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Kalpesh Patel

Abstract Children Stories Classics

4.7  

Kalpesh Patel

Abstract Children Stories Classics

जादुई झोला.

जादुई झोला.

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जादुई झोला.

गांव के छोर पर बने एक छोटे से नीम के पेड़ के नीचे हर शाम बच्चों की भीड़ लग जाती थी। उस पेड़ के पास रामू रहता था। रामू कोई आम इंसान नहीं था; वह गांव का सबसे अनोखा कहानीकार था। उसके पास कोई बड़ी-सी किताब नहीं थी, बल्कि उसके पास एक पुराना, खुरदुरा झोला था, जिसमें से हमेशा अजीब-अजीब और मीठी खुशबू आती थी।
बच्चे उसे प्यार से 'कहानियों वाले दादा' कहते थे। रामू की खास बात यह थी कि वह कभी भी पहले से लिखी-पढ़ी कहानियां नहीं सुनाता था। वह बच्चों के चेहरों को देखकर, हवा के रुख को भांपकर और उस दिन की किसी छोटी सी घटना को लेकर तुरंत एक नई कहानी गढ़ लेता था।
एक दिन शाम को जब सब बच्चे- मुन्नू, छुटकी, चिंटू और गोलू नीम के पेड़ के नीचे आकर बैठे, तो आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे और ठंडी हवा चल रही थी।
मुन्नू ने झट से पूछा, "रामू काका, आज कौन सी कहानी सुनाओगे? कोई परी की या किसी जादुई परीक्षित की?"
रामू ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरा, अपनी मटमैली टोकरी नुमा झोले में हाथ डाला और मुस्कुराते हुए बोले, "अरे मुन्नू राजा! आज आसमान में काले बादल देखकर मुझे वो बात याद आ गई जो आज तक किसी ने नहीं सुनी... 'अनकही कहानी'। क्या तुम सब सुनना चाहोगे कि आसमान में ये बादल कहां से आते हैं और बारिश होने पर जमीन क्यों हंसने लगती है?"
बच्चों की आंखें चमक उठीं। सबने एक स्वर में कहा, "हां! हां! सुनाओ ना रामू काका!"
रामू ने अपनी आवाज थोड़ी धीमी और रहस्यमयी करते हुए कहा—
"बहुत साल पहले की बात है, जब इस धरती पर न तो कोई नदी बहती थी और न ही कोई हरा-भरा खेत था। सब तरफ सूखी और बंजर जमीन थी। उसी गांव में एक छोटा सा लड़का रहता था जिसका नाम भी रामू ही था (वो मैं ही था, जब मैं छोटा तुम्हारी तरह था!)। उस रामू को मिट्टी से खिलौने बनाना बहुत पसंद था।
एक दिन उसने उदास होकर मिट्टी का एक छोटा सा मोर बनाया और उसे पेड़ की टहनी पर रख दिया। तभी अचानक आसमान के एक कोने से एक नन्हा सा भटका हुआ बादल वहां उतरा। उसने उस मिट्टी के मोर को देखा और फुसफुसाकर कहा— 'अरे! ये तो बहुत सुंदर है, पर इसमें जान नहीं है।'
छोटे रामू ने पूछा, 'इसमें जान कैसे आएगी?'
बादल ने कहा, 'जब कोई सच्चा बच्चा किसी बेजान चीज के लिए अपनी सच्ची दुआ मांगता है, तो आसमान से पानी की एक जादुई बूंद गिरती है।'
रामू ने अपनी आंखें बंद कीं और जोर से इच्छा मांगी कि उसके इस मिट्टी के मोर में पंख आ जाएं और वह नाच उठे। तभी, आसमान से एक चमकती हुई ठंडी बूंद सीधे उस मिट्टी के मोर पर गिरी। और जानते हो क्या हुआ?"
रामू ने कहानी रोककर बच्चों की तरफ देखा।
छुटकी ने सांस रोककर पूछा, "क्या हुआ काका? क्या मोर उड़ गया?"
रामू ने हंसते हुए कहा, "मोर उड़ा तो नहीं, लेकिन उस एक बूंद की जादू से पूरी जमीन में एक अजीब सी खनक गूंज उठी। मिट्टी में दबे हुए करोड़ों नन्हे बीज अचानक जाग उठे। पेड़ झूमने लगे, धरती ने हरी घास की सुंदर चादर ओढ़ ली और वो मिट्टी का मोर आज भी हमारे खेतों में नाचने वाले मोर के रूप में जिंदा है!"
बच्चे मंत्रमुग्ध होकर रामू की तरफ देख रहे थे। उन्हें ऐसा लगा मानो नीम के पेड़ की हर एक पत्ती उन्हें कुछ कहना चाहती हो— कोई अनकही बात, कोई भूली हुई कहानी।
रामू ने अपना झोला बंद किया और प्यार से मुन्नू के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "देखा बच्चों, कहानियां किताबों में बंद नहीं होतीं। वे हमारे आस-पास, इन पेड़ों में, तुम्हारी हंसी में और इस ठंडी हवा में छिपी होती हैं। बस उन्हें महसूस करने वाला दिल चाहिए।"
शाम ढल चुकी थी, तारे टिमटिमाने लगे थे, और रामू की अनकही कहानी बच्चों के दिलों में हमेशा के लिए बस चुकी थी।



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