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Deepak Kumar Shayarsir

Abstract

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Deepak Kumar Shayarsir

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डर

डर

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शाम होने को थी और सुयश फूटपाथ पर चलता हुआ अपने बस स्टॉप की ओर जा रहा था। शहर की लाइट्स अपना रंग बदल रही थी। अंधेरे की वजह से फूटपाथ पर चल रहे किसी भी राहगीर का चेहरा दिखाई नहीं पड़ रहा था।

तभी पीछे से ख़ट-ख़ट करती हुयी सैंडल पहनी एक महिला उसके पीछे धीरे-धीरे आने लगी। सुयश अपने धुन में मग्न था और रोजमर्रा की तरह उसे बस बस स्टॉप तक पहुंचना था। जैसे उसे अहसास हुआ कि कोई उसके पीछे है तो चुपचाप मुड़कर देखा।

स्ट्रीट लाइट की एक हलकी सी किरण लड़की के चेहरे पर पड़ीI सुयश फिर आगे चल पड़ा और लड़की भी धीरे-धीरे उसके पीछे चलती रही।

बस स्टॉप आ चुका था और बस आधे घंटे में आने वाली थी। सुयश कुछ पूछता उससे पहले ही लड़की बोली – माफ़ कीजियेगा कि मैं आपके पीछे चल रही थी लेकिन अंधेरा इतना ज्यादा था कि डर रही थी। सुयश ने कहा-“कोई बात नहीं ! मुझे इस बात का अहसास हुआ था।” 


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