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Kalpesh Patel

Drama Others

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Kalpesh Patel

Drama Others

गुमराह.

गुमराह.

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गुमराह.

एक सामाजिक कहानी*

“मानवता परमो धर्मः।”

यह केवल किताबों में लिखा हुआ कोई आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि एक ऐसी भावना है, जो कभी-कभी समाज के सबसे उपेक्षित और बदनाम लोगों के हृदय में भी जीवित रहती है।

रामनगर की तंग गलियों में मोहन को सब ‘मोहन मवाली’ के नाम से जानते थे। हाथ में बीड़ी, चेहरे पर बेपरवाह मुस्कान और चाल में अकड़—उसका यही अंदाज़ था। दिनभर नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ ताश खेलना, छोटी-मोटी बदमाशी करना और लोगों से उलझना उसकी दिनचर्या थी। पुलिस के रजिस्टर में भी उसका नाम दर्ज था।

लेकिन एक अजीब बात थी। मोहल्ले के गरीब लोग उससे डरते नहीं थे। ठेले वाले, रिक्शा चालक, सब्ज़ी बेचने वाली अम्मा और दिहाड़ी मजदूर उसे अपना मानते थे। वे जानते थे कि मोहन का गुस्सा अक्सर उन लोगों पर निकलता था, जो अपनी ताकत और दौलत के नशे में गरीबों को इंसान समझना भूल जाते थे।

शहर के बड़े मिल मालिक सेठ धनराजमल को तो मोहन का नाम सुनते ही परेशानी होने लगती थी। सेठ की नज़र रामनगर की उस बस्ती की जमीन पर थी, जहाँ वर्षों से गरीब परिवार अपने छोटे-छोटे घरों में रह रहे थे। वह कभी मकान खाली करवाने की धमकी देता, तो कभी अपने आदमियों को भेजकर लोगों पर दबाव बनवाता।

ऐसे मौकों पर मोहन सबसे पहले सामने आता।

“सेठजी, जमीन आपकी हो सकती है, लेकिन इन लोगों की जिंदगी कोई खिलौना नहीं है। कहीं और जाइए, अपनी अकड़ दिखाइए!”

उसकी भाषा भले ही रूखी थी, लेकिन उसकी बात में उन लोगों का दर्द बोलता था, जिनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।

मोहन कानून का आदर्श नागरिक नहीं था। कई बार वह खुद भी गलत रास्ता अपना लेता था। मगर गरीब के घर में चूल्हा न जले, किसी बूढ़े को दवा न मिले या किसी मजदूर के साथ अन्याय हो, तो वह चुप नहीं रह पाता था।

एक कड़ाके की ठंड की रात थी। रामनगर की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग फटे-पुराने कंबलों में दुबके सोने की कोशिश कर रहे थे।

उसी रात बस्ती के आखिरी छोर पर रहने वाली रामू की माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी और शरीर बुखार से तप रहा था। रामू घबराकर इधर-उधर दौड़ा। उसने कई लोगों से मदद माँगी, लेकिन इतनी रात को कोई वाहन उपलब्ध नहीं हुआ। ऊपर से अस्पताल का खर्च उठाने की चिंता अलग थी।

किसी ने मोहन को खबर कर दी।

वह तुरंत वहाँ पहुँचा। बूढ़ी अम्मा की हालत देखकर उसका चेहरा गंभीर हो गया।

“रामू, तू चिंता मत कर। अम्मा को अस्पताल पहुँचाते हैं।”

उसने अपने परिचित रिक्शा चालक को जगाया और किसी तरह अम्मा को शहर के एक बड़े निजी अस्पताल तक पहुँचाया।

अस्पताल के प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही मोहन ने कर्मचारियों से डॉक्टर बुलाने को कहा। अम्मा की साँसें उखड़ रही थीं, लेकिन कागजी औपचारिकताओं और पैसे जमा कराने की बात पहले सामने रखी गई।

मोहन का धैर्य टूटने लगा।

“साहब, पहले इनका इलाज शुरू कीजिए। पैसे का इंतजाम हम कर लेंगे। इनकी हालत देखिए!”

ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने गंभीरता से कहा, “इलाज शुरू करने के लिए जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अस्पताल के नियम हैं।”

“नियम अपनी जगह हैं, डॉक्टर साहब, लेकिन मरीज की जान भी तो कोई चीज है!”

डॉक्टर ने जवाब दिया, “हमें मरीज की हालत देखकर निर्णय लेना होगा। आप शोर मचाने के बजाय हमें काम करने दीजिए।”

मोहन ने देखा कि बहस में समय निकल रहा है। उसने गुस्से में पास रखी मेज पर हाथ मारा।

“अगर अम्मा को कुछ हो गया, तो मैं इस लापरवाही की शिकायत हर जगह करूँगा। गरीब होने की सजा किसी को मत दीजिए!”

उसकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि आसपास के कर्मचारी इकट्ठा हो गए। अस्पताल प्रशासन को भी सूचना दी गई। कुछ देर की बहस और अफरा-तफरी के बाद डॉक्टर ने अम्मा की हालत का परीक्षण किया और तत्काल उपचार शुरू करने का आदेश दिया। आर्थिक औपचारिकताओं को बाद में देखने का निर्णय लिया गया।

अम्मा को भर्ती कर लिया गया।

मोहन बाहर गलियारे में बैठ गया। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, चिंता थी। वह बार-बार दरवाजे की ओर देखता और रामू को ढाँढस बँधाता।

“कुछ नहीं होगा तेरी माँ को। डॉक्टर इलाज कर रहे हैं।”

सुबह तक अम्मा की हालत में सुधार के संकेत मिलने लगे। रामू की आँखों में राहत के आँसू थे। उसने मोहन के पैर छूने चाहे, लेकिन मोहन ने उसे रोक दिया।

“अरे, ये क्या कर रहा है? माँ तेरी है, लेकिन मोहल्ले में सबकी माँ जैसी है। बस, आगे से उनकी तबीयत बिगड़े तो देर मत करना।”

लेकिन रात की घटना यहीं समाप्त नहीं हुई।

अस्पताल प्रशासन की शिकायत पर पुलिस पहुँच गई। अस्पताल में हंगामा करने और कर्मचारियों से दुर्व्यवहार करने के आरोप में मोहन को थाने ले जाया गया।

थानेदार उसे पहले से जानता था। उसने रजिस्टर बंद करते हुए पूछा, “मोहन, आखिर कब सुधरेगा तू? हर बार किसी न किसी झमेले में फँस जाता है। मदद करनी है तो सीधे तरीके से कर। कानून अपने हाथ में लेने का हक तुझे किसने दिया?”

मोहन कुछ देर चुप रहा। फिर हथकड़ियों में जकड़े अपने हाथों की ओर देखकर बोला, “दरोगाजी, मानता हूँ कि मेरा तरीका हमेशा सही नहीं होता। गुस्से में कई बार हद पार कर जाता हूँ। लेकिन जब किसी गरीब की जान और पैसे की शर्त के बीच चुनाव करना पड़े, तो मैं पहले उसकी जान बचाना चाहूँगा।”

थानेदार ने उसकी ओर देखा।

मोहन आगे बोला, “मैं कोई फरिश्ता नहीं हूँ, साहब। मुझसे गलतियाँ होती हैं। मगर उस रात मैं वहाँ से लौट आता, तो शायद जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाता।”

थानेदार कुछ क्षण मौन रहा। वह मोहन की बदमाशियों से भी परिचित था और गरीबों के लिए उसके खड़े होने की बातों से भी।

“देख मोहन,” उसने शांत स्वर में कहा, “तेरी नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन नीयत अच्छी होने से हर तरीका सही नहीं हो जाता। किसी की मदद करना इंसानियत है, मगर कानून तोड़ना हमेशा उसका रास्ता नहीं हो सकता। अगर तू सचमुच इन लोगों के लिए कुछ करना चाहता है, तो अपनी ताकत को सही दिशा दे।”

मोहन ने पहली बार बिना जवाब दिए उसकी बात सुनी।

उस दिन उसे कोई बड़ी सीख नहीं मिली थी, ऐसा नहीं था कि वह अचानक बदल गया था। लेकिन थानेदार के शब्द उसके मन में कहीं ठहर गए थे।

कुछ देर बाद औपचारिक कार्रवाई पूरी करके उसे चेतावनी के साथ छोड़ दिया गया। बाहर निकलते ही उसने देखा कि रामू अपनी माँ के ठीक होने की खबर देने आया था।

“भैया, डॉक्टर ने कहा है कि अम्मा अब खतरे से बाहर हैं।”

मोहन के चेहरे पर राहत भरी मुस्कान आ गई।

“चल, अब घर जा। और सुन, दवा समय पर दिलवाना।”

रामू चला गया। मोहन कुछ देर सड़क के किनारे खड़ा रहा। सामने शहर जाग रहा था। वही सड़कें, वही अमीरों की गाड़ियाँ और वही गरीबों की बस्ती।

दुनिया उसे अब भी ‘मवाली’ कहेगी। उसके पुराने कारनामे एक दिन में मिटने वाले नहीं थे। लेकिन शायद अब उसके सामने एक नया सवाल था—क्या वह गरीबों का साथ देने के लिए हमेशा डर और धमकी का सहारा लेगा, या अपने गुस्से को किसी बेहतर रास्ते पर लगा पाएगा?

उसने बीड़ी निकाली, फिर कुछ सोचकर वापस जेब में रख दी और बस्ती की ओर चल पड़ा।

उसे अभी बहुत कुछ बदलना था—दूसरों के लिए भी और अपने लिए भी।

**मुख्य सीख:** सच्ची मानवता किसी पद, प्रतिष्ठा या धन की मोहताज नहीं होती। समाज जिन्हें भटका हुआ समझकर ठुकरा देता है, उनके भीतर भी करुणा और न्याय की भावना जीवित हो सकती है। लेकिन मानवता की सबसे बड़ी जीत तब होती है, जब नेक इरादों को सही रास्ता भी मिल जाए।



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