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Sanjeevan Kumar Singh

Classics Fantasy Others

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Sanjeevan Kumar Singh

Classics Fantasy Others

बंटवारे से पहले टूटते हैं दिल

बंटवारे से पहले टूटते हैं दिल

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 गांव की एक पुरानी गली में एक बड़ा-सा घर था। उस घर की पहचान उसकी ऊंची दीवारें या बड़ा आंगन नहीं थीं, बल्कि वह अपनापन था जो वहां रहने वाले लोगों के बीच दिखाई देता था। एक ही छत के नीचे कई लोग रहते थे। सुबह की चाय से लेकर रात के भोजन तक सब कुछ साझा था। घर का कोई भी सदस्य बाजार से कुछ लेकर आता तो वह किसी एक का नहीं, पूरे परिवार का हो जाता। उस घर में हंसी थी, शोर था, बच्चों की किलकारियां थीं, बुजुर्गों का अनुभव था और युवाओं के सपने थे। सब कुछ था। ऐसा लगता था मानो यह परिवार कभी टूट ही नहीं सकता। लेकिन समय के साथ एक बदलाव आने लगा। पहले जो लोग एक-दूसरे के बिना भोजन नहीं करते थे, वे धीरे-धीरे अलग-अलग समय पर खाने लगे। जो बातें पहले खुले आंगन में होती थीं, वे अब कमरों के बंद दरवाजों के पीछे होने लगीं। जो दिल पहले एक-दूसरे के लिए धड़कते थे, उनमें अब दूरी बढ़ने लगी। और यह केवल एक घर की कहानी नहीं थी। यह उन हजारों घरों की कहानी थी जहां लोग अक्सर एक सवाल पूछते हैं— आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो परिवार वर्षों तक एकजुट रहता है, वही धीरे-धीरे बिखरने लगता है? क्यों एक समय ऐसा आता है जब मां-बाप की आंखों में चिंता उतर आती है? क्यों भाइयों के बीच दीवारें खड़ी होने लगती हैं? क्यों रिश्तों में मिठास की जगह खामोशी ले लेती है? इन सवालों का उत्तर आसान नहीं है। समाज में अक्सर यह देखा जाता है कि जब परिवार में कोई विवाद होता है, तब हर व्यक्ति अपने-अपने दृष्टिकोण से सोचने लगता है। कोई अपने माता-पिता को सही मानता है, कोई अपने जीवनसाथी को, कोई अपने बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता देता है। यहीं से संघर्ष शुरू होता है। एक तरफ वह मां होती है जिसने अपने बच्चे को जन्म दिया, उसे चलना सिखाया, बोलना सिखाया, उसके लिए अनगिनत रातें जागकर बिताईं। दूसरी तरफ वह जीवनसाथी होती है जो अपना घर छोड़कर एक नए परिवार में आती है और उम्मीद करती है कि उसे वहां अपनापन मिलेगा। समस्या तब पैदा होती है जब इन दोनों रिश्तों को प्रतिस्पर्धी बना दिया जाता है। जब एक रिश्ते को बचाने के लिए दूसरे रिश्ते को कमजोर किया जाने लगता है। जब सम्मान की जगह तुलना आ जाती है। जब अधिकार की जगह अहंकार आ जाता है। और धीरे-धीरे घर का वातावरण बदलने लगता है। एक समय था जब संयुक्त परिवारों में सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे। एक ही चूल्हे पर खाना बनता था। रसोई केवल भोजन बनाने की जगह नहीं थी, वह रिश्तों को जोड़ने का स्थान भी थी। लेकिन धीरे-धीरे अलग चूल्हों का चलन बढ़ने लगा। कई बार इसके पीछे मजबूरी होती है। कई बार परिस्थितियां होती हैं। लेकिन कई बार इसके पीछे केवल संवाद की कमी होती है। एक छोटी-सी गलतफहमी, एक अनकही बात, एक चोट पहुंचाने वाला शब्द—और रिश्तों में दरार पड़ने लगती है। जो भाई बचपन में एक-दूसरे के लिए लड़ जाया करते थे, वे संपत्ति के कुछ हिस्सों के लिए अदालतों के चक्कर लगाने लगते हैं। जो लोग कभी एक-दूसरे की खुशी में सबसे आगे खड़े होते थे, वे एक-दूसरे की सफलता से असहज होने लगते हैं। और फिर लोग कहते हैं— "समय बदल गया है।" लेकिन क्या केवल समय बदला है? या हमने रिश्तों को समझने का तरीका बदल दिया है? कभी-कभी यह भी देखने को मिलता है कि परिवारों में संपत्ति को लेकर विवाद तब शुरू होते हैं जब नई जिम्मेदारियां जुड़ती हैं। पहले जहां परिवार का हर सदस्य पूरे घर के बारे में सोचता था, वहीं बाद में सोच का दायरा छोटा होने लगता है। "हमारा" शब्द धीरे-धीरे "मेरा" में बदल जाता है। और यही परिवर्तन सबसे खतरनाक होता है। क्योंकि परिवार संपत्ति से नहीं, त्याग से चलते हैं। यदि केवल धन ही परिवारों को जोड़ सकता, तो सबसे अमीर परिवार कभी नहीं टूटते। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। दुनिया में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहां अपार संपत्ति होने के बावजूद रिश्ते टूट गए। और ऐसे भी उदाहरण हैं जहां सीमित संसाधनों में भी परिवार प्रेमपूर्वक साथ रहते हैं। इसका कारण स्पष्ट है। रिश्ते आर्थिक आधार पर नहीं, भावनात्मक आधार पर टिके होते हैं। आज समाज में एक और चिंता तेजी से बढ़ रही है। लोग मानसिक रूप से अकेले होते जा रहे हैं। बाहरी दुनिया में सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर बहुत कुछ टूट रहा होता है। कई लोग अपनी समस्याएं किसी से साझा नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि उनकी भावनाओं को कोई नहीं समझेगा। विशेषकर पुरुषों के बारे में समाज ने एक धारणा बना ली है कि उन्हें मजबूत होना चाहिए, रोना नहीं चाहिए, अपनी तकलीफ नहीं दिखानी चाहिए। बचपन से उन्हें यही सिखाया जाता है। "मजबूत बनो।" "आंसू मत बहाओ।" "कमजोरी मत दिखाओ।" परिणाम यह होता है कि वे अपने दर्द को भीतर ही भीतर दबाते रहते हैं। और जब भावनाओं का बोझ बहुत बढ़ जाता है, तब उसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ता है। इसीलिए यह समझना जरूरी है कि भावनाएं केवल महिलाओं की नहीं होतीं। पुरुष भी दुखी होते हैं। उन्हें भी उपेक्षा महसूस होती है। उन्हें भी सम्मान, प्रेम और अपनापन चाहिए होता है। उन्हें भी यह जानने की आवश्यकता होती है कि कोई उनकी बात सुनने वाला है। कोई उनकी भावनाओं को महत्व देता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि केवल पुरुष ही पीड़ित होते हैं। महिलाएं भी अनेक चुनौतियों का सामना करती हैं। वे भी अपने परिवार से दूर होकर नए वातावरण में आती हैं। वे भी अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों के दबाव में रहती हैं। वे भी सम्मान और प्रेम चाहती हैं। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं है। समाधान समझदारी में है। समाधान संतुलन में है। समाधान इस बात में है कि परिवार का हर सदस्य दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करे। यदि एक मां अपने बेटे के जीवनसाथी को बेटी की तरह स्वीकार करे। यदि एक बहू अपने सास-ससुर को अपने माता-पिता जैसा सम्मान दे। यदि बेटा दोनों पक्षों के बीच न्याय और संतुलन बनाए रखे। यदि भाई संपत्ति से अधिक रिश्तों को महत्व दें। यदि परिवार संवाद बनाए रखे। तो अधिकांश समस्याएं शुरू होने से पहले ही समाप्त हो सकती हैं। वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ना केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है। यह एक भावनात्मक संकेत भी है। यह संकेत है कि कहीं न कहीं पीढ़ियों के बीच संवाद कमजोर हुआ है। हर वृद्ध व्यक्ति वृद्धाश्रम में मजबूरी से नहीं जाता और हर परिवार अपने बुजुर्गों की उपेक्षा नहीं करता। लेकिन जहां ऐसा होता है, वहां केवल एक व्यक्ति नहीं हारता। पूरा परिवार हारता है। क्योंकि जिसने जीवनभर अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया हो, उसके अकेलेपन से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है? इसी प्रकार, जब कोई युवा मानसिक तनाव में टूटता है, तब भी पूरा परिवार हारता है। क्योंकि परिवार का उद्देश्य केवल साथ रहना नहीं है। एक-दूसरे का सहारा बनना है। समाज को यह समझना होगा कि सम्मान किसी एक वर्ग की आवश्यकता नहीं है। सम्मान हर इंसान की आवश्यकता है। चाहे वह महिला हो या पुरुष। चाहे वह बुजुर्ग हो या युवा। चाहे वह माता-पिता हों या संतान। हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आरोप लगाने की बजाय आत्मचिंतन करें। हम यह सोचें कि हम अपने परिवार के लिए क्या कर सकते हैं। हम अपने व्यवहार में क्या सुधार ला सकते हैं। हम रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए क्या त्याग कर सकते हैं। क्योंकि परिवार कानूनों से नहीं चलते। परिवार प्रेम से चलते हैं। परिवार अधिकार से नहीं चलते। परिवार विश्वास से चलते हैं। परिवार जीत-हार से नहीं चलते। परिवार समझौते और समझदारी से चलते हैं। जब किसी घर में लोग एक-दूसरे को बदलने की कोशिश छोड़कर एक-दूसरे को समझने की कोशिश शुरू कर देते हैं, तब वहां सुख का वातावरण बनता है। जब लोग यह सोचने लगते हैं कि "मुझे क्या मिला" की बजाय "मैं क्या दे सकता हूं", तब रिश्ते मजबूत होते हैं। जब मां को सम्मान मिलता है। जब पिता को आदर मिलता है। जब जीवनसाथी को प्रेम मिलता है। जब बच्चों को संस्कार मिलते हैं। तब घर केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं रहता। वह एक ऐसा स्थान बन जाता है जहां लौटने का मन करता है। जहां थका हुआ इंसान सुकून पाता है। जहां बुजुर्ग स्वयं को बोझ नहीं समझते। जहां बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं। जहां रिश्ते सांस लेते हैं। और शायद यही हर इंसान की सबसे बड़ी इच्छा होती है। कोई महल नहीं चाहता। कोई असीमित धन नहीं चाहता। हर व्यक्ति बस इतना चाहता है कि उसका परिवार बना रहे। उसके अपने लोग उसके साथ रहें। उसकी मां की आंखों में अकेलापन न हो। उसके पिता की उम्मीदें न टूटें। उसके भाई उससे दूर न हों। उसका जीवनसाथी उसका सम्मान करे। उसके बच्चे परिवार की अहमियत समझें। यदि हम यह सब कर सकें, तो शायद चूल्हे नहीं बंटेंगे। दिल नहीं बंटेंगे। रिश्ते नहीं टूटेंगे। और तब घर सचमुच स्वर्ग जैसा अनुभव कराएगा। क्योंकि स्वर्ग किसी दूसरी दुनिया में नहीं होता। स्वर्ग वहीं होता है, जहां प्रेम हो, सम्मान हो, अपनापन हो और परिवार साथ हो।
संजीवन कुमार सिंह ✍️ 


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