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Shelly Gupta

Tragedy

4  

Shelly Gupta

Tragedy

एक सबक

एक सबक

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सिया पूरे घर में अपने बेटे वेद को ढूंढ चुकी थी और जब वो कहीं ना मिला तो उसने आस पड़ोस के सोसाइटी के सभी घर छान लिए पर वेद का कुछ पता नहीं चला। बड़ी देर तक तो सिया को लगता रहा कि वो फिर से शैतानी कर रहा है पर अब काफी देर होने को थी और सिया के हाथ पांव फूलने लगे थे। दो बार तो वो सोसाइटी के गेट पर चौकीदार से पूछ आई थी लेकिन उसे भी कुछ पता नहीं था।

सिया की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे और किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल कांपा जा रहा था। उसके साथ उसकी सारी दोस्त भी वेद को ढूंढ कर थक गई थी। वो अब बस अपने पति गौरव का इंतजार कर रही थी जो टूर पर गए हुए थे और किसी भी वक़्त घर पहुंचने वाले थे। आज गौरव भी ना जाने क्यों लेट हुए जा रहे थे और फोन भी बंद आ रहा था, शायद बैटरी ख़तम होने के कारण।

सिया की आंखों के सामने अपने बेटे वेद का कुछ ही पलों में जैसे सारा बचपन घूम गया। कितनी मन्नतों के बाद हुआ था वो, कितने डॉक्टरों के चक्कर लगाए, कहां कहां माथा नहीं टेका उन लोगों ने - उन सबका फल था वेद। अभी सिर्फ आठ साल का ही तो है और इतनी प्यारी बातें और शैतानियां करता है कि बस पूछो मत। जाने कहां गया होगा मेरा बेटा, ये सोच सिया फिर रो पड़ी। सब उसे दिलासा दिए जा रहे थे पर उसे बस वेद चाहिए था।

तभी सामने से गौरव आ गए। सिया गौरव को देखते ही ज़ोर जोर से रोने लगी," मेरा बेटा ला दो वापस कहीं से, उसे कुछ हो गया तो मैं ज़िंदा नहीं रहूंगी।" सिया का रोना सुन सबकी आंखों में भी पानी था। गौरव ने उसे गले से लगाया और शुरू से सारी बात बताने को कहा।

सिया ने बताया कि उसे लगभग एक घंटे से ऊपर हो गया वेद को ढूंढ़ते हुए। अभी नहाने जाने से पहले उसको पढ़ने के लिए बैठाकर गई थी और जब वापस आई तो वो कहीं ना मिला। ये बताकर सिया फिर रोने लगी।

रो तो गौरव भी रहा था लेकिन सब पूछना भी तो जरूरी था। सो उसने सिया से पूछा कि क्या तुमने वेद को कुछ कहा था नहाने जाने से पहले। अब सिया थोड़ा नज़रें चुराने लगी। फिर बोली कि मैंने उसे दो थप्पड़ लगाए थे क्योंकि वो पढ़ाई नहीं कर रहा था। इस पर गौरव ने कहा, " पर उसके पेपर तो कल ही ख़तम हुए थे फिर कैसी पढ़ाई और तीसरी कक्षा के बच्चे के लिए इतनी भी क्या पढ़ाई की वो एक दिन भी आराम से नहीं रह सकता । क्यों मारा तुमने उसे।"

सिया रोते हुए बोली, " मैं बस इतना ही तो चाहती थी कि मेरा बेटा सबसे अव्वल रहे, बस इसलिए उसके साथ सख्ती करती थी। कल को वो बड़ा हो कर एक ऊंची पोस्ट पर बैठेगा तो फायदा तो उसका होगा, बस यही सोचा था मैंने तो।"

गौरव बोला," और शायद इसी सोच के कारण तुम रोज़ उसे पीटती थी और इसी कारण वो घर छोड़ कर चला गया। क्या था अगर कुछ नंबर कभी कम आ भी जाएंतो लेकिन तुम तो एक गलती पर ही बखेड़ा खड़ा कर देती थी। कितनी बार समझाया था तुम्हे पर तुम नहीं मानी। अब तुम्हारे कारण मेरा बेटा ना जाने कहां होगा, कहीं गलत लोगों के हत्थे ना चढ़ जाए वो बेचारा मासूम।"

सिया के तो गौरव की बात सुनकर होश ही उड़ गए और वो ज़मीन पर बैठकर ज़ोर ज़ोर से वेद बुलाते हुए रोने लगी। हर किसी की आंखें नम थी। 

तभी किसी ने हल्के से सिया को छुआ और प्यार किया। सिया ने हड़बड़ाकर आंखें खोली। सामने वेद खड़ा था, अपने कान पकड़े हुए और रो रहा था। सिया ने उसे ज़ोर से अपने से चिपका लिया और फूट फूटकर रोई। उसके चेहरे को चूमती रही और पूछती रही," कहां चला गया था तू बग़ैर किसी को बताए। जान निकाल दी थी मेरी।"

इस पर गौरव बोला, "आज एक बड़ा हादसा होते होते बच गया। तुमसे मार खाने के बाद, वेद घर छोड़ने के लिए निकल गया था। ये तो चौकीदार ने उसे देख लिया छुप कर निकलते हुए और पकड़ लिया। नया चौकीदार होने के कारण अभी वो सब को नहीं जानता था तो इस से पूछताछ करने लगा। और वेद बिना कुछ बताए रोता रहा और बार बार - मुझे छोड़ दो,मुझे जाना है कहता रहा। चौकीदार इसे चुप करवाने की कोशिश कर ही रहा था कि मैं पहुंच गया। वेद को रोता देख मेरा दिल कांप गया। उसे गले लगाया तो वो इतना रोया की बस क्या बताऊं और कहने लगा कि मैं अब घर में नहीं रहूंगा। मम्मी ने मुझे बोला है कि मैं बहुत गन्दा बच्चा हूं जो उनकी बात नहीं मानता और पढ़ाई नहीं करता। मेरी मैम तो नहीं कहती ये सब, वो तो मेरी तारीफ करती हैं पर मम्मा कभी खुश नहीं होती, कभी तारीफ़ नहीं करती। इसलिए मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा।

कितनी मुश्किल से इसे चुप करवाया है और इसे समझाया है कि मम्मा तुमसे बहुत प्यार करती हैं इसलिए तुम्हे अच्छे से अच्छा पढ़ने कि कोशिश करती हैं। ये तो शुक्र था कि आज रास्ते में ट्रैफिक कम था और मैं समय पर पहुंच गया वरना क्या से क्या हो जाता। तुम्हारी सनक हमारा घर उजाड़ देती। हर चीज़ की अति बुरी होती है, ये तुम ना जाने कब समझोगी। इसलिए मैं इसको लेकर पार्क में चला गया ताकि तुम्हे अच्छे से समाझ सकूं कि आज क्या हो सकता था।"

सिया चुप खड़ी गौरव से डांट खा रही थी और रोते हुए पछता रही थी। आज उसे अपनी पिछली सारी गलतियों का एहसास हो रहा था कि कैसे उसने सबसे ऊपर रखने कि इच्छा के चलते अपने बच्चे का बचपन छीन लिया था। लेकिन भगवान ने उसकी लाज रख ली। अब वो कभी दुबारा ऐसा नहीं करेगी। उसे अच्छे से पढ़ाएगी ज़रूर लेकिन बग़ैर मार के। सिया ने रोते रोते वेद के आगे झुककर अपने कान पकड़ लिए और वेद उसकी गोद में झूल गया।

सिया की लाज तो भगवान ने रख ली पर हर किसी को वक़्त इतनी मोहलत नहीं देता। हम अपने बच्चों को ना जाने किस रेस का घोड़ा बना रहे हैं। पता नहीं क्यों बच्चों में बचपन अब दिखाई नहीं देता और क्यों हर बच्चा अब खुश नहीं दिखता। अब ज़रूरत है हमें बदलने की। हर सौ में से सौ नंबर लाने वाला ज़िन्दगी के इम्तिहान में भी सौ नंबर लाएगा, ये कोई गारंटी से नहीं कह सकता। तो बस अब बच्चों को इस दिखावे की रेस से बाहर निकालिए। उन्हें किसी भी काम में उनका सौ प्रतिशत देने में मदद करें और उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद करें - यही माता पिता का फर्ज़ होता है, ये नहीं कि अपने सपनों की खातिर उनके बचपन की बलि चढ़ा दें। मेरी आप सबसे बस यही गुज़ारिश है कि बच्चों का बचपन ना खोने दें।


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