक दिन मोहल्ले में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला बीमार पड़ गईं। कई लोग हालचाल पूछने गए, लेकिन कुछ ही दिनों बाद सब अपने कामों में व्यस्त हो गए।
वह हँसमुख महिला लगातार उनके पास जाती रही।
दवा लाना, डॉक्टर से बात करना, घर के छोटे-मोटे काम करना—वह हर संभव मदद करती रही।
तब लोगों को एहसास हुआ कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके कपड़ों, उसके रूप या उसके व्यवहार के बाहरी पहलुओं से नहीं किया जा सकता।
कई बार जो व्यक्ति सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होता है, वही सबसे अधिक संवेदनशील और मददगार निकलता है।
धीरे-धीरे कुछ लोगों की सोच बदलने लगी।
उन्होंने समझा कि किसी महिला का फैशनेबल होना, आत्मविश्वासी होना या लोगों से खुलकर बात करना उसके चरित्र का प्रमाण नहीं होता।
चरित्र का संबंध व्यक्ति के कर्मों से होता है, उसके व्यवहार से होता है, उसके नैतिक मूल्यों से होता है।
लेकिन समाज में धारणाएँ बदलने में समय लगता है।
आज भी कुछ लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें करते थे।
फिर भी उसने कभी अपने स्वभाव को नहीं बदला।
वह पहले की तरह मुस्कुराती रही।
पहले की तरह लोगों का हाल पूछती रही।
पहले की तरह सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेती रही।
उसे पता था कि यदि वह लोगों की आलोचनाओं के डर से खुद को बदलने लगेगी तो वह अपनी असली पहचान खो देगी।
एक दिन उसकी एक परिचित महिला ने उससे पूछा, "तुम्हें बुरा नहीं लगता जब लोग तुम्हारे बारे में बातें करते हैं?"
वह मुस्कुराई और बोली,
"शुरू में लगता था। लेकिन बाद में समझ में आया कि लोग अक्सर उसी के बारे में ज्यादा बात करते हैं जो दिखाई देता है। जो व्यक्ति भीड़ में अलग नजर आता है, वह चर्चा का विषय बनता ही है। अब मैं इस बात की चिंता नहीं करती कि लोग क्या सोचते हैं। मैं बस यह देखती हूँ कि मेरे व्यवहार से किसी को चोट न पहुँचे।"
उसकी यह बात सुनकर सामने वाली महिला कुछ देर चुप रही।
वास्तव में यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
दुनिया में हर व्यक्ति चाहता है कि लोग उसे पसंद करें, उसकी सराहना करें और उसे महत्व दें। यह केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पुरुषों का भी स्वभाव है।
हर कोई चाहता है कि उसकी उपस्थिति महसूस की जाए।
फर्क केवल इतना है कि कुछ लोग इसे खुले तौर पर व्यक्त करते हैं और कुछ लोग मन ही मन।
लेकिन किसी का आकर्षक व्यक्तित्व, उसकी सुंदरता, उसका आत्मविश्वास या उसकी मिलनसार प्रकृति उसे गलत साबित नहीं करती।
गलत तब होता है जब हम बिना किसी प्रमाण के केवल धारणाओं के आधार पर किसी के चरित्र का निर्णय करने लगते हैं।
समाज में अक्सर हँसमुख लोगों को गलत समझ लिया जाता है।
जो व्यक्ति सबके साथ अच्छा व्यवहार करता है, उसे कई बार लोग बनावटी मान लेते हैं।
जो व्यक्ति सजना-संवरना पसंद करता है, उसे दिखावटी कह दिया जाता है।
जो व्यक्ति आत्मविश्वास से भरा होता है, उसे घमंडी समझ लिया जाता है।
जबकि सच्चाई कई बार इससे बिल्कुल अलग होती है।
उस महिला की कहानी भी यही सिखाती है कि किसी व्यक्ति को उसके बाहरी रूप, उसके फैशन, उसकी मुस्कान या उसकी लोकप्रियता के आधार पर नहीं आँकना चाहिए।
हो सकता है कि जिसके बारे में लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हों, वही व्यक्ति सबसे ज्यादा दयालु हो।
हो सकता है कि जिसकी हँसी पर लोग सवाल उठाते हों, वही किसी दुखी इंसान के जीवन में उम्मीद की किरण बन जाए।
और हो सकता है कि जिस आत्मविश्वास को लोग गलत समझ रहे हों, वह वर्षों के संघर्ष और आत्मनिर्माण का परिणाम हो।
इसलिए किसी भी व्यक्ति के बारे में राय बनाने से पहले उसके व्यवहार, उसके कर्म और उसकी नीयत को समझना आवश्यक है।
क्योंकि मुस्कुराना कोई अपराध नहीं है।
खुश रहना कोई दोष नहीं है।
सजना-संवरना कोई कमजोरी नहीं है।
और मिलनसार होना किसी भी दृष्टि से चरित्रहीनता का प्रमाण नहीं हो सकता।
अंततः इंसान की पहचान उसके रूप से नहीं, उसके गुणों से होती है। और जो लोग दूसरों के जीवन में मुस्कान बाँटते हैं, वे समाज के लिए हमेशा मूल्यवान होते हैं, चाहे उनके बारे में लोग कुछ भी कहते रहें।
संजीवन कुमार सिंह

