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Kumar Vikrant

Comedy


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Kumar Vikrant

Comedy


गुनहगार भाग : २

गुनहगार भाग : २

9 mins 234 9 mins 234

तीन महीने की मुनहार के बाद मीनू ने तलाक का निर्णय तो वापिस लिया लेकिन अब वो छत्रकेतु के साथ रहने के लिए तैयार न थी ना ही बच्चों पर उसका साया पड़ने देना चाहती थी।

रैंच पर छत्रकेतु के लिए अकेला रहना मुश्किल था, लेकिन अपने पब्लिशर के साथ हुए अनुबंध के अनुसार उसे इंडो वेस्टर्न सीरीज का एक नॉवेल और लिख कर देना था, उसने नॉवेल लिखा जिसका टाइटल था 'लौरेंजा,' नॉवेल इंडिया में हुए कत्लो आम और मीनू से उसके बिगड़ते रिश्तो पर आधारित था। नॉवेल को अच्छी ओपनिंग मिली और काफी बिका। पब्लिशर ने छत्रकेतु पर अनुबंध रिन्यू करने का ऑफर दिया जिसे छात्रकेतु ने ठुकरा दिया।

कुछ दिन बाद छत्रकेतु ने अपने वकील को बुलाया और रैंच मीनू और बच्चों के नाम कर दिया। अपने सभी नोवेल्स की बिक्री से मिलने वाली रॉयल्टी भी मीनू और बच्चों के नाम कर दी।

एक दिन सुबह उठकर उसने इंडिया जाने वाली पहली फ्लाइट का टिकट बुक किया। मीनू और बच्चों को बताया की वो हमेशा के लिए इंडिया जा रहा है।

दो दिन बाद वो एक ब्रीफकेस और एक १ हजार डॉलर लेकर नई दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरा, उसके बैंक अकाउंट में भी ५० हजार डॉलर थे। वहाँ से विल सिटी गया। जीने के लिए कुछ करना था, उसकी ज्यादा महत्वाकांक्षा नहीं थी इसलिए उसने विलसिटी से थोड़ी दूर स्थित गुलफाम नगर कस्बे के बाहर छह एकड़ जमीन खरीदी और उसपर एक बड़ी से घुड़साल का निर्माण किया, नाम रखा लौरेंजा स्टीड फार्म। पाँच घोड़ों की जोड़ियों से शुरुवात की। घोड़ों की सप्लाई काली घाटी में घूमने जाने वाले यात्रियों को की जाती या काली घाटी में शूट की जाने वाली फिल्मों के निर्माताओं को। आमदनी बढ़ी घुड़साल में घोड़े बढ़ते गए, आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मीनू और बच्चो को चला जाता था। छत्रकेतु की जीवन में कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी, उसका कारोबार मैनेजर देखते थे लेकिन वो कारोबार के आय और व्यय पर कड़ी निगाह रखता था। क्या मजाल कोई उससे एक पैसा भी ठग ले।

छत्रकेतु अब छत्तर दादा के नाम से जाना जाता था। गुलफाम नगर के आशिक और मुस्टंडे उससे सलाह लेने आते रहते थे, लेकिन सलाह से ज्यादा उन्हें छत्तर दादा की घुड़साल में मिलने वाली मुफ्त की चाय की चाहत घुड़साल तक खींच लाती थी। ऐसे मुस्टंडो को छत्तर दादा आस-पास के दुकानदारों के पास उधार की चीनी, चाय पत्ती और दूध लाने के लिए दौड़ता रहता था। इस बेगार और दुकानदारों की गालियों से बचने के लिए सामान्य मुस्टंडे घुड़साल तक आने में कतराने लगे लेकिन इस सबके बाद भी घुड़साल पर मुस्टडों की भीड़ जुटी रहती थी।

दुकानदारों की उधारी बड़ी मुश्किल से चुकाई जाती हर दुकानदार को यह कह कर टाल दिया जाता कि घोड़ों की लीद का पेमेंट आने पर उधारी चुकाई जाएगी। घुड़साल के मैनेजर को सख्त ताकीद थी कि मुफ्त की चाय नाश्ता करने आने वालो के खर्च को घोड़ों की लीद बेचकर निकाला जाए। देर-सबेर उधारी चुका दी जाती थी इसलिए दुकानदार छत्तर दादा को तो कुछ न कहते लेने उधार लेने जाने वाले मुस्टंडे की बेइज्जती कर उधार की चीनी, चाय पत्ती और दूध दे देते थे।

छत्तर दादा पुरानी यादो में खोया हुआ था कि घुड़साल के गेट से आने वाले शहर के नामी मुफ्तखोर दमड़ी दास को देखकर चौक गया और आँखे बंद कर सोने की नकल करने लगा।

"छत्तर दादा इस टाइम सोने से तो लक्ष्मी माँ तुझसे रूठ कर चली जाएगी, अब उठ जाओ बहुत जरूरी काम से आया हूँ।" दमड़ी दास छत्तर दादा के तख़्त के पास पड़े मोढ़े पर बैठता हुआ बोला।

"क्या है दमड़ी दास, काम धाम छोड़कर यहाँ क्यों भटक रहा है?" छत्तर दादा उठकर बैठते हुए बोला।

"दादा कल तुम्हारे घुड़साल का एक घोड़ा चाहिए, तू पड़ोसी है हमारा इसलिए घोड़े का भाड़ा बिलकुल नहीं दूँगा।" दमड़ी दास गंभीरता से बोला।

"क्या करेगा घोड़े का?" छत्तर दादा हँसते हुए बोला।

"बेटे की घुड़चढ़ी के लिए चाहिए।" दमड़ी दास ने जवाब दिया।

"अबे दमड़ी दास ये बारात के नहीं फिल्मों की शूटिंग के घोड़े है, इनके चक्कर में न पड़।" छत्तर दादा हँसते हुए बोला।

"कैसी छोटी बात कर दी छत्तर दादा, जब घोडा भेजेगा तो उसे संभालने के लिए अपना आदमी नहीं भेजेगा क्या?" दमड़ी दास चिढ़कर बोला।

"दमड़ी दास लालच में न पड़, झुन्नामल की बारात वाली घोड़ी ले ले, घोड़ी का भाड़ा मै दे दूँगा।" छत्तर दादा समझाते हुए बोला।

"छत्तर दादा कर दी न छोटी बात, लाखों रूपये खर्च कर रहा हूँ शादी में तो एक घोड़े का खर्च नहीं दे सकूँगा…..तू बोल तू क्या लेगा घोड़े का भाड़ा?" दमड़ी दास गुस्से से बोला।

"गुस्सा न कर दमड़ी दास तेरे भले की बात कर रहा था, चल भेज दूँगा घोडा भी और घोडा हांकने वाला भी। लेकिन अगर बैंड के शोर से घोडा बिदक कर भाग गया तो बारात की जगह जुलुस निकल जाएगा।" छत्तर दादा हँसकर बोला।

"छत्तर दादा तुम घोडा और घोडा हाँकने वाला भेज देना, मेरा बेटा डमरू दास बहुत अच्छा घुड़सवार है वो घोड़े को खुद ही हाँक लेगा।" दमड़ी दास ठंडी सांस लेकर बोला।

"ठीक है कल जुल्फी तेरे घर घोडा लेकर आ जाएगा।" छत्तर दादा थोड़ी चिंता के साथ बोला और उसने जुल्फी को आवाज दी, "बेटा जुल्फी कल हीना को लेकर दमड़ी दास के घर चला जइयो और इसके बेटे डमरू दास की घुड़चढ़ी करवा दियो।"

"कैसी बात कर रहे हो दादा? माना हीना घुड़साल की सबसे सीधी घोड़ी है लेकिन वो ढोल धमाका देख कर बिदक गई तो, डमरू दास का डमरू बजा देगी।" जुल्फी सिर खुजाते हुए बोला।

"तो तुझे क्यों भेज रहा हूँ? अब ज्यादा मत सोच कल घुड़चढ़ी बाइज्जत निपटवाना तेरी जिम्मेदारी है।" कहकर छत्तर दादा पुनः तख्त पर लेट गया।

दमड़ी दास ने छत्तर दादा को लेटते हुए देखा तो समझ गया की मीटिंग खत्म। ठंडी सांस लेकर वो भी घुड़साल के गेट की तरफ चल पड़ा।

अगले दिन 

शाम का वक्त और छुट्टी का दिन होने की वजह से छत्तर दादा की घुड़साल पर कई मुस्टंडे बैठे थे कोई चाय बना रहा था, कोई उधार के बिस्किट लेने गया था। लेकिन छत्तर दादा के माथे पर चिंता की लकीरे थी।

"क्या हुआ दादा? कुछ परेशान से लग रहे हो?" चक्रम एक कप चाय छत्तर दादा को देते हुए बोला।

"चिंता की बात तो है चक्रम बेटे, जुल्फी बहुत देर से हीना को लेकर दमड़ी दास के बेटे डमरू दास की घुड़चढ़ी कराने गया था, अभी तक वापिस नहीं आया है।" छत्तर दादा चिंता के साथ बोला।

"घुड़चढ़ी का काम भी करने लगे, धंदा कुछ मंदा चल रहा है क्या?" चक्रम हँसते हुए बोला।

"अबे धंधे की वजह से नहीं, घोड़ी दमड़ी दास की जिद की वजह से भेजनी पड़ी........."

अभी छत्तर दादा अपनी बात पूरी भी न कर सका था कि हाहाकार मच गया। पकड़ो-पकड़ो, बचाओ-बचाओ, अबे कान छोड़ दे इसके; की आवाज से घुड़साल गूँज उठी।

"अबे क्या तूफ़ान आ गया………." कहते हुए छत्तर दादा बाहर की तरफ भागा।

बाहर का नजारा देखने लायक था, हीना लोट आई थी और घुड़साल के बड़े मैदान में इधर-उधर दौड़ रही थी। डमरू दास शेरवानी पहने उसकी पीठ उसके कान पकड़ कर बैठा या लेटा था और बचाओ-बचाओ चिल्ला रहा था। उसके पीछे-पीछे जुल्फी और दमड़ी दास दौड़ रहे थे, दमड़ी दास पकड़ो-पकड़ो चिल्ला रहा था और जुल्फी, अबे कान छोड़ दे इसके; चिल्ला रहा था।

हीना ने घुड़साल के मैदान के दो चक्कर लगाए और डमरू को घुड़साल की सख्त जमीन पर पटक दिया और घुड़साल के अंदर भाग गई।

"अबे छत्तर दादा कैसी बदमाश घोड़ी भेजी तूने? पूरे शहर में मेरी इज्जत का जुलुस निकलवा दिया तूने…….उठ जा बेटे।" दमड़ी दास अपने रोते हुए बेटे डमरू दास को जमीन से उठाते हुए बोला।

दमड़ी दास की तरफ ध्यान ने देकर छत्तर दादा जुल्फी की तरफ देख कर बोला, "क्यों बे जुल्फी के बच्चे क्या ड्रामा है ये? घोड़ी कैसे भागी?"

"दादा ये डमरू दास बहुत नालायक है, इसने घोड़ी पर बैठते ही मुझे घोड़ी के पास भी खड़े न होने की सलाह दी, इसके दारुबाज दोस्तों ने घोड़ी की लगाम मुझसे से छीन ली और इसके सामने भयंकर आतिशबाजी करने लगे, डरकर घोड़ी भाग निकली, इस नालायक ने घोड़ी के कान पकड़ लिए इससे घोड़ी और भी चिढ गई और हमें आधे शहर का चक्कर कटा कर यहाँ ले आई।" जुल्फी हांफता हुआ बोला।

"सुन लिया दमड़ी दास तेरे नालायक बेटे की बदमाशी की वजह से घोड़ी बिदकी अब दोनों बाप बेटे चलते फिरते नजर आओ।" छत्तर दादा गुस्से से बोला।

"ऐसा न करो छत्तर दादा मेरे बेटे की घुड़चढ़ी का जिम्मा तुम्हारा था, अब तुम्ही दूसरी घोड़ी का इंतजाम करो।" दमड़ी दास गिड़गिड़ाते हुए बोला।

"मेरी कोई जिम्मेदारी न थी लेकिन मेरी घोड़ी की वजह से ये सब हुआ है इसलिए कोशिश करता हूँ कि कही से घोड़ी का इंतजाम हो जाए।" छत्तर दादा दिमाग को ठंडा करते हुए बोला।

उसके बाद छत्तर दादा ने घुड़साल में आए सभी मुस्टंडो को शहर के सभी बारात की घोड़ी वालो को फोन करने को कहा।

"दादा सभी घोड़ी वालो की घोड़ी आज बुक है, कल्लू कह रहा है इस टाइम तो घोड़ी तो छोड़ गधी भी नहीं मिलेगी।" ढक्कन प्रसाद तेजी से बोला और दमड़ी दास की तरफ देखने लगा।

"कहीं नहीं मिलेगी घोड़ी आज.........." छत्तर दादा हाथ खड़े करते हुए बोला।

"दादा कुछ तो इंतजाम करो………" दमड़ी दास रिरियाते हुए बोला।

"दादा अपना भोलू क्यों नहीं भेज देते इनके साथ?" चक्रम ने सुझाव दिया।

"अबे वो तो मेरा पालतू गधा है उसे इस झमेले में न घसीटो……." छत्तर दादा चक्रम को डांटते हुए बोला।

"अगर सीधा है तो गधा ही दे दो, बोल बे बैठेगा गधे पे?" दमड़ी दास गुस्से से डमरू दास की तरफ देखते हुए बोला।

"बिलकुल नहीं बैठुंगा गधे पे………" डमरू दास कलपते हुए बोला।

"तू क्या तेरा बाप भी बैठेगा………चलो दादा तैयार करवा दो भोलू को।" दमड़ी दास गुस्से से डमरू दास की तरफ देखते हुए बोला।

"तैयार क्या करना, गधे का राइडिंग गियर तो हमारे पास है नहीं, एक कंबल पड़ा है उसे ही डाल दो भोलू की पीठ पर और ले जाओ अपनी बारात।" छत्तर दादा हँसते हुए बोला।

बातो ही बातो में सारे मुस्टंडे दूर घास चर रहे भोलू को पकड़ लाये और उसकी पीठ पर कंबल बिछा कर डमरू दास को लाद दिया और भोलू के कान उसके हाथो में पकड़वा दिए।

"सुनो बे मुस्टंडो, भोलू को वापिस लाना तुम्हारी जिम्मेदारी है, सब के सब दमड़ी दास के साथ डमरू की बारात में जाओ और घुड़चढ़ी या गधचढ़ी का कार्यक्रम करा कर भोलू को यही वापिस लेकर आओ, अगर ये कहीं भाग गया तो तुम सबकी खाल उतरवा दूँगा।" छत्तर दादा चेतावनी देते हुए बोला।

ठीक है दादा आते है हम वापिस भोलू के लेकर कहते हुए मुस्टंडे डमरू की बारात में नाचते हुए घुड़साल से बाहर निकल गए।

अपने परिवार से जुदा होकर भी सदा उनसे जुड़े रहने वाले छत्तर दादा का गुलफाम नगर का हर दिन लगभग ऐसा ही होता था। आज का दिन तो गुजरा लेकिन इस गुलफाम नगर का कल का दिन क्या ड्रामा उसके सामने लेकर आएगा यही सोचते हुए छत्तर दादा फिर से अपने तख्त पर जा लेटा।


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