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डाॅ.मधु कश्यप

Tragedy

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डाॅ.मधु कश्यप

Tragedy

हम काम के हैं ।

हम काम के हैं ।

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 घर की चारदीवारी में बरगद का पेड़ घर की शान बढ़ाता था। जो भी देखता कहता," वाह शर्मा जी! कितने भाग्यशाली हैं आप। यह बरगद का पेड़ बिना कुछ कहे आपके घर की कहानी को बता देता है ।जैसे आप इतने सालों से इस बरगद को पल-पल अपनी आँखों के सामने देख रहे और इसकी सेवा कर रहे उसी तरह आपके बच्चे भी आपका ध्यान रखते हैं। और आपके आशीर्वाद तले उनकी तरक्की हो रही है ।"शर्मा जी मुस्कुराकर रह जाते।। क्या कहे ?अपने मन की उदासियों को चेहरे पर नहीं आने देते थे ।पर उनकी झुर्रियाँ उनका दर्द बयां कर देती थी। "सुनते हो सब्जी ले आओ। मैं बना दूँ। बेटा बहू आते होंगे ।"लाओ झोला दो,लेता आऊँ।" 

आठ बजते ही राहुल और रीता के कार की आवाज आई। सुनीता जी ने दरवाजा खोला," बेटा खाना बन गया है ।जल्दी आ जाओ। "आता हूँ ,मैं घर में घुसा नहीं कि तुम शुरू हो जाती हो ।"सुनीता जी चुपचाप चली गई। शर्मा जी से यह बर्दाश्त नहीं होता था पर सुनीता की कसम उन्हें रोक देती थी। क्या करते इकलौता बेटा था। मोह और प्यार में फँसे हुए थे ।बेटा बहू के लिए वे दोनों केवल चौकीदार और नौकर बन कर रह गए थे। और कोई मतलब नहीं था उन्हें ।सुबह शोर की आवाज से उन दोनों की नींद खुली ।"क्या हुआ बेटा सब ठीक है ना?" "हाँ,पापा बस बरगद का पेड़ कटवा रहा हूँ। "पर बेटा यह तो.....।" अरे पापा बहुत जगह लिए हुए था और किसी काम का भी नहीं है ।पुराना भी हो गया है।"........ पर यह तो हमारे घर की शोभा है ।"अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पापा।" "अच्छा हुआ सुनीता हम लोग किसी काम के हैं वरना हम लोगों को भी .......।"सुनीता जी ने उनके होठों पर अपने हाथ रख दिए पर आँखों से बहते आँसू ने सब कुछ बयाँ कर दिया।


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