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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Inspirational Others

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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Inspirational Others

रिश्ते: जीवन की सबसे कठिन परीक्षा

रिश्ते: जीवन की सबसे कठिन परीक्षा

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कितनी अजीब बात है... आज जिन घरों की दीवारों पर बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ टंगी होती हैं, जहाँ लोग अच्छी नौकरियाँ करते हैं, जहाँ आधुनिक सुविधाओं की कोई कमी नहीं होती, वहीं कभी-कभी सबसे ज्यादा दर्द भी छिपा होता है। बाहर से सब कुछ सुंदर दिखाई देता है, लेकिन भीतर का सच अक्सर किसी को दिखाई नहीं देता। हम बचपन से सुनते आए हैं कि पढ़-लिखकर इंसान समझदार बनता है। शिक्षा उसे बेहतर जीवन देती है, सम्मान देती है, आत्मनिर्भर बनाती है। यह बात सच भी है। लेकिन समय-समय पर जीवन कुछ ऐसे प्रश्न सामने खड़े कर देता है, जिनका उत्तर केवल डिग्रियों में नहीं मिलता। क्योंकि जीवन की सबसे कठिन परीक्षाएँ किताबों से नहीं, रिश्तों से जुड़ी होती हैं। एक परिवार था। साधारण परिवार। न बहुत अमीर, न बहुत गरीब। उस घर में एक बेटी थी। माता-पिता ने उसे बड़े प्यार से पाला था। उसकी हर खुशी में अपनी खुशी देखी थी। उसके भविष्य के लिए सपने सजाए थे। उसे पढ़ाया-लिखाया, संस्कार दिए और एक दिन बड़े अरमानों के साथ उसकी शादी कर दी। विदाई के समय हर माँ की तरह उसकी माँ की आँखों में आँसू थे। मगर उन आँसुओं में डर कम और उम्मीद ज्यादा थी। उसे विश्वास था कि उसकी बेटी अब अपने नए घर में खुश रहेगी। वह अपने जीवन का नया अध्याय शुरू करेगी। शुरुआत में सब ठीक दिखाई दिया। फोन पर हँसी सुनाई देती थी। त्योहारों पर तस्वीरें आती थीं। रिश्तेदारों के सामने सब सामान्य लगता था। लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। पहले छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने लगे। फिर शिकायतें बढ़ीं। फिर तकरार शुरू हुई। और एक दिन वह बेटी पहली बार अपने मायके लौटी। माँ ने देखा कि उसके चेहरे की चमक पहले जैसी नहीं रही। वह मुस्कुरा तो रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान में पहले वाली सहजता नहीं थी। कुछ था जो वह छिपा रही थी। बहुत पूछने पर उसने अपने मन की बातें बताईं। घर में झगड़े होते थे। बात-बात पर अपमान होता था। छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना दिया जाता था। वह समझौता करती रही, सहती रही, उम्मीद करती रही कि शायद सब ठीक हो जाएगा। कुछ दिन मायके में रहकर उसका मन थोड़ा संभला। फिर ससुराल पक्ष के लोग आए। उन्होंने समझाया, माफी माँगी और भरोसा दिया कि अब ऐसा नहीं होगा। बेटी ने विश्वास कर लिया। माँ ने भी कर लिया। वह वापस चली गई। लेकिन कुछ महीनों बाद फिर वही कहानी दोहराई गई। फिर विवाद। फिर आँसू। फिर मायका। फिर समझौता। फिर वापसी। यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। हर बार माँ का दिल टूटता था। हर बार पिता की चिंता बढ़ जाती थी। हर बार बेटी यह सोचकर लौट जाती थी कि शायद इस बार सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जीवन हमेशा उम्मीदों के अनुसार नहीं चलता। सबसे कठिन बात यह थी कि बाहर की दुनिया को कुछ पता नहीं था। समाज के सामने सब सामान्य दिखाई देता था। लोग त्योहारों की तस्वीरें देखते थे, मुस्कुराते चेहरे देखते थे और मान लेते थे कि सब ठीक है। लेकिन सच्चाई तस्वीरों में नहीं रहती। सच्चाई उन बंद कमरों में रहती है जहाँ लोग अकेले रोते हैं। सच्चाई उन रातों में रहती है जब कोई तकिए में मुँह छिपाकर अपने आँसू रोकने की कोशिश करता है। सच्चाई उन खामोशियों में रहती है जहाँ शब्द खत्म हो जाते हैं लेकिन दर्द नहीं। समय के साथ उस परिवार में दो बच्चे भी आ गए। बच्चों के आने के बाद बेटी का संघर्ष और बढ़ गया। अब वह केवल अपने लिए नहीं सोच सकती थी। हर निर्णय के साथ बच्चों का भविष्य भी जुड़ा था। वह कई बार अलग होने का सोचती, लेकिन बच्चों का चेहरा सामने आ जाता। वह कई बार वापस न लौटने का निश्चय करती, लेकिन वर्षों का मोह उसे रोक लेता। आखिर रिश्ते केवल तर्क से नहीं चलते। उनमें भावनाएँ भी होती हैं। यादें भी होती हैं। उम्मीदें भी होती हैं। और कई बार यही उम्मीद इंसान को उसी जगह वापस ले जाती है जहाँ उसे सबसे ज्यादा दर्द मिला होता है। समाज के लोग अक्सर जल्दी फैसला सुना देते हैं। कोई कहता है कि गलती पति की होगी। कोई कहता है कि गलती पत्नी की होगी। कोई बिना पूरी बात जाने निर्णय दे देता है। लेकिन सच्चाई यह है कि पति-पत्नी के बीच क्या चल रहा होता है, यह दुनिया बहुत कम जानती है। जो व्यक्ति बाहर बेहद सभ्य दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि घर में भी वैसा ही हो। और जो बाहर कठोर दिखाई देती है, हो सकता है कि भीतर से पूरी तरह टूट चुकी हो। रिश्तों का सच अक्सर दुनिया की नजरों से छिपा रहता है। आज के समय में एक और समस्या बढ़ती जा रही है। लोग सफल होना तो सीख रहे हैं, लेकिन साथ जीना नहीं सीख रहे। लोग करियर बनाना सीख रहे हैं, लेकिन रिश्ते संभालना नहीं। लोग कमाना सीख रहे हैं, लेकिन भावनाओं को समझना नहीं। अहंकार धीरे-धीरे रिश्तों की जगह लेता जा रहा है। कोई झुकना नहीं चाहता। कोई माफी नहीं माँगना चाहता। कोई अपनी गलती स्वीकार नहीं करना चाहता। हर व्यक्ति खुद को सही साबित करने में लगा है। लेकिन रिश्ते अदालत नहीं होते जहाँ हर समय फैसला सुनाया जाए। रिश्ते तो वह जगह होते हैं जहाँ कभी-कभी सही होकर भी चुप रहना पड़ता है। जहाँ जीतकर भी हार माननी पड़ती है। जहाँ अपने अहंकार से ज्यादा दूसरे के मन को महत्व देना पड़ता है। पुराने समय के लोगों में भी कमियाँ थीं। वे पूर्ण नहीं थे। लेकिन उनके पास एक चीज थी—धैर्य। वे हर मतभेद को रिश्ते के अंत का कारण नहीं मानते थे। वे बातचीत करते थे। समझते थे। समझाते थे। वे जानते थे कि दो अलग-अलग व्यक्तित्व जब साथ रहते हैं तो मतभेद होना स्वाभाविक है। आज समस्या यह है कि लोग संबंधों को निभाने से पहले उन्हें परखने लगते हैं। रिश्ते को महसूस करने से पहले उसका मूल्यांकन करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि छोटी-छोटी दरारें समय के साथ बड़ी खाइयों में बदल जाती हैं। और जब तक लोगों को इसका एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कई बार समाचारों में ऐसी घटनाएँ पढ़ने को मिलती हैं जो पूरे समाज को झकझोर देती हैं। किसी ने आत्महत्या कर ली। किसी ने गुस्से में अपराध कर दिया। किसी परिवार का अंत हो गया। लोग कुछ दिन चर्चा करते हैं और फिर भूल जाते हैं। लेकिन उन घटनाओं के पीछे वर्षों का दर्द छिपा होता है। कोई एक दिन में नहीं टूटता। कोई एक रात में इतना अकेला नहीं हो जाता। यह सब धीरे-धीरे होता है। हर अनसुनी बात के साथ। हर अपमान के साथ। हर टूटे विश्वास के साथ। हर अधूरी उम्मीद के साथ। और फिर एक दिन इंसान उस जगह पहुँच जाता है जहाँ उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि रिश्तों को केवल बाहरी रूप देखकर नहीं समझा जा सकता। जो स्त्री हर तस्वीर में मुस्कुरा रही है, हो सकता है वह भीतर से बेहद दुखी हो। जो पुरुष सबको हँसा रहा है, हो सकता है वह खुद गहरे अकेलेपन से गुजर रहा हो। जो परिवार बाहर से आदर्श दिखाई देता है, हो सकता है वह अंदर से संघर्षों से भरा हो। इसलिए किसी के जीवन पर टिप्पणी करने से पहले सावधान रहना चाहिए। क्योंकि हम अक्सर कहानी का केवल वह हिस्सा देखते हैं जो हमें दिखाया जाता है। पूरा सच बहुत कम लोगों को पता होता है। जीवन ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा अब भी वही है जो किताबों में नहीं मिलती। सम्मान। धैर्य। संवेदना। सुनने की क्षमता। माफ करने की शक्ति। और अपने प्रियजनों के दर्द को समझने की कोशिश। डिग्रियाँ नौकरी दिला सकती हैं। धन कमा सकती हैं। प्रतिष्ठा दिला सकती हैं। लेकिन एक रिश्ता निभाने के लिए आज भी दिल की जरूरत पड़ती है। आज भी त्याग की जरूरत पड़ती है। आज भी धैर्य की जरूरत पड़ती है। आज भी संवेदना की जरूरत पड़ती है। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा किसी विश्वविद्यालय में नहीं होती। वह घर के भीतर होती है। वह दो लोगों के बीच होती है। वह उन क्षणों में होती है जब गुस्सा और प्रेम आमने-सामने खड़े होते हैं। और जो व्यक्ति उन क्षणों में प्रेम, धैर्य और समझदारी को चुन लेता है, वही वास्तव में शिक्षित कहलाने योग्य होता है। वरना कभी-कभी ऐसा भी होता है कि दीवारों पर डिग्रियाँ टंगी रह जाती हैं, लेकिन जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा में इंसान असफल हो जाता है।
संजीवन कुमार सिंह 


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