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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Fantasy Inspirational

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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Fantasy Inspirational

टूटते रिश्तों के बीच एक पुरुष

टूटते रिश्तों के बीच एक पुरुष

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समय बदल रहा था, समाज बदल रहा था, रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही थीं। लेकिन एक चीज़ थी जो हर दौर में लगभग वैसी ही रही—भावनाओं का बोझ। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले लोग उस बोझ को परिवार, समाज और रिश्तों के सहारे बाँट लिया करते थे, और अब अधिकतर लोग उसे अकेले ढोने लगे थे।


संजीवन कुमार सिंह

एक छोटे से शहर में रहने वाला एक युवक था। साधारण परिवार से था, सपने भी साधारण थे। उसे किसी महल की इच्छा नहीं थी, न बड़ी गाड़ियों का मोह था। वह बस इतना चाहता था कि कोई उसे समझे, उसके साथ खड़ा रहे, उसके संघर्षों को अपना संघर्ष माने। उसे विश्वास था कि प्रेम सिर्फ आकर्षण नहीं होता, प्रेम वह होता है जहाँ दो लोग एक-दूसरे की कमियों को भी स्वीकार करते हैं। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में एक लड़की आई। बातचीत शुरू हुई। पहले हालचाल पूछने तक सीमित बातें थीं, फिर दिनभर की आदत बन गईं। सुबह की पहली शुभकामना और रात का आखिरी संदेश दोनों एक-दूसरे के नाम होने लगे। युवक को लगने लगा कि अब उसकी जिंदगी अकेली नहीं रही। उसने उस रिश्ते को बहुत गंभीरता से लिया। वह हर छोटी चीज़ का ध्यान रखने लगा। कभी लड़की उदास होती तो घंटों उसे समझाता। कभी उसकी तबीयत खराब होती तो बेचैन हो जाता। कभी उसके सपनों की बातें सुनता तो खुद के सपनों से पहले उसके सपनों को रखने लगता। धीरे-धीरे युवक का संसार उसी रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमने लगा। उसने अपने दोस्तों से दूरी बना ली, अपने कई शौक छोड़ दिए। उसे लगता था कि प्रेम में त्याग करना ही सच्चा प्रेम होता है। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कुछ महीनों बाद उसने महसूस किया कि लड़की बदल रही है। अब पहले जैसी बातें नहीं रहीं। कॉल छोटे होने लगे। संदेशों में अपनापन कम होने लगा। जहाँ पहले हर बात साझा होती थी, अब “व्यस्त हूँ” और “बाद में बात करती हूँ” जैसे शब्द बढ़ने लगे। युवक बेचैन रहने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि गलती कहाँ हुई है। वह खुद को बदलने लगा। कभी अधिक ध्यान देने लगा, कभी दूरी बनाने की कोशिश की, कभी नाराज़ हुआ, कभी रोया… लेकिन रिश्ता पहले जैसा नहीं हुआ। एक दिन लड़की ने साफ शब्दों में कह दिया कि अब वह इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। उस एक वाक्य ने युवक की पूरी दुनिया हिला दी। जिस इंसान के लिए उसने अपने भविष्य की कल्पना की थी, वही इंसान अब उसके भविष्य में रहना नहीं चाहता था। उसके भीतर बहुत कुछ टूट गया। उसने पूछना चाहा— “क्या मेरा प्रेम कम था?” “क्या मेरी नीयत गलत थी?” “क्या मैंने साथ निभाने में कोई कमी छोड़ी थी?” लेकिन कई सवालों के जवाब नहीं होते। कुछ समय बाद उसे पता चला कि लड़की किसी और के करीब है। किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसके पास बेहतर नौकरी थी, अधिक पैसा था, ज्यादा सुरक्षित भविष्य था। युवक ने पहली बार खुद को बेहद छोटा महसूस किया। उसे लगा जैसे प्रेम की जगह तुलना ने ले ली हो। वह कई रातों तक सो नहीं पाया। दर्द उसे अंदर से खाता रहा। वह लोगों के बीच रहकर भी अकेला हो गया। उसने कई बार चाहा कि किसी से खुलकर बात करे, लेकिन हर बार रुक गया। क्योंकि समाज पुरुषों को रोने की अनुमति नहीं देता। अगर कोई लड़की धोखा खाती है, तो लोग उसकी पीड़ा सुनते हैं। उसके लिए सहानुभूति दिखाई जाती है। लेकिन जब कोई लड़का टूटता है, तो अधिकतर लोग कहते हैं— “भूल जा।” “और मिल जाएँगी।” “इतना क्यों सोच रहा है?” जैसे उसके दर्द की कोई कीमत ही न हो। धीरे-धीरे युवक अवसाद में जाने लगा। उसे काम में मन नहीं लगता था। खाना कम हो गया। लोगों से मिलना बंद कर दिया। वह सिर्फ पुराने संदेश पढ़ता रहता और सोचता कि जो इंसान कभी उसके बिना एक दिन नहीं रह पाता था, वह आज बिना पीछे देखे कैसे चला गया। उसके मन में कई बार गुस्सा भी आया। लेकिन उसने कभी बदला लेने की नहीं सोची। उसने कभी लड़की को बदनाम नहीं किया। न उसके खिलाफ शिकायत की। न उसके चरित्र पर सवाल उठाए। वह सिर्फ चुप हो गया। समय बीतता गया। घरवालों ने समझाया कि जिंदगी किसी एक रिश्ते पर खत्म नहीं होती। धीरे-धीरे उसने खुद को संभालना शुरू किया। वह काम में लग गया। अपने भविष्य पर ध्यान देने लगा। लेकिन दिल के भीतर एक डर बैठ गया था— अब उसे रिश्तों पर आसानी से भरोसा नहीं होता था। कुछ वर्षों बाद उसकी शादी हो गई। शुरुआत में सब ठीक था। नई जिंदगी, नए सपने, नया उत्साह। लेकिन शादी सिर्फ दो लोगों का साथ नहीं होती, दो परिवारों का मेल भी होती है। यहीं से कठिनाइयाँ शुरू हुईं। छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लगी। घर की जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद होने लगे। पत्नी को लगता कि उस पर बहुत अपेक्षाएँ रखी जा रही हैं। युवक को लगता कि उसके माता-पिता का सम्मान नहीं हो रहा। वह बीच में फँस गया था। एक तरफ वे लोग थे जिन्होंने उसे बचपन से पाला था। दूसरी तरफ वह रिश्ता था जिसे निभाने की जिम्मेदारी उसने खुद स्वीकार की थी। कई बार उसने प्यार से समझाने की कोशिश की। कई बार शांत रहकर बात की। लेकिन हर बातचीत अंत में झगड़े में बदल जाती। पत्नी को लगता कि उसकी स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है। युवक को लगता कि परिवार धीरे-धीरे बिखर रहा है। घर का माहौल भारी रहने लगा। धीरे-धीरे भाई अलग रहने की बात करने लगे। रसोई अलग होने लगी। एक ही घर में दीवारें खड़ी होने लगीं। माता-पिता, जिन्होंने जीवनभर अपने बच्चों को साथ रखने का सपना देखा था, अब खुद को बोझ समझने लगे। युवक भीतर से टूट रहा था। वह किसी का बुरा नहीं चाहता था। वह सिर्फ इतना चाहता था कि घर में सम्मान और संतुलन बना रहे। लेकिन आधुनिक जीवन में संतुलन बनाए रखना सबसे कठिन काम बन चुका था। समाज भी बदल चुका था। अब हर व्यक्ति अपने अधिकारों की बात तो करता था, लेकिन कर्तव्यों की बात कम करता था। पति अपने अधिकार चाहता था। पत्नी अपनी स्वतंत्रता चाहती थी। माता-पिता सम्मान चाहते थे। बच्चे सुविधा चाहते थे। लेकिन कोई यह नहीं समझ पा रहा था कि रिश्ते सिर्फ अधिकारों से नहीं चलते, त्याग और धैर्य से भी चलते हैं। एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि मामला घर से बाहर तक पहुँच गया। रिश्तेदारों को बुलाया गया। लोग सलाह देने लगे। किसी ने पत्नी को सही बताया। किसी ने युवक को। लेकिन किसी ने यह समझने की कोशिश नहीं की कि दोनों ही अंदर से परेशान हैं। युवक को पहली बार एहसास हुआ कि पुरुष होने का मतलब सिर्फ जिम्मेदारियाँ उठाना नहीं, बल्कि कई बार चुप रहकर टूटना भी होता है। वह चाहता तो हर बात का जवाब दे सकता था। लेकिन उसने अक्सर चुप्पी चुनी। क्योंकि उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि पुरुष घर जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं। लेकिन उसकी चुप्पी को कमजोरी समझ लिया गया। धीरे-धीरे वह मानसिक रूप से थकने लगा। उसे लगने लगा कि वह किसी के लिए पर्याप्त नहीं है। न माता-पिता के लिए अच्छा बेटा बन पा रहा है, न पत्नी के लिए आदर्श पति। वह हर दिन खुद को साबित करने की कोशिश करता, लेकिन हर दिन कुछ न कुछ कमी निकाल दी जाती। रात में वह छत पर बैठकर देर तक सोचता रहता। उसे अपना पुराना प्रेम याद आता। फिर वर्तमान की उलझनें याद आतीं। उसे लगता कि जिंदगी में पुरुषों के दर्द पर बहुत कम बात होती है। समाज पुरुषों को मजबूत मान लेता है। लेकिन मजबूत दिखने वाले लोग भी भीतर से टूटते हैं। वे भी रोना चाहते हैं। वे भी समझे जाना चाहते हैं। वे भी चाहते हैं कि कोई उनसे पूछे— “तुम ठीक हो?” लेकिन अक्सर उनसे सिर्फ यह पूछा जाता है— “कमाते कितना हो?” “जिम्मेदारी निभा रहे हो या नहीं?” “घर क्यों नहीं संभाल पा रहे?” धीरे-धीरे युवक ने समझ लिया कि रिश्तों में जीतने से ज्यादा जरूरी उन्हें बचाना होता है। उसने अपने भीतर के अहंकार को कम किया। पत्नी की परेशानियों को समझने की कोशिश की। पत्नी ने भी धीरे-धीरे महसूस किया कि हर बार विरोध करना समाधान नहीं होता। दोनों ने बैठकर बात करना शुरू किया। पहली बार उन्होंने बहस नहीं, संवाद किया। युवक ने कहा— “मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता, बस चाहता हूँ कि घर टूटे नहीं।” पत्नी ने कहा— “मैं भी घर तोड़ना नहीं चाहती, बस खुद को अनसुना महसूस नहीं करना चाहती।” यहीं से बदलाव शुरू हुआ। धीरे-धीरे दोनों ने एक-दूसरे के नजरिए को समझना शुरू किया। पत्नी ने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को स्वीकार किया। युवक ने भी यह समझा कि सम्मान सिर्फ उम्र के आधार पर नहीं, व्यवहार के आधार पर भी मिलता है। घर में छोटे-छोटे बदलाव आने लगे। बातचीत बढ़ी। झगड़े कम हुए। माता-पिता के चेहरे पर भी सुकून लौटने लगा। युवक ने तब महसूस किया कि हर रिश्ता सिर्फ एक पक्ष की गलती से नहीं टूटता। कई बार दोनों तरफ दर्द होता है, दोनों तरफ अपेक्षाएँ होती हैं, दोनों तरफ असुरक्षाएँ होती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग सुनना बंद कर देते हैं। समाज में सचमुच ऐसे पुरुष भी हैं जो गलत होते हैं। जो धोखा देते हैं, अत्याचार करते हैं, भावनाओं से खेलते हैं। लेकिन यह भी सच है कि हर पुरुष एक जैसा नहीं होता। ठीक वैसे ही जैसे हर महिला गलत नहीं होती। कुछ महिलाएँ भी रिश्तों को पूरे समर्पण से निभाती हैं। वे परिवार जोड़ती हैं, संघर्ष में साथ खड़ी रहती हैं, अपने सपनों से पहले परिवार को रखती हैं। और कुछ पुरुष भी ऐसे होते हैं जो सिर्फ सम्मान और अपनापन चाहते हैं। इसलिए किसी एक अनुभव के आधार पर पूरे स्त्री या पुरुष समाज को गलत कहना उचित नहीं। रिश्ते कानून के डर से नहीं, विश्वास से चलते हैं। घर अधिकारों की लड़ाई से नहीं, आपसी समझ से बचते हैं। अगर प्रेम में सिर्फ लाभ देखा जाएगा, तो भावनाएँ मर जाएँगी। अगर विवाह में सिर्फ स्वतंत्रता या नियंत्रण की लड़ाई होगी, तो परिवार बिखर जाएँगे। हर रिश्ते में दोनों पक्षों को समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आते हैं। समय के साथ युवक ने अपने दर्द को कमजोरी नहीं, अनुभव मान लिया। अब वह पहले जैसा भावुक नहीं था, लेकिन कठोर भी नहीं बना। उसने सीखा कि प्रेम करना गलत नहीं, लेकिन खुद को खो देना गलत है। सम्मान देना जरूरी है, लेकिन आत्मसम्मान खो देना नहीं। घर बचाना अच्छी बात है, लेकिन संवाद के बिना कोई घर नहीं बच सकता। उसकी जिंदगी ने उसे एक बात जरूर सिखाई— रिश्तों में सबसे ज्यादा जरूरत न्याय की नहीं, संवेदनशीलता की होती है। क्योंकि जहाँ सिर्फ आरोप बचते हैं, वहाँ रिश्ते मर जाते हैं… और जहाँ संवाद बचा रहता है, वहाँ टूटे हुए लोग भी फिर से जीना सीख जाते हैं।


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