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Kalpesh Patel

Children Stories Drama Classics

5.0  

Kalpesh Patel

Children Stories Drama Classics

रामू की दुनिया

रामू की दुनिया

10 mins
27

Writing
रामू की दुनिया
लेखक: कल्पेश पटेल-©

सूरज की किरणें अभी पूरी तरह धरती पर उतरी भी नहीं थीं कि रामू अपनी पुरानी, चरमराती साइकिल लेकर घर से निकल पड़ा। साइकिल की चेन हर कुछ कदम पर चटर-पटर की आवाज़ करती, मानो वह भी अपने मालिक की तरह उम्र के लंबे सफर से थक चुकी हो। शहर के इस हिस्से में सुबह की शुरुआत चाय के कुल्हड़ों से उठती भाप, अखबारों की सरसराहट और दूधवालों की साइकिलों की घंटियों से होती थी।
लेकिन आज की सुबह रामू के लिए कुछ अलग थी। आज उसकी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने वाला था—एक ऐसा अध्याय, जिसे वह स्वयं लिखना चाहता था।
पिछले दस वर्षों से रामू शहर के एक छोटे-से कोने में पुरानी किताबों की दुकान चला रहा था। दुकान इतनी बड़ी नहीं थी कि उसमें दो ग्राहक आराम से खड़े हो सकें, लेकिन किताबों की दुनिया वहाँ बहुत विशाल थी। दीवारों से सटी लकड़ी की अलमारियों में उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ, इतिहास और दर्शन की किताबें एक-दूसरे से सटकर खड़ी थीं। कुछ के पन्ने फटे हुए थे, कुछ की जिल्द उखड़ चुकी थी और कुछ पर समय की धूल की मोटी परत जम गई थी।
लोग उसे प्यार से ‘किताबों वाला रामू’ कहते थे।
वह फटे पन्नों को सावधानी से जोड़ता, उधड़ी जिल्द पर नया गत्ता चढ़ाता और धूल से सनी किताबों को ऐसे साफ करता, जैसे किसी पुराने मित्र के चेहरे से थकान मिटा रहा हो। उसके लिए किताबें केवल बेचने का सामान नहीं थीं। हर किताब में उसे किसी अनजान व्यक्ति का सपना, किसी लेखक का संघर्ष और किसी पाठक की दुनिया छिपी दिखाई देती थी।
रोज़ सुबह से शाम तक लोग आते। कोई पुरानी किताबें बेच जाता, कोई परीक्षा की तैयारी के लिए सस्ती पुस्तकें खोजता और कोई अपने बचपन की पसंदीदा कहानी फिर से खरीदना चाहता। रामू सबकी बातें ध्यान से सुनता। कई बार वह किसी ग्राहक को उसकी जरूरत से अधिक अच्छी किताब सुझा देता, भले ही उससे उसे कोई अतिरिक्त कमाई न होती।
उसकी अपनी जिंदगी, हालांकि, किताबों के पन्नों के बीच सिमटकर रह गई थी।
कमाई इतनी ही होती थी कि दुकान का किराया, घर का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें। महीने के अंत में बचत के नाम पर कभी कुछ सिक्के बचते, तो कभी अगली सुबह की चिंता भी साथ चली आती। फिर भी रामू के चेहरे पर शिकायत कम ही दिखाई देती थी। शायद किताबों के बीच रहते-रहते उसने यह सीख लिया था कि हर कहानी में दुख का एक अध्याय होता है, लेकिन वही आखिरी अध्याय हो, यह जरूरी नहीं।
पिछले कुछ महीनों से उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी जन्म लेने लगी थी।
वह दूसरों की लिखी कहानियाँ बेचते-बेचते अब अपनी कहानी लिखना चाहता था।
यह इच्छा अचानक पैदा नहीं हुई थी। बचपन में उसकी माँ रात को काम निपटाकर उसे अपने जीवन के छोटे-छोटे किस्से सुनाया करती थी। कभी गाँव में पड़े अकाल की बात, कभी किसी भूखे पड़ोसी को खिलाई गई आखिरी रोटी की बात और कभी उस अनजान मुसाफिर की, जिसने मुसीबत के समय पूरे परिवार की सहायता की थी।
माँ अक्सर कहती थी, “रामू, बेटा, दुनिया में कोई आदमी छोटा नहीं होता। छोटी होती हैं तो कभी-कभी हमारी नजरें, जो दूसरों के दुख और सपनों को देख नहीं पातीं।”
माँ अब इस दुनिया में नहीं थी, लेकिन उसकी बातें रामू के भीतर कहीं जीवित थीं।
दुकान के एक कोने में लकड़ी का पुराना बक्सा रखा था। उसके भीतर कपड़ों के नीचे रामू की एक बरसों पुरानी डायरी दबी हुई थी। उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। कहीं बचपन की कोई घटना लिखी थी, कहीं अधूरी कविता और कहीं ऐसे वाक्य, जिन्हें लिखते समय शायद वह स्वयं भी पूरी तरह नहीं समझ पाया था।
उस सुबह उसने बक्सा खोला। डायरी हाथ में लेकर वह कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर उसने उस पर जमी धूल झाड़ी और पहला पन्ना पलटा।
एक जगह माँ के कहे शब्द लिखे थे—
“दूसरों की कहानी पढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अपनी जिंदगी को समझना भी किसी किताब से कम नहीं।”
रामू की उँगलियाँ उस वाक्य पर ठहर गईं।
उसे लगा, जैसे बरसों बाद माँ ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे फिर से आवाज दी हो।
दुकान का शटर आधा ही खुला था कि बाहर से एक चहकती हुई आवाज आई।
“अरे, रामू काका! आज इतनी जल्दी दुकान खोल ली?”
यह मुनिया थी—पास की चाय की दुकान चलाने वाले की बेटी। वह रोज स्कूल जाते समय रामू की दुकान पर कुछ देर रुकती थी। उसे किताबों से ज्यादा उन किताबों के भीतर छिपी कहानियों से प्रेम था। कभी वह चित्रों वाली पुस्तक माँगती, कभी किसी राजा की कहानी और कभी भूतों की।
रामू भी उसके लिए समय निकाल ही लेता था। वह जानता था कि मुनिया के पास महँगी किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वह उसे अपनी दुकान से किताबें पढ़ने के लिए दे दिया करता था।
“हाँ, मुनिया,” रामू ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज कुछ खास काम है।”
“क्या काम? कोई नई किताब आई है?”
रामू ने डायरी उठाकर दिखाई।
“आज मैं अपनी पहली कहानी लिखने जा रहा हूँ।”
मुनिया कुछ पल उसे देखती रही। फिर उसकी आँखें चमक उठीं।
“सचमुच, काका? आप भी कहानी लिखते हैं?”
रामू हँस पड़ा।
“अभी तक तो सिर्फ दूसरों की कहानियाँ पढ़ता और बेचता रहा हूँ। आज सोच रहा हूँ कि अपनी भी एक कहानी लिखकर देखूँ।”
“तो कहानी किसके बारे में होगी? राजा-रानी के बारे में? या किसी जादुई दुनिया के बारे में?”
रामू ने दुकान के बाहर नजर दौड़ाई। सड़क पर एक रिक्शेवाला अपनी गाड़ी खींच रहा था। सामने एक मजदूर सिर पर ईंटों की टोकरी उठाए जा रहा था। चाय की दुकान पर एक बूढ़ा आदमी अखबार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। थोड़ी दूर पर एक बच्चा अपने पिता का हाथ पकड़े स्कूल की ओर जा रहा था।
रामू ने कहा, “नहीं मुनिया, यह कहानी किसी राजा-रानी की नहीं होगी। यह कहानी हमारे शहर की होगी। उन लोगों की, जो रोज सुबह उठकर अपने काम पर निकलते हैं, परेशानियाँ सहते हैं, कभी हारते हैं, कभी जीतते हैं और फिर भी अगले दिन एक नई उम्मीद लेकर उठ खड़े होते हैं।”
मुनिया ने कुछ सोचकर पूछा, “लेकिन काका, ऐसे साधारण लोगों की कहानी कोई पढ़ेगा भी?”
उसके प्रश्न ने रामू को भीतर तक छू लिया।
वह कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, “क्यों नहीं पढ़ेगा? हर बड़ा आदमी कभी न कभी साधारण ही होता है। और हर साधारण आदमी के भीतर भी एक ऐसी दुनिया होती है, जिसे कोई जानना चाहे तो उसमें पूरी किताब लिखी जा सकती है।”
मुनिया को स्कूल जाने में देर हो रही थी। वह अपना बस्ता सँभालकर उठी और बोली, “ठीक है, काका। मैं छुट्टी के बाद आऊँगी। लेकिन कहानी पूरी होनी चाहिए!”
“कोशिश करूँगा,” रामू ने हँसकर कहा।
मुनिया चली गई।
रामू ने दुकान का शटर पूरा खोल दिया, लेकिन आज उसका ध्यान ग्राहकों पर कम और डायरी पर अधिक था। उसने अपनी पुरानी केतली से कड़क चाय निकाली, एक कप अपने पास रखा और पेन हाथ में उठा लिया।
पहले पन्ने पर उसने लिखा—
“इस शहर में कुछ लोग रोज दूसरों के सपने खरीदते और बेचते हैं, लेकिन अपने सपनों की कीमत कभी नहीं पूछते।”
वह कुछ देर उस वाक्य को देखता रहा। फिर उसे काटने के लिए पेन उठाया, लेकिन हाथ रुक गया। उसे लगा कि इस एक पंक्ति में उसके अपने जीवन का एक हिस्सा छिपा हुआ है।
उसने आगे लिखना शुरू किया।
शब्द पहले धीरे-धीरे आए। कभी वह एक वाक्य लिखता, फिर उसे मिटा देता। कभी खिड़की से बाहर देखता, तो कभी पुरानी किताबों के बीच किसी भूले हुए चेहरे को तलाशने लगता। उसे डर था कि कहीं उसकी कहानी बहुत साधारण न हो जाए। कहीं लोग यह न कहें कि इसमें नया क्या है!
लेकिन फिर उसे माँ की बात याद आई—हर आदमी की जिंदगी में एक कहानी होती है।
उसने लिखना जारी रखा।
उसने एक रिक्शेवाले का वर्णन किया, जो अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए हर दिन कुछ रुपये बचाता था। एक बुजुर्ग महिला का, जो अपने दिवंगत पति की किताबें बेचने आई थी, लेकिन किताबों से बिछुड़ने के दुख में उसकी आँखें भर आई थीं। एक ऐसे युवक का, जो नौकरी न मिलने के बावजूद अपनी माँ के सामने मुस्कुराकर कहता था कि सब ठीक है।
ये लोग उसके आसपास ही तो थे। वह रोज उन्हें देखता था, उनकी बातें सुनता था, लेकिन शायद आज पहली बार उनकी जिंदगी को कहानी की तरह समझ रहा था।
दोपहर कब बीत गई, उसे पता ही नहीं चला। दो-चार ग्राहक आए, किताबें खरीदीं और चले गए। रामू ने अपनी दुकान का काम भी किया और बीच-बीच में डायरी के पन्ने भी भरता रहा।
कभी-कभी वह रुककर सोचता—क्या लिखना केवल शब्दों को कागज पर उतार देना है? या फिर उन भावनाओं को आवाज देना भी है, जिन्हें लोग अपने भीतर दबाकर जीते रहते हैं?
शाम होते-होते उसकी डायरी के कई पन्ने भर चुके थे।
बाहर सूरज की लाली धीरे-धीरे धुँधली पड़ रही थी। दुकानों की बत्तियाँ जलने लगी थीं। सड़क का शोर अब भी वैसा ही था, लेकिन रामू को सब कुछ कुछ अलग लग रहा था।
उसने आखिरी वाक्य लिखा—
“दुनिया बदलने के लिए हमेशा बड़े काम करना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी किसी अनजान आदमी की पीड़ा को समझ लेना और उसकी कहानी दूसरों तक पहुँचा देना भी एक बड़ी शुरुआत होती है।”
फिर उसने पेन रख दिया।
डायरी के पन्ने पलटते हुए उसकी आँखें नम हो गईं। उसे अपनी माँ याद आई, अपने बचपन के दिन याद आए और वह लंबा सफर भी, जिसमें वह दूसरों की लिखी कहानियों के बीच अपनी ही कहानी को भूलता चला गया था।
आज पहली बार उसे लगा कि उसने कुछ ऐसा किया है, जिसका मूल्य पैसों में नहीं आँका जा सकता।
उसकी पहली कहानी पूरी हो चुकी थी।
वह न किसी राजा की कहानी थी, न किसी युद्ध की और न किसी चमत्कार की। उसमें साधारण लोगों का संघर्ष था, उनकी छोटी-छोटी खुशियाँ थीं और उन सपनों की रोशनी थी, जो कठिन परिस्थितियों में भी बुझने से इनकार कर देते हैं।
थोड़ी देर बाद मुनिया स्कूल से लौटते हुए दुकान पर आई।
“काका! कहानी पूरी हुई?”
रामू ने मुस्कुराते हुए डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।
“हाँ, मुनिया। पूरी हो गई।”
मुनिया ने डायरी अपने हाथों में ली। कुछ पन्ने पलटे, फिर उत्सुकता से पूछा, “अब आप इसे छपवाएँगे? लोग इसे खरीदेंगे?”
रामू ने उसकी ओर देखा। उसके प्रश्न में उत्साह भी था और एक लेखक के भविष्य को लेकर बालसुलभ जिज्ञासा भी।
“पता नहीं, मुनिया,” उसने सहजता से कहा। “हो सकता है कोई इसे पढ़े, हो सकता है कोई न पढ़े। हो सकता है किसी को यह पसंद आए और किसी को न आए। लेकिन आज मैंने अपने मन की बात लिखी है। इतने दिनों से जो कुछ भीतर जमा था, उसे कागज पर उतार दिया है।”
“तो आपको खुशी हुई?”
“बहुत।”
“फिर तो यह अच्छी कहानी होगी, काका!”
रामू हँस पड़ा। “अच्छी कहानी है या नहीं, यह तो पढ़ने वाले बताएँगे। लेकिन एक बात जरूर समझ में आ गई है।”
“क्या?”
रामू ने डायरी को प्यार से सहलाया और कहा, “हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी जिंदगी में ऐसा कुछ खास नहीं है, जिसे लिखा जा सके। लेकिन सच यह है कि हम अपनी जिंदगी को ध्यान से देखना ही भूल जाते हैं। हर आदमी के भीतर एक दुनिया होती है। बस, उसे शब्द देने वाला कोई चाहिए।”
मुनिया ने डायरी वापस करते हुए कहा, “तो काका, अब दूसरी कहानी भी लिखना। मैं पढ़ने जरूर आऊँगी।”
“जरूर लिखूँगा,” रामू ने कहा। “अब तो बहुत-सी कहानियाँ बाकी हैं।”
मुनिया चली गई। रामू ने दुकान का शटर गिराने से पहले एक बार अपनी किताबों से भरी अलमारियों की ओर देखा। बरसों से ये किताबें उसे दूसरों की दुनिया में ले जाती रही थीं। आज पहली बार उसे लगा कि उसकी अपनी दुनिया भी किसी किताब में जगह पाने के योग्य है।
उसने डायरी सावधानी से बक्से में रखने के बजाय मेज की दराज में रख दी। अब वह उसे छिपाकर नहीं रखना चाहता था।
घर लौटते समय उसकी पुरानी साइकिल फिर वही चटर-पटर की आवाज कर रही थी। सड़क भी वही थी, दुकानें भी वही थीं और शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी भी वही थी।
बदला था तो सिर्फ रामू का नजरिया।
उसे आज समझ में आया था कि जिंदगी केवल दिन काटने का नाम नहीं है। जिंदगी को महसूस करना, उसके छोटे-छोटे अनुभवों को समझना और उन्हें अपने तरीके से रचना भी जिंदगी का ही हिस्सा है।
शायद उसकी कहानी अभी बहुत कम लोगों तक पहुँचे। शायद उसे छपने में समय लगे। लेकिन अब वह केवल दूसरों की किताबें बेचने वाला रामू नहीं था।
अब वह अपनी कहानी लिखने वाला रामू भी था।
और उस दिन, अपनी छोटी-सी दुकान से घर लौटते हुए, उसे पहली बार लगा कि दुनिया उतनी छोटी नहीं है, जितनी वह समझता आया था।
क्योंकि उसने अपनी दुनिया को शब्द देना सीख लिया था।



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