हाँ यही प्यार है
हाँ यही प्यार है
रात घिरने ही वाली थी। ध्येय ने हौले से दरवाजे पर दस्तक दी। नीतिका के मन में क्या लहरें मचल रही थीं, वो बड़े अच्छे से जानता था और वो ये भी जानता था कि वो चाहे जितने प्रेम की ठंडक उड़ेल ले, मन की उन तपती लहरों को कम से कम उस वक़्त शान्त कर पाना किसी भी ज़रिये से कम से कम उसके बस की बात नहीं थी। पर हालात से जो हर मान जाये, वो भला इंसान ही कैसा ?
दस्तक देने के बाद भी कोई जवाब न मिलने पर ध्येय सीधा कमरे में अंदर आ चुका था और बिस्तर पर चादर में दुबक कर लेटी नीतिका से बोला-
"सच्ची में तुम बहुत किस्मत वाली हो।"
ध्येय के इस वाक्य पर चादर के अन्दर से कुछ हरकत हुई, मानो नीतिका कुछ कहना चाहती थी। पर वो बस हिल भर कर ही रह गयी। अब नीतिका को हिलाने के लिए ध्येय को ही बोलना था और उसने हौले से नीतिका की तरफ कदम बढ़ाते हुए बातें जोड़ना शुरू किया-
"ऐसे भईया, ऐसे पापा, ऐसी बहन सबको पाना तुम्हारी किस्मत नहीं, तो और क्या है? और ऐसी माँ, जिनको तुम आज भी हर घड़ी, हर बात पर, हर काम पर याद करती हो!"
ध्येय की बात पर नीतिका चादर के अंदर ही फिर थोड़ा कसमसाई, तो ध्येय के पास और बात जोड़ने का मौका सामने था-
"हमारी तरह की सोसाइटी में जिस तरह के हालात होते हैं, उसमें आपके एक बार कहने भर पर आपसे जुड़ा हर कोई आपकी हर ख्वाहिश को पूरा करने के लिये सबकुछ झोंक देता है। ये सच में किस्मत की बात नहीं, तो और क्या है ? हाँ, बस अब आपकी शादी मुझसे हो गयी है। मैं, यानी कि ऐसा आदमी, जिसको लगता है कि बस घर के अंदर थोड़ा बहुत काम करके आपको अपने अहसानों के तले दबा हुआ महसूस करवा लेगा। हमेशा कुछ ऐसा महसूस किया कि अक्सर एक पत्नी जो घर में रहकर हमेशा किया करती थी, आपकी जगह वो झाड़ू-पोछा, बर्तन, कपड़ों की धुलाई करके, घर के अन्दर आपका कहा जाने वाला काम खुद करके आपको महसूस करा दूँगा कि आपका इतना खयाल रखता हूँ कि आपको किसी भी बात को लेकर परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं। पर मैं तो जैसे भूल ही गया था। ज़माना बदल चुका है। एक घर को घर बनाने वाले तौर-तरीके सब बदल चुके हैं। आज झाड़ू-पोछा, बर्तन, कपड़ों की धुलाई, राशन-सब्जी सब तो नौकरों के काम हो चुके हैं। बस गलती इतनी सी है कि मेरे घर वालों ने स्वावलंबी होना सिखाया, हमेशा बोला अपने काम खुद करने की आदत डालो। बस वही एक सीख अभी तक अन्दर ऐसी आदत बनकर पड़ी हुई है कि बदलते ज़माने के साथ कभी भी और सब लोगों की तरह ठाठ-रुआब से खुद के सम्मान का ढोल-मंजीरा बजा जीने की आदत ही नहीं पड़ी। तो फ़िर सबकी तरह आपको भी लगने लगा, मेरी कोई इज्जत ही नहीं और मेरी कोई इज्जत करने की ज़रूरत भी नहीं।"
ध्येय के बोलते-बोलते चादर के अन्दर से नीतिका के सुबकने की आवाजें आने लगी थीं। नाक पर चढ़े गुस्से के दंभ को अब टूटने के लिए बस शायद एक हल्की सी दस्तक की और ज़रूरत थी। ध्येय ने अन्ततः वो दस्तक भी दे ही डाली-
दूसरे लोग बहुत ख्याल रखते हैं... न...! आपकी सारी ज़िम्मेदारी उठाते हैं। बस एक मैं ही रह जाता हूँ। आपकी तरफ़ अपनी कोई ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर पाता हूँ। तो वही सोचा, आज व्रत रखा था आपने। मेरी वजह से पूरा दिन आप भूखी थीं।इसीलिए पीछे पड़े थे आपके। आपको खाना खिलाना मेरी ही जिम्मेदारी थी। इसीलिए बोल रहे थे, कुछ खा लो...
फिर करती रहना मोबाइल पर अपनी सारी मनमर्ज़ी।" बोलते-बोलते ध्येय एक पल को ठिठका और फिर बोल ही पड़ा-
"बाकी लोग ध्यान रखें, तो वो सब बहुत अच्छे हैं और हम रखने की कोई कोशिश करें, तो हम तो हमेशा से हैं ही... बिल्कुल गलत। हमेशा की तरह घर की मुर्गी.. बिल्कुल दाल बराबर !" अल्फाजों की ये आखिरी दस्तक थी, जिसके कान में घुसते ही नीतिका चादर को एक ओर फेंकते हुए उठी और आकर पूरी ताकत से ध्येय के सीने से लिपट गयी। ये प्रेम की वो दस्तक थी, जिसने हमेशा से आज तक इंसान की ज़िंदगी को जीने की सबसे खूबसूरत दस्तक बनाये रखा है !

