डरावना कुआँ
डरावना कुआँ
बचपन का डर अक्सर पूरी जिंदगी हमारा पीछा नहीं छोड़ता, ऐसा ही एक डर मुझे आज भी डरा देता है वो है उस कुएं का डर....
हमारे घर से थोड़ी दूर पर एक कुआँ था हम सारे दोस्त जब भी खेलते हुए उसके पास पहुँचते तो वहाँ कुछ अलग ही आबो हवा होती, पर हम लोग अपने खेल के आगे ज्यादा ध्यान न देते।
उस दिन जब हम लोग लुका छुपी खेल रहे थे, तो मैंने और मेरे एक दोस्त ने सोचा कि हम लोग कुएं के पास वाली दीवार के पास छुपेंगे वहां हमें कोई देख नहीं पायेगा और हम गेम जीत जायेंगे।
तो पहुँच गये उस दीवार के पीछे वहाँ इतना सन्नाटा था कि हमें अपनी सांसों कि आवाज भी सुनाई दे रही थी।
कुछ देर छुपे रहने के बाद अचानक हमें वहां किसी के चलने कि आवाज आई जो धीरे - धीर हमारे पास आ रही थी। हमें लगा हमारे दोस्त ही होंगे जो हमें ढूंढ़ रहे है। हम दोनों सांस रोके वही बैठे रहे ।पर जब फिर कोई हलचल न हुई तो हमें डर लगने लगा, हम दोनों ने सोचा कि अब चाहे हारे या जीते पर यहाँ से निकलते है, जैसे ही हम लोग उठने को हुए अचानक छम छम छम छम छम पास से अति हुई आवाजें दूर होती चली गईं। अब हम लोगों की साँसे वही कि वही रुकती महसूस हुई , पसीने से तर बतर हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े जय हनुमान, जय हनुमान चिल्लाने लगे हमारी आवाज से हमारे दोस्त जो हमें ढूंढ रहे थे सारे आ गये।
दोस्त हमारी हँसी उड़ाते इसलिये उनसे बिना कुछ कहे हम घर आ गये। माँ को जब ये सारी बात बताई तो माँ बोली ...
"मना करते है न कि उधर खेलने मत जाया करो। और ऐसा कुछ नहीं होता तुम सब बच्चे उस कुएं में गिर न जाओ इसीलिए किसी ने डराया होगा। में पता करती हूं तुम डरो मत और आज के बाद वहां खेलने मत जाना।
माँ के ये कहने से हमें थोड़ा सुकून जरूर मिला पर आज तक मां भी पता नहीं लगा पाईं कि वो घुंघरुओं की आवाज कहां से आई थी। उस समय को हम सालों बाद भी याद करते है तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते है।

