Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Drama


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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हेतल और मेरा दिव्य प्रेम.. (4)

हेतल और मेरा दिव्य प्रेम.. (4)

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कभी कैंसर हुआ था यह हेतल भूल सी गई थी। तब से दो वर्ष से कुछ ज्यादा का वक़्त ही बीता होगा, 2019 ने विदा ली थी। 2020 का स्वागत, सभी ने बहुत उल्लास एवं ख़ुशी से किया था। 

क्या है, 2020 के गर्त में कुछ ही दिनों में यह दिखाई देने लगा था। 

वैसे तो चीन से, एक नए कोरोना वायरस की खबरें, 2019 के अंत में ही सुनने मिलने लगीं थीं लेकिन फरवरी आते आते दुनिया को यह आशंका लगने लगी थी कि यह वैश्विक महामारी का रूप धारण कर सकता है।

चीन के बाद, आरंभ में इसने कुछ यूरोपीय देशों में अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू किया और मार्च के दूसरे पखवाड़े में इसके गंभीर होने के खतरे, भारत पर भी दिखने लगे। 

इधर सरकार ने लॉक डाउन लागू किया, उधर मुझे कश्मीर में पुनः तैनाती के आदेश मिले।  

यूँ तो आतँकी खतरों से जूझते कश्मीर में, मेरी तैनाती पहले भी होती रहीं थीं, मगर इस बार मेरे कश्मीर जाने को लेकर, हेतल ज्यादा घबराई हुई थी। कारण शायद लॉक डाउन भी था। हेतल, बच्चों के साथ घर में ही रहने की कल्पना से डरी हुई थी कि जरूरत की सामग्रियों की, व्यवस्था कैसे संभव होगी। 

साथ ही उसे यह भी भय हो रहा था कि कश्मीर में एक दुश्मन (आतंकवादी) छिपकर मुझ पर हमला करने को तैयार मिलेगा और एक, दूसरा अदृश्य संकट कोविड-19 के रूप में, मुझ पर आसन्न एवं घातक संकट होगा। 

इसके लिए, बड़ी कठिनाई से मैं, हेतल को समझा सका था। मैंने भावनात्मक तर्क का सहारा लिया था। कहा था हेतल, तुम तो लगभग 19 वर्षों से, इस सैन्य अधिकारी की पत्नी हो। ऐसी डरपोक तो तुम्हें नहीं होना चाहिए। तुम यह क्यों भूल रही हो कि तुम, मुझसे मिल ही, इस कारण सकी हो। मेरी कच्छ में, एक सैनिक के रूप में पोस्टिंग होने से ही तथा देशवासियों के रक्षक के रूप में ही तो, मैं तुम्हारा सहायक हो सका था।  

मुझसे ऐसा सुनते ही, उसने खुद को संभाला था। अपनी आकर्षक, बड़ी तथा कटीली आँखों में झिलमिला रहे, अश्रुओं को पोंछा था। फिर मुझसे कहा था कि- 

हाँ हाँ जाइये आप!आप में अप्रीतम शौर्य और साहस है। राष्ट्र के प्रति आपके दायित्वों में, मैं बाधा नहीं बनूँगी। आप जायें और अपनी उत्कृष्ट वीरता से, कश्मीर वालों की रक्षा करें।  

जब मैं, घर से रवाना हो रहा था तब हेतल की भाव भंगिमाओं (हावभाव) से, जिसे वह मुझसे छिपाने का यत्न कर रही थी, मुझे लग रहा था जैसे कि वह, मुझे अंतिम विदाई दे रही हो। 

वह बच्चों से भी अपने डर छुपा रही थी ताकि वे भावुक न हो जायें। मैं स्वयं भी, हेतल और दोनों बच्चों से, आँख चुराते निकल गया था। उनसे आँखें मिला कर विदा लेने में, मुझे यह डर लगा था कि राष्ट्र सेवा को, बढ़ते मेरे कदम रुक न जायें 

अब तक तुलनात्मक रूप से, मेरे छोटे जीवन में ही, नियति ने मेरी झोली में, असीम सुख भर दिए थे। नियति, मुझे, जो बिरलों के ही भाग्य में होता, एक ऐसा गौरव और दिलाना चाहती थी। 

कोरोना संकट से निबट रही, भारतीय सरकार को व्यस्त जान, दुश्मन ने इसे अच्छा अवसर समझा था। वह शनै शनै शांत हो रहे कश्मीर को, देख खिसियाया हुआ था। वह चाहता था कि कश्मीर में, उथल पुथल मचा दे। 

मजहब के नाम पर, 1947 में देश तोड़ देने वाली मानसिकता, अब भी दुश्मन के दिमाग पर हावी थी। खुद की जनता को खुशहाली न दे सकने की अपनी असफलता पर से, अपनी जनता का ध्यान हटाने के लिए कश्मीर में हिंसा जारी रखने के, उसके मंसूबे थे। 

वह कश्मीरी युवाओं को फिर भटकाने के लिए, इन दिनों अपने आतँकवादी घुसपैठिये बढ़ा रहा था। ऐसी ही एक पुष्ट सूचना पर, हमने उस रात्रि एक घर को घेर रखा था। उस घर में, एक मोस्ट वांटेटेररिस्ट कमांडर सहित दस आतँकी थे।  

आतँकियों द्वारा रात भर चलाई, गोला बारी से बचते हुए, मैंने और मेरे साथियों ने सावधानी से, हुए उस घर में प्रवेश किया था। 

घर में बंधक किये गए नागरिकों को बचा, सुरक्षित बाहर भिजवाते हुए कमांडर सहित नौ आतँकियों को मार गिराया था। 

अंतिम बचे आतँकी ने तब, जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिल से बाहर छलाँग लगाई थी। मैंने उसे देख लिया था। और तत्परता से उसका पीछा किया था।

ऊपर से कूदने के कारण चोटिल हुआ, वह लगंड़ाता भाग रहा था। उसे जीवित ही पकड़ने के, अति विश्वास में, मैंने उस पर फायर नहीं किया था तथा झपट्टा मार, उसकी कॉलर पकड़ ली थी। 

निश्चित ही, रात भर चले संघर्ष की थकावट में, कुछ शिथिल हुई युक्ति एवं दिमाग के कारण, मैं चूक गया था।

उसने मुझ पर गोली चलाई थी। जो मेरे सीने में, हृदय के नीचे लगी थी। मेरा अंत निकट आ गया था। ऐसे में मुझे यह देख संतोष हुआ था कि मेरे अन्य साथी, तब तक वहाँ पहुँच गए थे। जिन्होंने, उसकी गन छुड़ा कर, उसे काबू में ले लिया था। 

अब अंतिम बचे, मेरे जीवन के कुछ पलों में, मेरी आँखों के सामने, मेरे बच्चे और हेतल के चेहरे थएक जीवन दीप बुझ रहा था। आखिरी भभके जैसा, मेरा दिमाग तेज चल रहा था। हेतल पर क्या बीतेगी, जल्दी जल्दी मुझे, इसकी कल्पना हुई थी।     

बिलकुल ही अंतिम क्षण में, मैंने अपनी शक्ति का प्रयोग किया था।

हेतल के शरीर में, अपनी आत्मा कर दी थी।

मेरे गंभीर घायल शरीर का, जब आत्मा से जुदा होने वाला, अंतिम पल आया था, उस समय उसमें हेतल की आत्मा थी, जिससे वह आगे की अनंत यात्रा के लिए चल निकली थी। 

मेरी आत्मा को, हेतल के शरीर में रहते हुए, आगे भी जीवन के अवसर मिलने थे।  

फिर, मेरे पार्थिव शरीर का घर लाया जाना, हेतल के शरीर में विद्यमान, मेरी आत्मा ने देखा था। लोगों को दिखने वाली हेतल में, मैं था।

शव के सैन्य सम्मान से, दाह सँस्कार करते हुए, साक्षी हुए लोगों ने, हेतल की आँखों में आँसू नहीं देखे थे। बल्कि गौरवान्वित होने जैसे भाव एवं मुख पर मुस्कान देखी थी।  

हेतल के मुख पर ऐसे भाव को दर्शाती तस्वीरें एवं वीडियो, समाचार चैनलों पर उस दिन भर दिखाए गए। साथ ही सोशल साइट्स पर ये वायरल हुए थे। जिनकी व्यूअर सँख्या ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। 

भले क्यूँ न ऐसा होता, जबभारत की विशाल जनसँख्या में, अधिकाँश हमारे नागरिक राष्ट्रनिष्ठ थे।

सरकार ने मुझे, मरणोपरांत परमवीर चक्र दिए जाने की घोषणा की। हमारी सेना में, राष्ट्र रक्षा के बलिदान एवं इस उच्चतम सम्मान को लालायित लगभग सभी सैन्य अधिकारी एवं सैनिक होते हैं। इस तरह मैं, वह भाग्यशाली सैन्य अधिकारी हुआ था जिसे यह चरम गौरव प्राप्त हुआ था। 

यह अवश्य था कि इसके लिए, हेतल की आत्मा को खोकर, तथा बच्चों को प्रकट में, अपने पापा को, कम वय में ही खो देने की अपूरणीय क्षति उठानी पड़ी थी। 

इसके साथ ही मुझे अब उस (दो में से) एक शरीर का अभाव भी हो गया था। ऐसा होने से, मैं अपनी शक्ति के प्रयोग से, रूह की अदला बदली करने में असमर्थ हो गया था, जिसे पूर्व में, मैं किया करता था।

अन्य शब्द में कहूँ कि लद्दाख के उन महात्मा पुरुष से प्राप्त, मेरी शक्ति अब स्वतः ही निष्प्रभावी हो गई थी। 

जब यह निष्प्रभावी हो ही चुकी थी, तब इसका राज खोलने से, शक्ति खो जाने वाला डर, भी मिट गया था। 

तब ऐसी नई परिस्थिति में -

मैंने क्यों, अंतिम पल में हेतल की आत्मा को अपनी आत्मा की जगह विदा हो जाने दिया था? यह, तथा अपनी रही दिव्य शक्ति का राज, दिल में ही छिपा सकना, मुझ पर भारी पड़ रहा था।

फिर कुछ दिन बीते थे और आज, सब की दृष्टि में बलिदानी, सैन्य अधिकारी की पत्नी, हेतल को, बलिदानी पति के लिए, परमवीर चक्र प्रदान किया गया है। 

हेतल के रूप में, मैं स्वयं हूँ। सभी के समक्ष मैंने, पति के बलिदान को अपने एवं परिवार के लिए अत्यंत गौरवमयी उपलब्धि बताया है। साथ ही पति के ऐसे जाने को मातम नहीं, बल्कि अत्यंत हर्ष का विषय होना बताया है।

हेतल के मुहँ से कही गई, ऐसी बात सुन, सबके हृदय में, हेतल की भूरी भूरी प्रशंसा है। साथ ही उनकी, हेतल और बच्चों के साथ गहन संवेदनायें हैं।

आज अब मैं, जब मेरी मौत हो जाए, उसके बाद, ताकि इतिहास को सनद रहे, अपनी डायरी में, अपना स्पष्टीकरण ऐसे लिख रहा हूँ।


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