minni mishra

Tragedy


4.5  

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Tragedy


गर्भपात

गर्भपात

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“चाचा ओ चाचा... सो गये क्या ? ” सभी बच्चे एकसाथ चिल्लाये।


“हाँ.. झपकी लग गई। घर का मुखिया हूँ ना, रात को भी ठीक से सो नहीं पाता !”


‘सो तो है चाचा, आप सर्दी-गर्मी, आंधी-तूफ़ान सभी से हमें बचाते हैं। पर, चाचा बात ही कुछ ऐसी है, बहुत घबराहट सी हो रही है।”


“अरे..क्या बात है ? बताओ तो।”


“चाचा,कल हमने मकान मालिक को बोलते सुना था, “अगले हफ्ते दीपावली है ...घर के कोने-कोने की सफाई होगी, और रंग-रोगन भी।”

 अब हमलोगों का क्या होगा ?! यहाँ हम सीढी-घर के रोशनदान में कितने बेफिक्र और महफूज रहते आये हैं। पर,आज बहुत भयभीत हैं, दीपावली की सफाई में हमारी भी सफाई तय ही समझो !”


“अरे...शुभ-शुभ बोल। चिंता किस बात की ? मैं हूँ..ना !” बच्चों को ढाढ़स बांधते हुए चाचा मधुरता से बोले।


“धपर...धपर... यह आवाज कैसी ?! लगता है कोई सीढ़ी से ऊपर आ रहा है। वो...सामने, देखिये...आ गई महिला सफाईकर्मी ! चाचा, हमें नहीं बख्शेगी । बहुत निर्दयी होकर झाड़ू चलाती है। सोचेगी भी नहीं, कि इसमें किसी जोड़े का सपना सजा है।” सफाईकर्मी को देखते ही अंडों में हडकंप मच गया।


”बच्चों, जब तुम्हें पता था, तो.. तुमने अपनी माँ को क्यों नहीं बताया ? वो आज तिनका लाने नहीं जाती ?” मौत को सामने खड़ा देख, चाचा खुद को अब असहाय महसूस करने लगे।


“ चाचा,हमें माँ की चिंता सताए जा रही है। वो यहाँ पहुंचेगी और हमलोगों को ढूंढेगी। जब हमारी लाश का कोई ठिकाना उसे नहीं मिलेगा !फिर क्या बीतेगी उस पर ! ओह! बेचारी के सभी संजोये सपने...दीपावली के चकाचौंध में तिनके की तरह बिखर जायेंगे।”


सफाईकर्मी, तेज कदमों से हमलोगों के करीब आ पहुंची। उसकी हाथ में पकड़े झाड़ू की कसी मूठ पर नजर पड़ते ही, हमसभी बलि के बकरे की तरह थरथराने लगे

वो पास आकर फुसफुसाई , “ बहुत तेज दर्द हुआ था मुझे , जब मेरे घरवालों ने भ्रूण-परीक्षण के बहाने मेरा गर्भपात करवाया था !


 बच्चों, मैं स्त्री हूँ... तुम्हारी माँ की पीड़ा भली भाँती समझ सकती हूँ। “कहते-कहते सफाईकर्मी ने अपनी दिशा बदल ली।


    



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