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Rupa Sah Rupali

Romance Inspirational


4.5  

Rupa Sah Rupali

Romance Inspirational


एहसास तेरे प्रेम का

एहसास तेरे प्रेम का

14 mins 311 14 mins 311

शादी से पहले कई बार सुन चुका था...शादी लड्डू मोतीचूर का खाये पछताए जो न खाए पछताए...

पर मेरी कहानी इनसे अलग थी मैं जरा दूध का जला था... जरा तो बाहर की बता रहा हूँ पर भीतर से तो ऐसा जला था कि अब फ़्रिज की ठंडी छाछ पीते भी डर लगता था।

सरकारी नौकरी क्या लगी घर वाले लड्डू मुँह में ठूसने पर तूल गए सब यही कहते "अरे अब किस बात का इंतजार अच्छा-खासा कमा रहे हो?" और शायद ये मेरी नौकरी की ही कृपा थी जो एक के बाद एक रिश्ते भी आने लगे थे।

पहली बार किसी लड़की को देखने उसके घर गया था, सोचा था देखने के बाद घर आते ही इनकार कर दूँगा पर जब उसे देख कर लौटा तो फिर कुछ और देखने की इच्छा ही न रही। सोते-जागते उठते-बैठते अब तो मुझे बस एक ही चेहरा नजर आने लगा।

बहुत सोचने के बाद मैंने फैसला किया जब दोनों हाल में पछताना ही है तो बिना स्वाद लिए क्यूँ मरूँ ? हो सकता है मेरी किस्मत अच्छी हो और मुझे पछताना ही न पड़े...बहरहाल घर वालों की मर्जी मान रहा हूँ ऐसा दिखाते हुए भीतरी खुशी को सब से दबाकर मैंने भी शादी कर ही ली।

जिंदगी की सबसे खूबसूरत रात थी मेरी, वो कमरे में मेरा इंतजार कर रही थी घरवालों को लग रहा था मैं कमरे में हूँ पर मैं सबकी नजरें बचा कर छत पर चक्कर काट रहा था। काफी रात बीत जाने के बाद जब कमरे में आया तो देखा वो सो चुकी थी। कमरे की मध्यम रोशनी में भी चमक रहा था उसका वो चाँद सा चेहरा। बिना किसी आहट के मैं उसे यूँ ही निहारता रहा...

ये मेरा मन है न खामोशी में ही अधिक शोर करता है आज भी और तब भी..मैं सोचने लगा ये इतनी जल्दी कैसे सो गई? शादी की पहली रात तो सबके लिए कितनी खास होती है अगर इसे भी मेरा इंतजार होता तो आज ये कभी न सोती !! जरूर ये मुझे पसंद नहीं करती बस घरवालों की मर्जी मान हाँ कह दी होगी ! और घरवाले बेचारे भी क्या करते मेरी सरकारी नौकरी देख मुझे देखना ही भूल गए। तभी तो इस काले तवे पर अपनी दूध सी सफ़ेद रोटी सेंकने को डाल दी । दूध से फिर मुझे याद आ गया वो दिन जब मैं पहली बार जला था... बारहवीं की आखरी परीक्षा देकर लौट रहा था बहुत खुश था सारे पेपर बहुत ही अच्छे से दिए थे मारे खुशी से भागता हुआ निकला था कि 'खुशी' से टकरा गया और उससे मिली उस वक़्त की खुशी को मैं शब्दों में व्यक्त करने में असमर्थ हूँ। किसी तरह सॉरी बोल निकल रहा था कि वो बोली "पता नहीं पास भी हो पाऊंगी या नहीं यार, बहुत बुरा एग्जाम गया! तुम्हारा एग्जाम कैसा रहा?"

"ठीक-ठाक..बहुत अच्छा नहीं ।" मैंने उसकी खुशी के लिए बोला था।

"तेरे जैसे टॉपर का अगर अच्छा नहीं गया इसका यही अर्थ है कि पेपर ही बुरा था । चलो मेरी चिंता कम हुई अब सबके कम नम्बर आएंगे।" कहती हुईं वो मुस्कुरा कर चली गयी।

सच कहता हूँ पहली बार किसी की मुस्कान मेरी जान ले गयी थी। फिर वही सोते-जागते उठते-बैठते बस उसी का ख्याल। वो तो भगवान की कृपा थी मुझपर जो ये प्रेम का बादल एक्ज़ाम के बाद बरसा था नहीं तो न आज ये सरकारी नौकरी होती न ये बगल में लेटी चाँद।

खैर रिजल्ट निकला और मैं फिर से मेरे क्लास का टॉपर था। जब उसके बारे में पता किया तो वो तीन सब्जेक्ट में फेल थी मेरा दिल अपनी खुशी भूल अब उसके गम में डूबा गमगीन हुआ बैठा था। वो कितनी दुखी होगी सोच-सोच कर मैं दुखी होता रहा। इसपर एक ये की मेरा ये स्कूल भी अब छूटने वाला था। इतनी अच्छी रिजल्ट के बाद भी मेरी देवदास सी हालत मेरे एक दोस्त से बर्दाश्त न हुई और उसने मुझे अपने प्यार के इजहार की सलाह दी। मैं डर गया "अगर गुस्सा हो गयी तो?"

"तू टॉपर है यार और वो फेल ! दौड़ कर हाँ बोलेगी देखना।"

"एक बार अगर फेल हो भी गयी तो क्या अगली बार बहुत अच्छा करेगी देखना.....मैं उसकी मदद करूँगा पढ़ाई में..।" शर्माते हुए भी मैंने गर्व से तनकर कहा था।

समय कम था...उसकी बातों में आकर बहुत सारी तैयारी के साथ मैं उसके सामने गया और किसी तरह हकलाते हुए अपनी सारी फीलिंग्स उसके आगे रख दी..

कुछ देर तो वो मुझे ऐसे ही घूरती रही फिर बोली

"कभी अपनी शक्ल देखी है आईने में.. पूरे काले बिल्ले लगते हो, आए बड़े मुझसे प्यार करने वाले...अगर दूसरी बार ऐसी हरकत की न तो सर फोड़ दूँगी तुम्हारा...समझे !! स्टुपिड कहीं के।" और गुस्से से पैर पटकती हुई चली गयी।

प्यार का नशा गुस्से की बारिश में नहाकर उतर चुका था। वो तो अच्छा हुआ कि उसके बाद मैं स्कूल छोड़ कॉलेज चला गया नहीं तो मारे शर्म के न पढ़ पाता न आज मेरे पास ये सरकारी नौकरी होती ! पर उस दिन दिल के कोरे कागज ने ये नोट कर लिया था कि तू बदसूरत है और किसी के प्यार के लायक नहीं... और इसका पूरा ख्याल रखने की जिम्मेदारी मेरे जले हुए मन की थी।

उसे देख-देखकर मैंने वो हसीन रात काट दी सुबह होने में कुछ वक़्त था उसके आंख खोलने से पहले ही मैं यहाँ से चला जाऊँगा मैं यही सोचता रहा पर जाने कैसे आँख लग गयी। सुबह जब नींद खुली तो देखा वो कमरे में नहीं थी..हाँ मुझ सोते हुए पर एक चादर वो डाल गयी थी। 

दूसरे दिन पूरा दिन मैं उसके सामने जाने से बचता रहा..मैं नहीं चाहता था कि मेरा ये भ्रम टूटे की वो भी मुझे पसंद करती है। मैं उससे अपनी भावनाओं के इजहार से डरता था...कहीं इसने भी काला बिल्ला बोल दिया तो जीवन भर इसका सामना कैसे करूँगा?

दूसरी रात कमरे में आते ही मैंने बत्तियां बुझा कर कमरे में घुप्प अंधेरा कर दिया ताकि उसे मेरा चेहरा नजर ही न आये ये भी न सोचा कि उसने तो मुझे कितनी बार ही देखा है।

जब बिस्तर पर पहुंचा तो वो बोली "मुझे अंधेरे से डर लगता है।"

उसे जाँचने के लिए मैंने भी कह दिया "डर कैसा मैं हूँ न, मेरे पास आ जाओ।"

और वो तो सचमुच मेरे पास आ गयी।

पंद्रह दिन बाद मैं उसे लेकर दूसरे शहर जहाँ मेरी पोस्टिंग थी वहीं अपने किराए वाले घर पर लौट आया था।

दिन बीतते जा रहे थे पर मुझे एक पल के लिए भी उसने ऐसा महसूस न होने दिया कि वो मुझे पसंद नहीं करती। जितना मैं सोचता था उससे अधिक वो मेरा ख्याल रखती थी। सुबह होते ही जब उसपर नजर पड़ती तो ऐसा लगता सृष्टि की सारी सुंदरता जैसे मेरे ही बाहों के बीच कैद है। उसके घुटनों को छूते बाल, भरी हुई मांग , बड़ी सी गोल बिंदी.. खनखनाती हँसी..मैं नहीं कह सकता वो मेरी बाहों की कैदी थी सच तो ये था कि मैं कैदी था उसका.. उसकी मासूमियत मेरी जंजीर थी, उसका रूप जंजीर पर लगा ताला और उसकी देह... मेरा कारागार !! जहाँ से कभी मैं मुक्त ही नहीं होना चाहता था।

वो पार्वती और मैं देवदत्त...भले दो नाम थे हमारे पर आत्मा एक थी। प्यार से उसके झुमके को उंगलियों से टकराते हुए एक दिन मैंने उससे पूछा था " पारो तुम्हें मुझमें ऐसा क्या दिख गया जो तुम मुझसे इतना प्रेम करने लगी?"

"पारो !!"

"ह्म्म्म क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा ये नाम?"

"बहुत अच्छा है।" वो शर्माती हुई बोली।

"तो चलो अब जवाब दो जो मैंने पूछा।"

"तुम्हारा ये भोलापन मुझे सबसे अधिक भाता है देव, सबसे अलग हो तुम....बिल्कुल सच्चे और सबसे अच्छे !"

"देव!!"

""ह्म्म्म क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा ये नाम?" वो दुहरायी।

"नहीं ! देव और पारो तो एक दूसरे से मिलने के लिए तड़पते रहते थे मैं नहीं चाहता हमारे बीच एक पल की भी दूरी आये।"

"नाम में क्या रखा है, कितनी अच्छी जोड़ी है देव और पारो की मैं तो तुम्हें यही बुलाऊंगी।" जब वो बोली तो मैं नहीं चाहते हुए भी चुप रह गया।

मैंने कितनी ही बार उससे ये भी पूछा कि तुम्हें मुझमें सबसे ज्यादा बुरा क्या लगता है पर वो यही कहती "मुझे तो कुछ भी बुरा आज तक दिखा ही नहीं।"

शादी के तीन महीने बीत चुके थे पर आज तक कभी हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था। कभी किसी बात पर मैं नाराज भी होता तो वो मेरे सामने अपने दोनों कान पकड़ कर खड़ी हो जाती थी और उसे इस तरह देख मैं मेरी नाराजगी भूल उसे गले लगा लेता था।

वो अक्सर मुझे कंजूस कहती थी वो कहती "देव तुम बड़े कंजूस हो तुम्हारे इतने से प्रेम से तो मेरा मन ही नहीं भरता और देखो न जिंदगी बीतती जा रही है...!"

उसके इस प्रेम में डूबा ...कभी-कभी मन में सोचता जरूर था कि जाने क्यों लोग झूठ कहते हैं , शादी का लड्डू खाकर क्या सच में लोग पछताते हैं?"

उस दिन जब ऑफिस से घर लौटा तो वो बहुत खुश थी उसकी छोटी बहन का रिश्ता लगभग तय था।

"देव ये देखो लड़के की तस्वीर, गौरा-चिट्टा कितना हैंडसम है न?"

"सिर्फ हैंडसम होने से कुछ नहीं होने वाला, पहले कितना कमाता है ये पता कर लो " मैं अपनी चिढ़ छुपाते हुए बोला।

"अरे पैसे का क्या है आज कम तो कल ज्यादा लगा रहता है, शक्ल-सूरत अच्छे से देख लेना चाहिए वही देख कर तो जिंदगी भर जीना पड़ता है न। जो काला-कलूटा बदसूरत मिल गया तो जिंदगी भर घरवालों को कोसती रहेगी।" कहती हुई वो हँसने लगी।

उसके बाद वो अपने कामों में व्यस्त हो गयी और मेरे दिमाग में हथौड़े बजते रहे.....काला-कलूटा..काला-कलूटा..काला बिल्ला।

मेरा सोया हुआ वो दूध का जला मन एक बार फिर से जाग चुका था जो बार-बार मुझसे यही कह रहा था कि क्या ये भी अपने घरवालों को कोसती है?

उस रात मैंने पूछ ही लिया..

"पारो मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ?" कहते हुए मैंने उसकी ओर अपनी बाँह बढ़ाई।

"पूरी दुनिया में सबसे प्यारे !" बाँह के सहारे अब वो मेरे सीने से आ लगी थी।

"मेरा मतलब था देखने में?"

"बहुत अच्छे लगते हो बाबा , पर आज ये सवाल क्यों?"

"बोलो न अगर किसी के जैसा कहना हो तो क्या कहोगी?"

"मैं कहूँगी मेरे कृष्ण हो तुम।"

मैं मन ही मन खुश हो गया कोई इससे बड़ी प्रशंसा क्या करेगा भला।

दूसरे दिन ऑफिस में एक दोस्त ने बताया कृष्ण का अर्थ काला होता है !!

पंख लगाए साल भी बीत गया

एक दिन वो मुझसे बोली "मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त की पोस्टिंग इसी शहर में हो गई है वो शाम को मिलने आ रहा है आज तुम जल्दी ऑफिस से आ जाना।"

शाम को लाख जल्दी की कोशिश के बाद भी जब मैं घर पहुँचा तो वो आ चुका था।

इतने दिनों बाद अपने पुराने दोस्त से मिलकर तो आज पारो मुझे ही भूल गयी थी।

दोस्त के बारे में कहूँ तो गौरा-चिट्टा हैंडसम... 'अभय'। मैं बैठा उन्हें देखता रहा नकली मुस्कान बिखेरता रहा और वो बातों में लगे रहे।

पर अब ये एक दिन की बात न रही थी अब तो वो अक्सर शाम को आने लगा था। कभी-कभी हमें उसके साथ शॉपिंग या सिनेमा का न्योता भी देता था जिसे सुनकर पारो के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी और इसी को देख मैं बड़ी शालीनता से उसे मना कर देता था।

एक दिन वो अपने कुछ दोस्तों के साथ पिकनिक पर चलने की जिद्द करने लगा पर हमेशा की तरह मैंने मना कर दिया।

"क्या होता जो हम उनके साथ पिकनिक पर चले जाते?" उसके जाने के बाद वो बोली। उसकी आवाज की तल्खी मुझे समझ आ रही थी।

"और न भी गयी तो क्या हो जाएगा।" मैंने भी बेरुखी से कह दिया।

"कुछ नहीं हुआ जब किस्मत ही फूटी है मेरी तो किसी से क्या शिकायत करना।" कहकर वो रसोई में चली गयी।

किस्मत फूटी है? ये सुनते ही जल उठा था मैं और इसी के साथ फिर से जाग गया था वो जला हुआ मन...

किस्मत फूटी है ऐसा मान चुकी है वो... तभी तो कभी कोई शिकायत नहीं करती। मैं भी सोचूँ जब सब ये लड्डू खाकर पछताते हैं तो मैं अछूता कैसे रह गया। मुझे एक अपने ऊपर थोपी हुई नियति समझ ये मन मारकर स्वीकार कर रही है...

मैं उसके पास रसोई में पहुँचा और बोला

"अगर तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहती हो तो जा सकती हो।"

वो चुप रही।

"मैं तुम्हें कभी किसी बात के लिए नहीं रोकूँगा आज के बाद।"

वो अब भी चुप रही तो मेरा मन भीग गया।

"पार्वती पिकनिक पर चलने की तैयारी कर लो।"

"सच !! वो छोटे बच्चे की तरह खुश होकर मुझसे लिपट गयी और बोली "इसलिए तो कहती हूँ न तुम दुनिया में सबसे अच्छे हो...लेकिन आज ये पार्वती ?"

"यही तो तुम्हारा नाम है न ..आज से मैं तुम्हें यही बुलाऊंगा।"

सच तो ये था कि मैं उसके नए दोस्त से, उसके चेहरे से अब डरने लगा था मैं नहीं चाहता था मेरी पारो बंट जाए। मैं उसे पार्वती बना कर खुद शिव होना चाहता था।

दूसरे दिन न जाने क्या सोचकर पार्वती ने ही पिकनिक पर चलने से मना कर दिया।

जाने कितनी दफा मैंने उससे अपने प्रेम का इजहार किया था और उससे भी ज्यादा तो उसने किया था.. पर सच तो ये है मैंने जाना ही नहीं था कि ये प्रेम क्या होता है!"

मेरा शक अब बढ़ता जा रहा था। हर-पल ऐसा लगता जैसे मेरे घर में फैली मेरी चाँद की रौशनी मेरे इस स्याह चेहरे के अंधेरे से ढकती जा रही है और इसी अंधेरे के पीछे वो गौरा-चिट्टा लड़का मेरी पारो की देह को काला कर देना चाहता है।

ऐसे तो वो हमेशा तब ही घर आता था जब मैं उपस्थित रहता था पर मेरा जला हुआ मन कहता क्या भरोसा जो छुप कर भी आता हो तो? उन्हें रंगे हाथों पकड़ने के लिए अब मैं जब-तब बिना बताए घर आ जाता।

उस दिन भी यही सोचता हुआ तेजी से घर की ओर निकला था, अपने जले मन के सवालों से जलता चला जा रहा था कि...वो ट्रक की भयानक टक्कर...असहनीय दर्द, आसपास लोगों की जमघट...और इसके बीच मध्यम होती आवाजें...

जब जागा तो हिल भी नहीं पा रहा था। पूरे शरीर पर पट्टियां थी यहाँ तक कि आँखों पर भी... उसका दोस्त अभय और वो मेरे पास ही खड़े थे। उनकी आवाज सुनाई दे रही थी...

"डॉक्टर कह रहे थे शायद अब ये कभी देख ना पाए..आंखों को बहुत नुकसान हुआ है! अभय बोला।

वो सिसकती रही। मैं मन ही मन सोच रहा था अब तो ये जरूर मुझे छोड़ कर चली जायेगी...एक तो पहले से काला-कलूटा था उसपर अब अंधा...

कुछ देर बाद जब डॉक्टर आये तो वो बोली " डॉक्टर आप मेरी एक आँख इन्हें दे दीजिए हम दो आँखों से ही मिलकर दुनिया देख लेंगे।"

"ऐसा नहीं हो सकता...हाँ आप इनकी आंखें जरूर बन सकती हैं और भगवान की कृपा से हम भी कभी इनकार नहीं करते कितने ही ऐसे केसेस में रोशनी वापस भी आ जाती है।" डॉक्टर ने कहा।

अब मैं भीतर ही भीतर कमजोर पड़ रहा था मैं सोच रहा था हाथ-पैर जरा भी चलने लगे तो मैं खुद को सारे सांसारिक बंधनों से आज़ाद कर लूँगा और उसके लिए लिख जाऊँगा की वो अभय के साथ जिंदगी की नई शुरुआत कर ले। उससे दूर होने के ख्याल से भी मैं विचलित हो गया... मैं तड़प रहा था उसके एक स्पर्श के लिए जिसमें डूब मैं खुद को भूल जाता था।

उसे मेरी चाहत समझ आयी या क्या था न जाने वो मेरे पास आकर मेरे बालों पर अपनी मखमली उंगलियाँ फेरने लगी।

मैंने अपने मन की आंखें बंद कर ली। बदन में एक नया स्पंदन जाग रहा था मेरा दर्द अब मुझे महसूस नहीं हो रहा था।

ओह्ह..तो क्या यही प्रेम है..? इतना सुखद इतना अलौकिक, अब मौत से कोई डर नहीं.. मैंने जी लिया है इस प्रेम को.. पर अभी कहाँ ये तो बस बूंदें थी पूरा समंदर मेरे डूबने का इंतजार कर रहा था।

मेरी बेबसी, मेरी हर अनकही चाहत वो समझ रही थी...वो वैसी ही सारी रात मुझे थामे बैठी रही।

बीस दिन बाद मैं घर लौटा था...अंधा-अपाहिज !

धीरे-धीरे साल भी बीत गया । मैं अब भी जिंदा था। जिस सरकारी नौकरी पर घमंड था वो छूट चुकी थी। इतने दिनों में पारो ने एक पल के लिए भी मुझे महसूस न होने दिया कि मैं उसके लायक नहीं। दिन-रात मेरी सेवा करती थी। जहाँ पहले वो कुछ घंटे भी बिना खाये नहीं रह सकती थी आज न जाने कितने उपवास कितने व्रत रख मेरी लंबी उम्र की दुआएँ माँगती थी।

एक दिन जब मैंने उदासी में डूबकर उससे कहा कि

"पारो अब मेरे जीने से अच्छा मर जाना ही है देखो न तुमपर बोझ बन गया हूँ मैं... क्यूँ बेकार ये व्रत उपवास करती हो!

मुझे अपने बाहों में समेटकर वो बोली थी

"मैं सुहागन मरना चाहती हूँ देव...मेरी ये इच्छा पूरी करोगे न?"

"तुम भी न पारो ये जिंदगी या मौत किसी के वश में होती है क्या?"

"तो फिर उसी के हाथ छोड़ दो न जिसके वश में है...वो जानते हैं पारो अपने देव के बिना एक पल भी नहीं जी सकती।"

उस दिन के बाद से जीने की इच्छा जागने लगी थी। अब मैं भी जिंदा रहने की दुआ करता था अपने लिए नहीं उसके लिए।

गंगा सी पारो पर शक किया था सज़ा तो मिलनी ही थी और अब तो बस क्षमा मांगना ही काम रह गया था।

शायद भगवान को दया आने लगी थी। अब मैं उठकर धीरे-धीरे चलने लगा था। एक आँख में धुंधली सी रोशनी भी वापस आने लगी थी। बीतते दिनों के साथ अब मुझे स्वस्थ जान पारो ने अभय की सहायता से एक नौकरी तलाश ली और मैंने घर का भार अपने कंधे पर उठा लिया। दोनों ने मिलकर डूबती गृहस्थी को आसानी से थाम लिया। कुछ ही दिनों बाद मेरी गोदी में मेरी चाँद का एक चाँद चमक रहा था।

आज मैं पैंसठ का हूँ और पारो साठ की। बेटे-बहु ने मिलकर अब हमारी गृहस्थी की बोझ उठा ली है।

जहाँ बुढ़ापे में सबकी कमर झुकती है और आंखों की रोशनी कम हो जाती है वहीं अब मेरी कमर पूरी तरह सीधी हो चुकी है और एक आँख से साफ-साफ दिखाई भी देने लगा है।

वक़्त ही वक़्त है हमारे पास एक दूसरे के लिए पर पारो आज भी यही कहती है "देव तुम बड़े कंजूस हो तुम्हारे इतने से प्रेम से तो मेरा मन ही नहीं भरता और देखो न जिंदगी बीतती जा रही है...!"

याद ही नहीं कब मेरा और जले हुए मन का साथ छूट गया... शायद पारो के प्रेम की मीठी छुअन ने मेरे काले शरीर के भरते जख्मों के साथ मेरे मन के काले घावों को भी भर डाला था...



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