दाग
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दाग
शीला और माला बचपन से ही ऐसी पक्की सहेलियाँ थीं कि गाँव में अगर कोई एक को बुलाता, तो दूसरी अपने आप उसके साथ हाजिर हो जाती थी।
दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।
शीला पढ़ाई में बहुत होशियार थी और शिक्षकों की चहेती थी। किताब खोलते ही वह दुनिया-भूल जाती थी।
वहीं, माला को किताबों से ज़्यादा रंगमंच पसंद था। स्कूल के हर नाटक में उसका यही आग्रह रहता था कि उसे कोई-न-कोई पात्र ज़रूर मिले।
लेकिन, माला के चेहरे पर बचपन की चेचक (शीतला) के निशान छूट गए थे।
गाल, माथे और ठोड़ी के पास के गहरे-उथले दाग दूर से ही साफ़ दिखाई दे जाते थे।
कभी-कभी बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे—
“अरे, माला के चेहरे पर तो पूरा आसमान है!”
बचपन में ऐसे शब्द तीर की तरह चुभते थे।
माला घर लौटकर आईने के सामने खड़ी हो जाती और अपने चेहरे को देखती।
एक दिन उसने शीला से पूछा,
“शीला, क्या मैं सचमुच बहुत बुरी लगती हूँ?”
शीला ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा।
“नहीं। तुम अलग दिखती हो। और अलग होना बुरी बात नहीं है।”
“लेकिन लोग हँसते हैं।”
“लोगों को हँसने के लिए कोई-न-कोई वजह चाहिए। कल जब तुम बहुत बड़ी कलाकार बनोगी, तब यही लोग तुम्हारे सामने खड़े होकर तालियाँ बजाएँगे।”
माला मुस्कुरा उठी थी।
“क्या मैं कलाकार बनूँगी?”
“हाँ। और मैं तुम्हारी पहली दर्शक बनूँगी।”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ी थीं।
समय आगे बढ़ता गया।
शीला पढ़ती गई और आख़िरकार अपने ही गाँव के स्कूल में शिक्षिका बन गई। बच्चे उसे बहुत प्यार करते थे। वेतन बड़ा नहीं था, घर सादा था और जीवन में कोई खास चमक-दमक नहीं थी।
लेकिन उसे अपने जीवन से कोई शिकायत भी नहीं थी।
दूसरी तरफ़, माला ने रंगमंच को चुना।
शुरुआत में उसे कई बार सुनने को मिला—
“चेहरे पर इतने दाग हैं, तो नायिका का मुख्य किरदार नहीं मिलेगा।”
माला ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसे नायिका नहीं बनना था।
उसे अभिनेत्री बनना था।
छोटे मंचों से शुरू हुआ उसका सफर धीरे-धीरे बड़े नाटकों, टेलीविज़न और फिर फिल्मों तक पहुँच गया।
जो चेहरा कभी लोगों के लिए मज़ाक था, वही चेहरा अब उसके हर किरदार की पहचान बन गया था।
माला कोई भी भूमिका निभाती, लोग कहते—
“यह स्त्री हर किरदार में जान फूँक देती है।”
सालों बाद माला देश की जानी-मानी कैरेक्टर आर्टिस्ट बन चुकी थी।
बड़ा घर, महँगी कार, सहायक, ड्राइवर और सुरक्षा—सब कुछ उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके थे।
लेकिन, एक चीज़ नहीं बदली थी।
वह जब भी अपने पुराने गाँव की बात करती, शीला को ज़रूर याद करती।
सालों बाद...
एक दिन शीला किसी काम से शहर आई थी।
दोपहर के बाद भारी ट्रैफिक था। बारिश हो चुकी थी, इसलिए सड़क किनारे पानी भरा हुआ था।
शीला बस का इंतज़ार कर रही थी।
तभी सड़क पर एक काली गाड़ी आकर रुकी।
दो सुरक्षाकर्मी आगे बढ़े।
एक सहायक छाता लेकर खड़ा हो गया।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला।
माला बाहर आई।
शीला की नज़र उस पर पड़ी।
एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं।
फिर माला की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“शीला!”
शीला के चेहरे पर सालों पुराना वही अपनापन लौट आया।
“माला!”
दोनों ने एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया।
कुछ पलों के लिए गाड़ी, सुरक्षा, बारिश और यह शहर—सब कुछ गायब हो गया।
माला ने शीला का हाथ पकड़ लिया।
“तुम इतने सालों तक कहाँ थीं?”
“मैं तो वहीं थी, जहाँ थी—अपने गाँव में, स्कूल में।”
“और मैं तुम्हें ढूँढ़ती रह गई।”
“मुझे तो तुम्हारे बारे में अखबारों से खबरें मिल जाती थीं।”
माला हँस पड़ी।
“तो फिर मुझसे शिकायत है। फोन क्यों नहीं किया?”
“तुम जैसी बड़ी हस्ती को मैं कैसे फोन करती?”
माला ने प्यार से डाँटते हुए कहा,
“बड़ी हस्ती को नहीं, अपनी माला समझकर तो कर सकती थीं ना।”
दोनों पास की ही एक चाय की दुकान में जाकर बैठ गईं।
माला ने चाय मंगवाई।
शीला पुरानी बातें याद करते हुए बोली,
“याद है? तुम स्कूल के नाटक में रानी बनी थी और आख़िर में अपने सारे संवाद भूल गई थी!”
“और तुम परदे के पीछे से मुझे डायलॉग बोल-बोलकर याद दिला रही थीं!”
दोनों ज़ोर से हँस पड़ीं।
माला की आँखें नम हो गईं।
“शीला, अगर वो दिन वापस लौट आए तो?”
“दिन तो वापस नहीं आते, पर यादें कहाँ जाती हैं?”
तभी माला का सहायक दौड़ता हुआ आया।
“मैडम, कार्यक्रम शुरू होने वाला है। मंत्री जी पहुँच चुके हैं। मीडिया भी तैयार है।”
पीछे खड़े सुरक्षाकर्मियों ने अपनी घड़ियों की तरफ़ देखा।
माला ने शीला का हाथ दबाया।
“चलो, मेरे साथ।”
शीला खड़ी हो गई।
“नहीं।”
“क्यों?”
“यह तुम्हारा कार्यक्रम है।”
“तो क्या हुआ?”
शीला ने आसपास नज़र दौड़ाई।
वह महँगी गाड़ियाँ।
सुरक्षाकर्मी।
सहायक।
कैमरे।
और सामने खड़ी माला।
अभी तक जो माला उसके साथ सहजता से बैठी थी, वह अचानक उसे बहुत दूर की चीज़ लगने लगी थी।
“माला जी...” शीला ने धीरे से कहा।
माला के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।
“माला जी?”
शीला थोड़ी संकोच में पड़ गई।
“आपको जाना चाहिए। बड़े लोग इंतज़ार कर रहे हैं।”
माला कुछ पल चुप रही।
“और तुम?”
“मैं बस से चली जाऊँगी।”
“मैं तुम्हें घर छोड़ दूँगी।”
“नहीं-नहीं, यह ठीक नहीं लगेगा।”
“ठीक नहीं लगेगा?”
माला ने पहली बार शीला की आँखों में सीधे देखते हुए पूछा।
“शीला, क्या तुम्हें मेरे साथ चलने में शर्म आ रही है?”
“ऐसी बात नहीं है।”
“तो फिर क्या बात है?”
शीला के पास कोई जवाब नहीं था।
वह बस इतना ही कह पाई,
“आप अब बहुत बड़ी हो गई हैं।”
माला धीरे से मुस्कुराई।
उस मुस्कान में कोई खुशी नहीं थी।
“मैं?”
कुछ पल रुककर उसने अपनी उँगली अपने चेहरे की तरफ़ उठाई।
“ये दाग तो वही हैं, शीला।”
शीला चुपचाप खड़ी रही।
“फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले मेरे चेहरे के दाग देखकर लोग मुझसे दूर भागते थे...”
माला ने रुककर आगे कहा,
“...और आज मेरी इस बड़ी पहचान को देखकर तुम खुद मुझसे दूर हो रही हो।”
शीला की आँखें झुक गईं।
“ऐसा मत कहो।”
“मुझे इसका बुरा नहीं लगा।”
माला ने अपना हाथ शीला के कंधे पर रखा।
“मुझे सिर्फ़ इस बात का दुःख है...”
“किस बात का?”
“जब पूरी दुनिया ने मेरे चेहरे के दाग को देखकर मुझे अपनाने से इंकार कर दिया था, तब तुम अकेली ऐसी थीं जो मुझे मेरे भीतर से पहचानती थीं।”
माला का गला भर आया।
“आज पूरी दुनिया मुझे पहचानती है... पर अफ़सोस कि तुम मुझे नहीं पहचान पा रही हो।”
शीला की आँखों से आँसू छलक आए।
“माला...”
“कोई बात नहीं।”
माला ने खुद को संभालते हुए चेहरे पर एक कृत्रिम मुस्कान लाने की कोशिश की।
“मेरी पहली दर्शक, कहीं तुम्हारी बस छूट न जाए।”
दोनों में से कोई हँस नहीं पाया।
माला गाड़ी की तरफ़ बढ़ गई।
दरवाज़ा बंद होने से पहले उसने मुड़कर एक आख़िरी बार देखा।
शीला वहीं चुपचाप खड़ी थी।
माला ने हाथ हिलाया।
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।
शीला सड़क पर खड़ी होकर उस जाती हुई गाड़ी को देखती रही।
कुछ समय पहले तक उसे लगता था कि दाग सिर्फ़ माला के चेहरे पर हैं।
लेकिन आज पहली बार उसे समझ आया—
दाग चेहरे पर नहीं था।
दाग तो उसके अपने मन पर पड़ गया था।
और वह दाग आईने में नहीं दिखता था, लेकिन आज पहली बार शीला को वह साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था।
