गलियों की गूंज
गलियों की गूंज
गलियों की गूंज
रात के दो बज चुके थे। शहर के उस पुराने मोहल्ले की तंग और सुनसान गलियों में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिनभर बच्चों की किलकारियों, ठेले वालों की पुकार और लोगों की चहल-पहल से गुलज़ार रहने वाला वह इलाका अब शांत नींद में डूबा था।
उसी मोहल्ले के एक घर की पहली मंजिल की खिड़की से छोटा सोनू अपनी उनींदी आँखें मलते हुए बाहर झाँक रहा था। नीचे सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था। बस एक झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट थी, जिसकी पीली और मद्धिम रोशनी में एक दुबला-पतला आवारा कुत्ता चुपचाप बैठा अपनी परछाईं को निहार रहा था।
तभी दूर कहीं से एक जानी-पहचानी आवाज़ हवा में तैरती हुई आई। यह मोहल्ले के बुज़ुर्ग चौकीदार की सीटी थी। उसके साथ उनकी लाठी की सड़क पर पड़ती नियमित "ठक... ठक..." की ध्वनि भी सुनाई दे रही थी।
उस गहरे सन्नाटे में वह आवाज़ किसी आश्वासन जैसी लग रही थी, मानो कोई कह रहा हो, "डरो मत, मैं जाग रहा हूँ। सब सुरक्षित है।"
चौकीदार की सीटी और लाठी की खड़खड़ाहट सुनकर सोनू के मन में एक अजीब-सी तसल्ली भर गई। उसे लगा कि भले ही पूरा मोहल्ला गहरी नींद में सो रहा हो, लेकिन कोई है जो सबकी सुरक्षा के लिए जाग रहा है।
कुछ ही देर में आवाज़ें दूर चली गईं और गलियों में फिर वही खामोशी लौट आई। लेकिन इस बार वह खामोशी अकेली नहीं थी। उसमें सुकून था, अपनापन था और एक अनदेखे भरोसे की गर्माहट थी।
सोनू ने धीरे से खिड़की का पल्ला बंद किया, अपने बिस्तर पर लेटा और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लिए सपनों की दुनिया में खो गया।
