इंसानियत ±
इंसानियत ±
इंसानियत ±
*माइक्रो स्टोरी*
### सीमा पर आख़िरी मोड़
रात का घना अँधेरा। भारत-पाकिस्तान सीमा के पास एक सुनसान सड़क और दूर-दूर तक पसरा सन्नाटा।
‘ऑटो-21’ नाम की सेल्फ-ड्राइविंग कार अस्सी किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ी जा रही थी। पिछली सीट पर बैठा समीर थकान से आँखें मूँदे हुए था कि अचानक एक तीखी बीप के साथ कार रुक गई।
“सिस्टम अलर्ट! सड़क के बीचोंबीच एक व्यक्ति मौजूद है।”
समीर ने आँखें खोलीं। कार की हेडलाइट्स में एक बुज़ुर्ग सीमा सुरक्षा जवान दिखाई दिया। चेहरे पर झुर्रियाँ, वर्दी पर धूल और आँखों में अजीब-सी बेचैनी।
“बेटा, गाड़ी आगे मत ले जाना! सड़क पर बारूदी सुरंग हो सकती है!” जवान ने हाँफते हुए चेतावनी दी।
डैशबोर्ड पर लाल अक्षरों में संदेश चमका—
**‘कोई डिजिटल ख़तरा दर्ज नहीं। मार्ग सुरक्षित है। यात्रा जारी रखें।’**
“सर, मेरे सेंसर किसी ख़तरे की पुष्टि नहीं करते। यह व्यक्ति आपकी यात्रा में अनावश्यक देरी कर रहा है। क्या मैं आगे बढ़ूँ?” कार ने निर्विकार स्वर में पूछा।
“नहीं! यहीं रुको!” समीर ने दृढ़ता से कहा।
उसने जवान की आँखों में देखा। वहाँ न कोई एल्गोरिदम था, न कोई डिजिटल डेटा—बस वर्षों की चौकसी, अनुभव और किसी अनजान यात्री को बचा लेने की बेचैन कोशिश थी।
“दरवाज़ा खोलो। मुझे बाहर उतरना है।”
“सर, बाहर उतरना असुरक्षित है।”
समीर ने चेतावनी अनसुनी कर दी।
बाहर आकर उसने देखा कि जवान का वॉकी-टॉकी टूट चुका था। शायद इसी वजह से वह किसी को ख़तरे की सूचना नहीं दे पा रहा था।
“बेटा, मेरी बात मान ले। आगे मौत बिछी है,” जवान ने काँपते हाथ से सड़क की ओर इशारा किया।
समीर ने तुरंत अपने फ़ोन से सुरक्षा मुख्यालय को सूचना दी। कुछ ही देर में बीएसएफ की टीम वहाँ पहुँच गई। जाँच हुई तो सड़क पर हाल ही में बिछाई गई बारूदी सुरंग मिल गई।
वापस कार में बैठते हुए समीर ने डैशबोर्ड पर नज़र डाली। स्क्रीन पर अब भी वही ठंडे अक्षर चमक रहे थे—‘मार्ग सुरक्षित है।’
समीर के होंठों पर एक फीकी मुस्कान उभरी।
**मशीन के पास आँकड़े थे, मगर उस बूढ़े जवान के पास अनुभव था। मशीन के पास बुद्धिमत्ता थी, मगर जवान के पास इंसानियत।**
उस रात समीर समझ गया—हर ख़तरा सेंसर नहीं पहचानते और हर सच डेटा में दर्ज नहीं होता। कभी-कभी किसी अनजान इंसान की काँपती आवाज़ पर भरोसा करना ही ज़िंदगी और मौत के बीच का आख़िरी मोड़ होता है।
टिप्पणी
इस संस्करण में शीर्षक ‘इंसानियत ±’ का प्रतीकात्मक अर्थ भी उभरता है। ‘±’ गणित में धनात्मक और ऋणात्मक दोनों संभावनाओं का संकेत देता है। यहाँ यह सवाल उठाता है कि तकनीकी प्रगति के साथ इंसानियत बढ़ रही है या कहीं हम उसे खोते जा रहे हैं?
