सिर्फ कमाने वाली मशीन नहीं था वो
सिर्फ कमाने वाली मशीन नहीं था वो
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पूरा मोहल्ला धीरे-धीरे नींद में डूब रहा था, लेकिन उस घर की खिड़की से अब भी हल्की पीली रोशनी बाहर झाँक रही थी। बाहर से देखने पर वह घर बिल्कुल सामान्य लगता था। पक्की दीवारें, लोहे का गेट, बरामदे में रखा एक पुराना सोफा, और दरवाज़े के पास टंगी बच्चों की स्कूल ड्रेसें। देखने वाले यही कहते कि परिवार अच्छा-खासा है। कमाने वाला आदमी है, बच्चे स्कूल जाते हैं, घर में किसी चीज़ की कमी नहीं है। लेकिन हर चमकती हुई दीवार के पीछे सन्नाटे की एक दरार होती है, जिसे बाहर वाले नहीं देख पाते। उस घर के अंदर भी एक ऐसी ही दरार धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी। कमरे में बैठा वह आदमी सिर झुकाए चुप था। सामने स्टील की थाली में रखा खाना ठंडा हो चुका था। रोटी सख्त हो गई थी और दाल की सतह पर मलाई जम चुकी थी। वह कई मिनटों से उसी थाली को देख रहा था, जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि भूख लगी भी है या नहीं। अचानक भीतर से तेज आवाज़ आई— “दिन भर बाहर घूमते रहते हो, घर की कोई जिम्मेदारी है भी या नहीं?” वह चुप रहा। “कमाते हो तो कौन-सा एहसान करते हो? हर आदमी कमाता है।” वह फिर भी चुप रहा। उसने धीरे से पानी का गिलास उठाया, लेकिन हाथ इतने कांप रहे थे कि आधा पानी मेज पर गिर गया। पास बैठे छोटे बच्चे ने डरते हुए अपने पिता को देखा। बच्चा शायद अभी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि रिश्तों की राजनीति समझ सके, लेकिन इतना जरूर समझता था कि घर में जब आवाजें ऊँची होती हैं, तब उसे चुपचाप अपने कमरे में चले जाना चाहिए। बड़ा बेटा किताब खोलकर बैठा था, मगर उसकी आँखें किताब पर नहीं थीं। वह हर आवाज़ पर चौकन्ना हो जाता था। उसे गणित का सवाल समझ नहीं आ रहा था, क्योंकि उसके दिमाग में सवाल कुछ और चल रहे थे— “क्या हर घर ऐसा ही होता है?” “क्या बड़े होने का मतलब हमेशा तनाव में रहना होता है?” “क्या पिता हमेशा ऐसे ही चुप रहते हैं?” उस रात फिर वही हुआ जो लगभग हर रात होता था। ताने… बहस… कटु शब्द… पुरानी बातें… कमाई का हिसाब… रिश्तेदारों की तुलना… और अंत में एक लंबा सन्नाटा। उस आदमी ने धीरे से चप्पल पहनी और घर से बाहर निकल गया। रात की सड़कें अक्सर उन लोगों को पहचानती हैं, जो भीतर से टूट चुके होते हैं। वह बिना किसी दिशा के चलता रहा। चौराहे के पास एक छोटी-सी दुकान खुली थी। वहाँ कुछ लोग बैठे शराब पी रहे थे। कोई जोर-जोर से हँस रहा था, कोई अपनी तकलीफ को मज़ाक में छिपा रहा था। दुकानदार ने उसे देखा और बिना कुछ पूछे बोला— “आज बहुत देर कर दी।” उसने बस हल्की मुस्कान दी। असल में, वह वहाँ शराब पीने नहीं आता था। वह वहाँ कुछ देर के लिए अपने दिमाग की आवाज़ बंद करने आता था। कुछ लोग मंदिर जाकर शांति खोजते हैं। कुछ लोग संगीत में खो जाते हैं। कुछ लोग किताबें पढ़ते हैं। और कुछ लोग नशे में कुछ घंटों की बेहोशी तलाशते हैं। हर आदमी की लड़ाई अलग होती है। उसने गिलास हाथ में लिया और एक ही साँस में खाली कर दिया। शायद वह शराब नहीं पी रहा था, बल्कि अपने भीतर जमा चीखों को निगल रहा था। पास बैठे एक आदमी ने हँसते हुए कहा— “भाई, घरवाली फिर लड़ पड़ी क्या?” उसने कोई जवाब नहीं दिया। क्योंकि कभी-कभी आदमी बोलना छोड़ देता है। उसे लगता है कि अब उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। धीरे-धीरे उसकी आदत बढ़ने लगी। पहले महीने में एक-दो बार। फिर हफ्ते में। फिर लगभग हर रात। घर वालों को लगने लगा कि वह बिगड़ गया है। लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि वह टूटा कब था। समय गुजरता गया। घर का माहौल पहले से ज्यादा भारी होने लगा। छोटी-छोटी बातों पर अपमान होने लगा। कभी उसकी कमाई कम बताई जाती, कभी दूसरे लोगों से तुलना की जाती। “देखो सामने वाले को…” “उसने नया घर बना लिया…” “उसकी पत्नी कितनी खुश रहती है…” “तुमसे तो कोई उम्मीद ही नहीं…” ये शब्द धीरे-धीरे आदमी के भीतर की मिट्टी को काटते रहते हैं। एक दिन दफ्तर में बैठा वह फाइल देख रहा था, लेकिन अक्षर धुंधले पड़ रहे थे। रात भर की लड़ाई उसके कानों में गूंज रही थी। बॉस कुछ पूछ रहा था और वह सुन ही नहीं पा रहा था। उसके साथी बोले— “तुम बहुत बदल गए हो।” वह बस मुस्कुरा दिया। अंदर से टूट चुका आदमी अक्सर मुस्कुराना सीख जाता है, क्योंकि उसे पता होता है कि लोग दर्द नहीं, सिर्फ चेहरा देखते हैं। घर लौटने का मन अब उसका कम ही करता था। वह देर तक बाहर बैठा रहता। कभी पार्क में। कभी स्टेशन पर। कभी सड़क किनारे चाय की दुकान पर। उसे भीड़ अच्छी लगने लगी थी, क्योंकि भीड़ सवाल नहीं पूछती। एक रात वह घर लौटा तो फिर वही झगड़ा शुरू हो गया। “तुम्हें परिवार की परवाह ही नहीं है…” “बच्चों के लिए क्या किया तुमने?” “तुम आदमी कहलाने लायक भी नहीं…” उस रात पहली बार उसकी आँखों से आँसू निकले। लेकिन उसने आँसू पोंछ लिए। क्योंकि समाज ने पुरुषों को रोना नहीं सिखाया। उन्हें सिर्फ सहना सिखाया है। उसने सोचा— “शायद सच में मेरी कोई कीमत नहीं…” “शायद मैं सिर्फ पैसा कमाने की मशीन हूं…” “शायद मेरे होने या न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ेगा…” अवसाद धीरे-धीरे इंसान की सोच बदल देता है। वह आदमी जो कभी अपने बच्चों के लिए खिलौने खरीदते समय मुस्कुराता था, अब बाजार से गुजरते हुए भी खाली महसूस करता था। उसे त्योहार अच्छे नहीं लगते थे। उसे रिश्तेदारों की आवाजें बोझ लगती थीं। उसे घर का दरवाज़ा जेल जैसा लगने लगा था। उसकी नींद टूटने लगी। भूख खत्म होने लगी। चेहरा बुझ गया। लेकिन दुनिया अब भी कह रही थी— “सब ठीक तो है?” और वह हर बार कह देता— “हाँ, सब ठीक है।” क्योंकि आदमी अक्सर अपने सबसे बड़े दर्द को सबसे छोटे शब्दों में छिपा देता है। एक दिन उसके छोटे बेटे ने मासूमियत से पूछा— “पापा… आप पहले ज्यादा हँसते थे, अब क्यों नहीं हँसते?” वह कुछ सेकंड तक बच्चे को देखता रहा। उसके पास कोई जवाब नहीं था। उस रात उसने बहुत देर तक खुद को आईने में देखा। चेहरा वही था। लेकिन आदमी बदल चुका था। उसे महसूस हुआ कि वह धीरे-धीरे भीतर से खत्म हो रहा है। वह अब किसी से बात नहीं करता था। फोन उठाना बंद। दोस्तों से मिलना बंद। त्योहारों में जाना बंद। अवसाद इंसान को सबसे पहले दुनिया से नहीं, खुद से दूर करता है। फिर एक दिन घर में रिश्तेदार आए। बातों-बातों में फिर वही पुरानी बातें निकल आईं। कमाई। जमीन। पैसा। ससुराल। तुलना। अपमान। उसने महसूस किया कि कमरे में मौजूद हर व्यक्ति उससे कुछ चाहता है— कोई पैसा, कोई सुविधा, कोई लाभ, कोई स्वार्थ। लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा था कि वह कैसा है। उस रात वह छत पर जाकर बैठ गया। आसमान बिल्कुल शांत था। नीचे दुनिया चल रही थी। कहीं टीवी की आवाज़, कहीं बच्चों की हँसी, कहीं बर्तनों की खनक। लेकिन उसके भीतर सब खत्म हो चुका था। उसने सोचा— “अगर मैं चला जाऊँ तो क्या होगा?” “कुछ दिन लोग रोएँगे…” “फिर सब सामान्य हो जाएगा…” “शायद मेरे बिना सब ज्यादा खुश रहें…” अवसाद इंसान को सच नहीं दिखाता। वह उसे सिर्फ अंधेरा दिखाता है। उसे लगा कि अब उसके पास बचा ही क्या है। उसने अपने बच्चों की तस्वीर देखी। कुछ पल के लिए उसके हाथ कांपे। लेकिन दर्द जब बहुत पुराना हो जाए, तो इंसान सही और गलत का फर्क भी खोने लगता है। सुबह जब घर का दरवाज़ा नहीं खुला, तब लोगों को शक हुआ। कमरा अंदर से बंद था। आवाज़ें दी गईं। दरवाज़ा पीटा गया। लेकिन अंदर अब सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा, जो हमेशा के लिए घर में बस जाने वाला था। पूरा मोहल्ला जमा हो गया। जो लोग कल तक कहते थे— “इतनी अच्छी जिंदगी थी…” आज वही कह रहे थे— “पता नहीं क्यों कर लिया…” लेकिन सच्चाई यह थी कि आत्महत्या एक दिन में नहीं होती। वह धीरे-धीरे होती है। हर ताने में थोड़ा-थोड़ा। हर अपमान में थोड़ा-थोड़ा। हर अनसुनी भावना में थोड़ा-थोड़ा। हर अकेली रात में थोड़ा-थोड़ा। उसके जाने के बाद सबसे ज्यादा बदला उसका घर। अब वहाँ लड़ाई नहीं होती थी। लेकिन शांति भी नहीं थी। बच्चे अचानक बड़े हो गए थे। बड़ा बेटा अब ज्यादा नहीं बोलता था। उसने पढ़ाई में खुद को झोंक दिया, लेकिन उसके भीतर एक डर बैठ चुका था। छोटा बच्चा हर रात दरवाज़े की तरफ देखता, जैसे अभी उसके पिता लौट आएँगे। और वह स्त्री… वह भी टूट चुकी थी। क्योंकि कभी-कभी इंसान गुस्से में ऐसे शब्द बोल देता है, जिनका भार जिंदगी भर उठाना पड़ता है। उसे अब समझ आने लगा था कि रोज़-रोज़ की कटुता किसी इंसान को अंदर से मार सकती है। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। धीरे-धीरे लोगों ने उस घटना को भूलना शुरू कर दिया। दुनिया हमेशा आगे बढ़ जाती है। लेकिन कुछ जख्म घर की दीवारों में रह जाते हैं। उस कमरे में अब भी उसकी पुरानी घड़ी टंगी थी। उसकी चप्पल दरवाज़े के पास रखी थी। उसके कपड़ों से अब भी हल्की खुशबू आती थी। और हर चीज़ जैसे एक ही सवाल पूछ रही थी— “क्या सच में उसे सिर्फ पैसे कमाने वाली मशीन समझ लिया गया था?” समाज अक्सर पुरुषों के दर्द को गंभीरता से नहीं लेता। अगर कोई स्त्री रो दे, तो लोग पूछते हैं— “क्या हुआ?” लेकिन अगर कोई पुरुष चुप हो जाए, तो लोग कहते हैं— “मर्द बनो।” यही सबसे बड़ी त्रासदी है। हर पुरुष गलत नहीं होता। हर स्त्री भी गलत नहीं होती। लेकिन जब किसी रिश्ते में सम्मान खत्म हो जाए, संवाद खत्म हो जाए, और हर दिन सिर्फ आरोप बच जाएँ, तब घर धीरे-धीरे घर नहीं रहता। वह युद्धभूमि बन जाता है। और उस युद्ध में सबसे पहले बच्चों का बचपन मरता है। फिर रिश्ते। फिर विश्वास। और अंत में इंसान। किसी भी इंसान को इतना अकेला मत छोड़िए कि उसे अपनी मौत ही शांति लगने लगे। क्योंकि अवसाद दिखाई नहीं देता। वह मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपा रहता है। जो आदमी रोज़ सबको हँसाता है, जरूरी नहीं कि वह खुद खुश हो। जो हर महीने पैसा भेजता है, जरूरी नहीं कि उसके भीतर सुकून भी हो। जो चुप रहता है, जरूरी नहीं कि उसे दर्द नहीं होता। कई बार सबसे ज्यादा टूटा हुआ इंसान वही होता है, जो सबसे कम शिकायत करता है। रिश्तों में बहस हो सकती है। मतभेद भी हो सकते हैं। लेकिन शब्दों की मर्यादा कभी नहीं टूटनी चाहिए। क्योंकि तलवार का घाव भर जाता है, मगर अपमान के शब्द भीतर हमेशा गूंजते रहते हैं। किसी इंसान की मानसिक स्थिति को कमजोरी मत कहिए। हर व्यक्ति की सहने की क्षमता अलग होती है। कोई जल्दी टूट जाता है, कोई देर से, और कोई पूरी जिंदगी टूटकर भी जीता रहता है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि जब आपका अपना इंसान चुप रहने लगे, अकेला रहने लगे, हर समय थका-थका दिखे, छोटी-छोटी बातों पर टूटने लगे, तब उसे ताने नहीं, सहारा दीजिए। क्योंकि जिंदगी पैसे से नहीं, मन की शांति से चलती है। घर बड़ा होने से सुख नहीं आता। महंगी चीज़ों से सुकून नहीं आता। सुकून आता है सम्मान से, अपनेपन से, दो मीठे शब्दों से, और इस एहसास से कि— “कोई है जो मुझे समझता है।” वरना बाहर से हँसते हुए बहुत से लोग भीतर ही भीतर रोज़ मरते रहते हैं।

