दर्द का रिश्ता
दर्द का रिश्ता
दो घंटे हो गए थे, पूरा मुहल्ला खड़ा तमाशा देख रहा था ,अंदर ही अंदर कई पड़ोसी खुश हो रहे थे, कुछ के लिए ये मुफ्त का मनोरंजन था ! विश्वास कभी गिर जाता तो कभी जमीन पर लेट जाता, शगुन कई बार कोशिश कर चुकी थी उसे अंदर ले जाने की पर वो विश्वास को संभाल ना पाती, ऊपर से शगुन को देखते ही गाली -गलौच शुरू हो जाता !
अचानक एक गाड़ी रुकी ,नए पड़ौसी की थी .......माँ, बेटा गाड़ी से उतरे ! माँ ने पहले विश्वास को देखा .......फिर एक नजर शगुन पे डाली ! माँ ने आंख से बेटे को इशारा किया। बेटा विश्वास को काबू करने लगा .....अब पुराने पड़ोसियों को भी थोड़ी शर्म आयी, दो तीन जनो ने मिल कर धक्के से विश्वास को गाड़ी में डाला !
"आप तो ठीक से हमें जानती भी नहीं फिर भी........!"
"तुम्हें नहीं जानती .....पर दर्द से अच्छी तरह पहचान है मेरी, आज मैंने ये दर्द....ये शर्मिंदगी .......जो तुम्हारी आँखों में देखी, कभी ये मेरी आँखों में थी !"
