एहसास
एहसास
रितेश ने बिंदिया को बाँहों में भरते हुए पूछा एक बात पूछूँ तो सही सही जवाब दोगी ना। बिंदिया ने भी उसके काँधे पर अपना सिर रखते हुए बोला, मैं आपसे कभी झूठ नहीं बोलती। रितेश ने पूछा, "तुम्हारी नीली डायरी में वह सूखा गुलाब क्यों रखा है। वैसे तो तुम्हें गुलाब से एलर्जी है।" बिंदिया चौकते हुए बोली, "मतलब आप मेरी जासूसी करते हैं। आपको मेरी नीली डायरी के बारे में कैसे मालूम चला?" दोनों ही अपनी चोरी पकड़ी जाने से अजीब सी स्थिति में थे।
रितेश ने बिंदिया के माथे को चूमते हुए बोला, "जान! तुम्हारी जासूसी नहीं करता हूँ। परसों मैं एक फाइल घर पर भूल गया था। तो वही लेने दोपहर को घर पर आया था। चाभी मेरे पास ही थी। सोचा था तुम्हें सरप्राइज दूंगा, इसलिए आइसक्रीम लेकर आया था। पर तुम डायरी हाथ में पकड़े पकड़े ही सो गई थी और उसी से एक सूखा गुलाब बाहर झाँक रहा था। तुम्हें सुकून से सोते देखकर मैंने डिस्टर्ब नहीं किया और आइसक्रीम फ्रीजर में रख कर चुपचाप वापस चला गया।"
"अरे हाँ ना मैं भी सोच रही थी यह आइसक्रीम फ्रिज में कहां से आई ! आपने बाद में बताया भी नहीं।"
रितेश बोला, "बताया तो अब तक तुमने भी नहीं है, उस फूल की क्या कहानी है ? तुम मुझे इतना प्यार करती हो कि तुम पर शक करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। पर एक जिज्ञासा है उस फूल के बारे में। तुम अपनी कहानी बताओगी तो मैं भी तुम्हें अपनी कहानी बताऊंगा।"
बिंदिया आश्चर्य से रितेश की आँखों में देखते हुए बोली, "आप की कहानी भी है"?
रितेश चुहल करता हुआ बोला, "हर एक की कहानी होती है जानेमन।"
बिंदिया बोली, "हॉं यह तो आप सही कह रहे हैं। पर मेरी कहानी इतनी कुछ खास नहीं है छोटी सी है। मैंने उसी साल बारहवीं पास की थी और दिसंबर में मेरी बड़ी बहन की शादी थी। बारहवीं तक लड़कियों के स्कूल में पढ़ी थी और छोटा शहर होने के कारण प्रेम प्यार की शय से अनजान थी। शहर में पापा का रौब था इसलिए भी किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। दीदी की बारात में बहुत सारे जीजू के, जीजू के भाइयों के दोस्त लोग आए हुए थे। उन्हीं में से एक की एक जोड़ी आँखें मुझे पहली बार शर्माने को मजबूर कर रही थी। वह जाने अनजाने बार-बार मेरे करीब आता। उसकी हरकतों से अब तो मेरी सहेलियाँ भी मुझे छेड़ने लगी थी। मैं डर रही थी कि पापा या किसी ने देख लिया तो मेरी शामत आ जाएगी। मेरी तो उसे आँख भर देखने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। बस उसकी नजरों की तपिश हर पल महसूस कर रही थी।
अब दीदी के फेरे हो रहे थे। सब दीदी जीजू पर पुष्प वर्षा कर रहे थे मैं सबसे पीछे खड़ी थी गुलाब की पंखुड़ी या फूल से बचने के लिए। वैसे मैंने दवाई ली थी पर फिर भी। सबका ध्यान दीदी जीजू पर था। वह पीछे आया, मेरे बिल्कुल पास खड़े होकर मेरे मुँह पर गुलाब फेरते हुए कुछ बोला। फूल के स्पर्श से बचने के लिए मैंने फूल को हाथ से पकड़कर हटाने की कोशिश की। पर गुलाब की खुशबू से मेरी तो छींके आनी शुरू होती इससे पहले ही मैं नाक मुँह पकड़कर अंदर कमरे में भाग गई। माँ और चाची ताई मुझे हमेशा डांटते थे शुभ अवसरों पर छींकना नहीं चाहिए। सबसे पहले गुलाब को छुपाया। डर था कोई पूछ बैठेगा छींकने की वजह तो क्या जवाब दूँगी। थोड़ी ही देर बाद माँ मुझे ढूँढते हुए आई, तो मैंने बोल दिया मुझे छींके आने लगी थी इसलिए अंदर चली आयी। माँ ने कहा, "अच्छा किया। वैसे भी शादी हो ही गई है। तू सो जा, जब विदाई होगी तब जगा दूँगी।" नींद, मेरी छींकों का सबसे सटीक रामबाण इलाज एक यही था। मैं भी छींक छींक कर परेशान हो गयी थी। माँ मुझे सुला कर चली गई। दूसरे दिन भारत बंद का आवाहन होने के कारण दीदी की ससुराल वालों ने यह निर्णय लिया कि विदाई जल्दी करा लेते हैं। क्योंकि जाने में चार से पाँच घंटे लगते हैं। देर से निकलेंगे तो परेशानी हो सकती है। तो दीदी की विदाई हो गई और मैं कभी जान ही नहीं पाई कि वह कौन था। उसके बाद जिंदगी में कोई आया भी नहीं तो बस यह फूल डायरी में रखा ही रह गया। पहले प्यार का तो नहीं, पर प्यार के पहले एहसास की निशानी के रूप में। यह मुझे मिला जिंदगी का पहला और आखरी गुलाब है। बस इतनी सी कहानी है। आपको बुरा लगे तो मैं हटा दूँगी।"
रितेश उसके बालों में उँगलियां फेरते हुए बोला, "क्या सच में उस दिन तुमने उसकी कही कोई बात नहीं सुनी थी" ?
बिंदिया नजर झुकाती हुई बोली, "सुनी थी ना। उसने कहा था. . . . रितेश ने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखते हुए बोला, "तुम गुलाब से भी ज्यादा खूबसूरत हो। मैंने आज पहली बार चाँद को गुलाबी देखा है। तुम अभी बहुत छोटी हो और मैं भी। पर शादी तो मैं तुमसे ही करूँगा।"
बिंदिया आश्चर्य से उसे देखते ही बोली, "आप. . . ? आपने कभी बताया भी नहीं।"
रितेश बोला, जी हाँ मेरे गुलाबी चाँद, उस दिन के बाद में जब मुझे पता चला तुम्हें गुलाब से एलर्जी है और तुम्हारी तबीयत खराब हो गई है तो मुझे बहुत बुरा महसूस हुआ। मैं तुम्हें सॉरी बोलना चाहता था, पर बोल नहीं पाया। इसलिए कभी जिक्र भी नहीं छेड़ा कि पता नहीं तुम क्या सोचती होगी उस लड़के के बारे में।"
बिंदिया मुस्कुरा कर बोली, "मतलब अब मैं इस गुलाब को आधिकारिक रूप से संभाल कर रख सकती हूँ। यह मेरे महबूब का दिया पहला और आखिरी गुलाब है।"
रितेश बिंदिया के हाथों को चूमता हुआ बोला, "कि अगर यह किसी और ने भी दिया होता तो भी तुम इसे संभाल कर रख सकती थी। क्योंकि फूल रखने या फिर फेंक देने से दिल के एहसास नहीं मरा करते हैं।"

