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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Classics Children

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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Classics Children

जिस शिक्षक ने आँखें बंद कर लीं

जिस शिक्षक ने आँखें बंद कर लीं

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एक छोटे से कस्बे के पुराने विद्यालय में एक वृद्ध शिक्षक वर्षों तक बच्चों को पढ़ाते रहे। उनका स्वभाव शांत, सरल और अत्यंत विनम्र था। वे उन शिक्षकों में से नहीं थे जो ऊँची आवाज़ में डाँटकर बच्चों को अनुशासन सिखाते हैं। उनकी आँखों में कठोरता नहीं, बल्कि अपनापन बसता था। विद्यालय के बच्चे उनसे डरते कम और सम्मान अधिक करते थे। समय बीतता गया, नई पीढ़ियाँ आती रहीं और पुरानी विदा होती रहीं। अंततः एक दिन वह समय भी आया जब शिक्षक ने सेवा निवृत्ति ले ली।
अब उनका जीवन बहुत साधारण हो गया था। सुबह जल्दी उठना, घर के बाहर तुलसी में जल देना, पुराने अख़बार पढ़ना और कभी-कभी विद्यालय के दिनों को याद कर लेना — यही उनकी दिनचर्या थी। उम्र के साथ शरीर कमजोर हो चुका था, पर मन अब भी वैसा ही शांत था।
एक दिन शाम के समय वह कस्बे के पुराने पार्क में अकेले बैठे थे। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। बच्चे खेल रहे थे, पक्षियों की आवाज़ वातावरण को मधुर बना रही थी। तभी एक युवक धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा। उसके चेहरे पर उत्सुकता और भावुकता दोनों साफ दिखाई दे रहे थे। वह शिक्षक के सामने जाकर रुका और विनम्र स्वर में बोला—
“क्या आप मुझे पहचानते हैं?”
बुजुर्ग शिक्षक ने अपनी धुंधली आँखों से युवक को गौर से देखा। कुछ क्षण तक सोचते रहे, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“नहीं बेटा, शायद मैं पहचान नहीं पा रहा।”
युवक मुस्कुराया। उसकी आँखों में आदर साफ झलक रहा था। उसने कहा—
“मैं आपका छात्र रहा हूँ।”
यह सुनते ही शिक्षक के चेहरे पर अपनापन आ गया। उन्होंने युवक को पास बैठने का इशारा किया और पूछा—
“अच्छा! अब क्या करते हो जीवन में?”
युवक ने गर्व और विनम्रता के मिश्रित स्वर में उत्तर दिया—
“मैं भी अब एक शिक्षक हूँ।”
बुजुर्ग शिक्षक ने प्रसन्न होकर कहा—
“बहुत अच्छा! मतलब तुमने भी शिक्षा का मार्ग चुना।”
युवक ने धीरे से कहा—
“जी, और सच कहूँ तो इसकी प्रेरणा मुझे आपसे मिली थी।”
शिक्षक यह सुनकर थोड़ा आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने उत्सुक होकर पूछा—
“मुझसे? आखिर ऐसा क्या हुआ था जिसने तुम्हें शिक्षक बनने के लिए प्रेरित किया?”
युवक कुछ क्षण शांत रहा। मानो वह वर्षों पुरानी यादों में लौट गया हो। फिर उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया—
“यह बात तब की है जब मैं आपकी कक्षा में पढ़ता था। मैं बहुत साधारण परिवार से था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं होते थे, महंगे जूते नहीं थे, और न ही कोई खास सामान। अक्सर मैं अपने सहपाठियों को देखकर मन ही मन हीन भावना महसूस करता था।
एक दिन हमारे ही एक सहपाठी के पिता शहर से लौटे थे। उन्होंने उसे एक बहुत सुंदर घड़ी लाकर दी। वह घड़ी पूरे विद्यालय में चर्चा का विषय बन गई थी। चमचमाती हुई नई घड़ी… हर बच्चा उसे देखकर आकर्षित हो रहा था।
जब मैंने वह घड़ी देखी, तो मेरा मन भी उसे पाने के लिए लालायित हो उठा। मैं बार-बार उसे देखता रहा। धीरे-धीरे मेरे मन में लालच पैदा हो गया। उस समय मैं सही और गलत के बीच का अंतर समझने के बजाय अपनी इच्छा पूरी करने के बारे में सोचने लगा।
मध्यांतर के समय जब वह सहपाठी खेलने बाहर गया, उसकी घड़ी मेज पर रखी रह गई। मैंने चारों ओर देखा। किसी का ध्यान नहीं था। उसी क्षण मैंने वह घड़ी उठाई और अपनी जेब में रख ली।
उस समय मुझे लगा कि किसी ने मुझे देखा नहीं। परंतु चोरी करने के बाद मेरा दिल बहुत तेज़ धड़कने लगा। डर, शर्म और घबराहट मेरे भीतर भर गई। मैं चाहकर भी सामान्य नहीं रह पा रहा था।
कुछ देर बाद जब वह सहपाठी वापस आया, तो उसने घड़ी गायब देखी। वह घबरा गया और रोने जैसा हो गया। उसने तुरंत आपसे शिकायत की।
आपने पूरी कक्षा को शांत कराया और कहा—
‘जिस किसी ने भी घड़ी ली है, वह बिना डरे वापस कर दे।’
आपकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। परंतु मैं इतना डर चुका था कि सच स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पाया। मैं सोचता रहा कि अगर सबको पता चल गया तो मेरी कितनी बेइज्जती होगी। सभी मुझे चोर कहेंगे। शायद विद्यालय से निकाल दिया जाऊँगा। मेरे माता-पिता की भी बदनामी होगी।
जब किसी ने घड़ी वापस नहीं की, तब आपने कक्षा का दरवाजा बंद कर दिया। आपने कहा—
‘अब हम सबकी जेबें देखेंगे, ताकि घड़ी मिल जाए। लेकिन उससे पहले आप सभी अपनी आँखें बंद कर लें।’
हम सबने आपकी बात मानी और आँखें बंद कर लीं।
उस समय मेरा शरीर कांप रहा था। मुझे लग रहा था कि अब सब खत्म हो जाएगा। मैं सोच रहा था कि जैसे ही घड़ी मेरी जेब से निकलेगी, पूरी कक्षा मुझे घृणा की नजर से देखेगी।
आप एक-एक छात्र की जेब टटोलते हुए आगे बढ़ रहे थे। जैसे-जैसे आप मेरे करीब आ रहे थे, मेरा डर बढ़ता जा रहा था।
फिर वह क्षण आया जब आपका हाथ मेरी जेब तक पहुँचा। आपने घड़ी निकाल ली।
उस पल मुझे लगा कि अब आप सबके सामने मेरा नाम लेंगे। मुझे डाँटेंगे। अपमानित करेंगे। शायद थप्पड़ भी मारें।
लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया।
आप आगे बढ़ते रहे। आपने बाकी बच्चों की जेबें भी वैसे ही देखीं। कुछ देर बाद आपने कहा—
‘अब सब आँखें खोल सकते हैं। घड़ी मिल गई है।’
बस इतना ही।
आपने किसी का नाम नहीं लिया। आपने यह नहीं बताया कि घड़ी किसके पास थी। आपने मुझे अलग से बुलाकर भी कुछ नहीं कहा। न डाँटा, न अपमानित किया।
उस दिन मैं घर लौटा तो पूरी रात सो नहीं पाया। मुझे अपने किए पर बहुत शर्म आ रही थी। लेकिन उससे भी अधिक एक बात मुझे भीतर तक छू गई थी — आपने मुझे पूरी कक्षा के सामने अपमानित होने से बचा लिया था।
अगर उस दिन आप मेरा नाम सबके सामने बता देते, तो शायद मैं जीवन भर ‘चोर’ कहलाता। बच्चे मेरा मजाक उड़ाते। शिक्षक मुझ पर भरोसा नहीं करते। शायद मैं खुद से भी नफरत करने लगता।
पर आपने मुझे गिरने से पहले संभाल लिया।
आपने मुझे सज़ा नहीं दी, बल्कि मुझे अपनी गलती समझने का अवसर दिया।
उस दिन मैंने तय कर लिया कि मैं जीवन में कभी चोरी नहीं करूँगा। और सच कहूँ, मैंने फिर कभी किसी की चीज़ को गलत तरीके से छूने तक की कोशिश नहीं की।
धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ। पढ़ाई पूरी की। जीवन में कई कठिनाइयाँ आईं। लेकिन जब भी मैं किसी गलत रास्ते की ओर बढ़ने लगता, मुझे आपका शांत चेहरा याद आ जाता।
फिर एक दिन मैंने सोचा — अगर एक शिक्षक किसी बच्चे का जीवन इस तरह बदल सकता है, तो इससे बड़ा कार्य और क्या हो सकता है?
तभी मैंने निश्चय किया कि मैं भी शिक्षक बनूँगा। मैं भी बच्चों को केवल किताबें नहीं, बल्कि इंसानियत सिखाऊँगा।”
युवक की आँखें नम हो चुकी थीं। उसकी आवाज़ भर्रा गई थी।
कुछ देर तक दोनों के बीच मौन छाया रहा।
फिर युवक ने भावुक होकर पूछा—
“क्या आपको वह घटना याद है?”
बुजुर्ग शिक्षक ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा और बोले—
“हाँ, मुझे वह घटना अच्छी तरह याद है। मुझे याद है कि एक बच्चे की घड़ी खो गई थी और मैंने सबकी जेबें देखी थीं।”
युवक ने धीरे से पूछा—
“तो क्या आपको पता था कि वह घड़ी मेरी जेब में मिली थी?”
बुजुर्ग शिक्षक ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“नहीं बेटा… क्योंकि जब मैं तुम सबकी जेबें देख रहा था, तब मैंने भी अपनी आँखें बंद कर ली थीं।”
यह सुनते ही युवक स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
बुजुर्ग शिक्षक आगे बोले—
“मैं नहीं चाहता था कि मेरे मन में किसी छात्र की छवि बदल जाए। बच्चे गलती करते हैं। यदि हर गलती पर उन्हें अपमानित किया जाए, तो वे सुधरने के बजाय टूट जाते हैं।
शिक्षक का काम केवल गलतियाँ पकड़ना नहीं होता, बल्कि किसी को गिरने से बचाना भी होता है।”
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। पार्क में अंधेरा बढ़ने लगा था। लेकिन उस क्षण युवक को ऐसा लगा मानो उसके सामने बैठा व्यक्ति केवल शिक्षक नहीं, बल्कि सच्ची शिक्षा का जीवित उदाहरण हो।
उसने झुककर शिक्षक के चरण छुए।
उस दिन युवक ने महसूस किया कि शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं है। शिक्षा वह शक्ति है जो किसी इंसान को बिना अपमानित किए बदल दे। जो गलती करने वाले को अपराधी नहीं, बल्कि सुधरने योग्य इंसान समझे।
एक कठोर शब्द कभी-कभी किसी बच्चे को जीवन भर के लिए तोड़ सकता है, जबकि एक संवेदनशील व्यवहार उसे नई दिशा दे सकता है।
सच्चा शिक्षक वही है जो विद्यार्थियों को डर से नहीं, सम्मान और विश्वास से आगे बढ़ाए।
क्योंकि अपमान से केवल भय पैदा होता है, लेकिन सम्मान से चरित्र बनता है।
और यही शिक्षा का वास्तविक सार है —
“सिखाने के लिए किसी को अपमानित करना आवश्यक नहीं होता।”
संजीवन कुमार सिंह ✍️ 


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