" दहलीज के कुत्ते "
" दहलीज के कुत्ते "
बड़े से आंगन में मूँज की बनी निखड़ही खाट( बिना बिछौने के) पर एक ऊँची सी तकिया लगाए गाँव के सरपंच शिवरतन सिंह लंबे पड़े हुए थे। सुबह की सुनहली धूप शरीर पर पड़ रही थी।
माघ महीने के अंतिम दिनों की सर-सर हवा के बीच शरीर पर पड़ रही धूप बड़ी भली
लग रही थी। बंद आँखों में इंतजार था बिरजू का, जो
गरम तेल की कटोरी लेने सरपंचनी के पास गया हुआ था। अब आधे घंटे शरीर की तगड़ी मालिश के बाद
गर्म पानी से स्नान।
कहाँ मर गया रे बिरजू....शाम तक आयेगा क्या ?
आया मालिक... थानेदार साहब आये हुए हैं आपसे मुलाकात के लिए ....
मुँह कड़वा हो उठा शिवरतन का, आ गया पैसा वसूलने,
करे भी तो क्या ? छोटे भाई ने कांड ही ऐसा कर दिया है।
घर में इतनी सुंदर पत्नी होते हुए भी चमरौटी की धनिया
पर हाथ डाल ही दिया था। शहर की हवा खाकर आई धनिया पुलिस स्टेशन पहुंच गई रपट लिखवाने, अब थानेदार आ धमका है। समझ रहा हूँ ससुर के नाती, काहे के लिए मिलने आया है सुबह-सवेरे।
ऐ बिरजू ...साहब के लिए कुर्सी डाल... और धनिया से कह कि मालकिन से चाय-नाश्ते के इंतजाम करने के लिए ...
दरोगा साहब के कान खड़े हो गये, धनिया और यहाँ ...
हां तो बताइए साहब, इतनी सुबह यहाँ, सब कुशल तो
है।
हां, सरपंच साहब इधर से गुजर रहा था तो सोचा सुबह की नमस्ते करता चलूँ...
बहुत बढ़िया किया दारोगा साहब, कल धनिया डांटने की वजह से पुलिस स्टेशन चली गई थी। कुछ झूठ, सच बोल आई थी, फिर पछता कर रोती रही।
का रे धनिया...
हम सच बोल रहें हैं न।
हां मालिक ...हम रपट वापिस लेना चाहते है मालिक,
घूघंट डाले धनिया ने दोनों हाथ जोड़े। हाथों में पुराने जमाने के भारी सोने के कंगन बज उठे...
सब किस्सा समझ में आ गया दारोगा साहब को, आखिर पुराने घाघ जो ठहरे।
बेतरह गुस्सा उठा मन में, कमाई का ख्वाब जो ढ़ह गया।
बेमन से चाय पी और कहा कि ठीक है, थाने आकर खाना-पूर्ति करवा दीजिएगा । मैं इसी सिलसिले में आया था कि पूछता चलूँ कि आखिर क्या हो गया था।
अरे कुछ नहीं साहब, हँसते हुए सरपंच जी ने कहा...
घरेलू मामला था, घर में ही निपट गया।
अरे बिरजू....साहब के गाड़ी में मावे के लड्डुओं का टोकरा
तो रखवा दे...
तभी आंगन के दहलीज पर कुत्ता आकर कूकुआने लगा,
फेंकी रोटी पाने के लिये....
अंदर धनिया...बाहर दारोगा जी
