कुश्ती
कुश्ती
कुश्ती
गलत तारीख
लाहौर के जाने-माने 'अनारकली' बाज़ार की गलियों से दिसंबर महीने की हल्की गुलाबी ठंड और शाम के धुंधले उजाले के बीच कासिम मियाँ अपनी पुरानी मोटरसाइकिल के फटे हुए साइलेंसर की आवाज़ के साथ ममता बेगम के घर के दरवाज़े पर आ पहुँचे।
कासिम मियाँ यानी व्यवस्थितपन और नियमितता का दूसरा नाम। जेब में हमेशा रहने वाली डायरी और कलाई पर बंधी भारत से आयात की गई पुरानी 'HMT' घड़ी उनके जीवन के दो अभिन्न अंग थे। उनकी नज़र में घड़ी का काँटा कभी गलत नहीं होता था और डायरी में दर्ज तारीख कभी गलत हो ही नहीं सकती थी!
ममता बेगम ने दरवाज़ा खोला। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान और हाथ में चाय की केतली थी। हालाँकि आज उनकी आँखों में एक अनजाना सा फिक्र वृत था।
"आइए कासिम मियाँ, आज इतनी देर क्यों हो गई?"
ममता बेगम ने मेज़ पर रखे कप में चाय उड़ेलते हुए पूछा।
कासिम मियाँ ने जेब से रुमाल निकालकर पहले अपने चश्मे को साफ़ किया। फिर गंभीर आवाज़ में बोले,
"देर नहीं हुई है ममता बेगम! समय तो अपनी ही गति से चल रहा है, पर आज का दिन ही कुछ गड़बड़झाले वाला है। यह कैलेंडर बनाने वाला कोई अक्ल का दुश्मन लगता है!"
"क्यों भाई? क्या हुआ भला आपके कैलेंडर को?"
ममता बेगम ने चाय का कप आगे बढ़ाते हुए पूछा।
"बात यह है कि आज घर पर बैठे-बैठे मैंने अपनी डायरी और दीवार पर टंगे नए कैलेंडर का मिलान किया। मेरी डायरी कहती है कि आज 31 अक्टूबर है, जबकि कैलेंडर के मुताबिक नवंबर शुरू हो चुका है! अब आप ही बताइए, किसकी बात सही मानी जाए?"
कासिम मियाँ ने चाय का कप हाथ में लेते हुए फिर जोड़ा,
"ऊपर से सैय्यदवाड़ा में रहने वाले मेरे पड़ोसी रज़ाक भाई कह रहे थे कि कल रविवार है। यानी आज शनिवार होना चाहिए। लेकिन मेरी डायरी में तो आज रविवार लिखा हुआ है! अब इतने सारे सबूतों के बीच इंसान किस पर भरोसा करे?"
ममता बेगम खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
"अरे कासिम मियाँ! आप भी हद करते हैं। डायरी और कैलेंडर की माथापच्ची में पड़ने से पहले चाय पीजिए। यह लज़ीज़ चाय ठंडी हो जाएगी, इसकी फ़िक्र कीजिए।"
"ना, ममता बेगम! यह महज़ कैलेंडर की बात नहीं है। यह तो वक़्त की अराजकता है!"
कासिम मियाँ ने गंभीरता से अपनी उंगली उठाई।
"आज तारीख गलत पड़ती है, कल महीना गलत पड़ेगा और परसों साल ही बदल जाएगा तो? मेरी सरकारी पेंशन के दस्तावेज़ों में जन्मतिथि भी बदल गई तो? कल सुबह मैं जवान होकर बाहर निकलूँ और लोग मुझे देखकर पूछें कि 'अरे भाई, आप किस ज़माने के हैं?' तो मैं क्या जवाब दूँ?"
यह सुनकर दोनों हँस पड़े।
ममता बेगम ने चाय का दूसरा कप भरते हुए कहा,
"कासिम मियाँ, एक बात कहूँ? आपकी यह भारत की HMT घड़ी, आपकी डायरी और यह कैलेंडर... तीनों को एक बार साथ बैठाकर समझाने की ज़रूरत है!"
कासिम मियाँ ने तुरंत अपनी घड़ी की तरफ देखा।
"बेगम, मेरी घड़ी तो कभी गलत नहीं होती!"
ममता बेगम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"आपकी घड़ी भारत की है, डायरी पाकिस्तान की है और कैलेंडर शायद चीन का होगा। अब आप ही कहिए, समय किसका सही माना जाए?"
कासिम मियाँ थोड़ी देर सोच में पड़ गए। फिर बोले,
"बेगम, समय तो सबका एक ही है। इंसानों ने ही इसकी सरहदें और तारीखें बनाई हैं!"
ममता बेगम उनके इस जवाब से बहुत खुश हुईं।
शाम धीरे-धीरे ढल रही थी। चाय की खुशबू घर के माहौल में महक रही थी। ममता बेगम ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,
"कासिम मियाँ, तारीख चाहे जो हो, कैलेंडर भले ही गलत हो, लेकिन एक बात कभी गलत नहीं होती। हम इस तरह शाम को साथ बैठकर चाय पीते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुःख की बातें करते हैं। इस रिश्ते की कोई तारीख नहीं होती।"
कासिम मियाँ ने अपनी HMT घड़ी की तरफ देखा, फिर ममता बेगम की तरफ। थोड़ी देर पहले उनके मन में तारीखों को लेकर जो उलझन थी, वह मानो पिघल गई।
उन्होंने चाय का कप अपने होठों से लगाया और मुस्कुराते हुए बोले,
"सही बात है, बेगम! समय चाहे जितना बदले, सरहदें बदलें, तारीखें बदलें, लेकिन इंसानियत और रिश्ते कभी पुराने नहीं होते।"
उस दिन कासिम मियाँ तारीखों के साथ कुश्ती तो जीत नहीं सके, पर एक बात समझ गए कि ज़िंदगी में हर बात का हिसाब डायरी में नहीं रखा जा सकता।
और हाँ, अगले दिन सुबह उन्होंने अपनी डायरी में एक नया नोट लिखा:
'तारीख गलत हो सकती है, लेकिन ममता बेगम के साथ की चाय कभी गलत नहीं हो सकती!'
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसमें उपयोग किए गए पात्र (कासिम मियाँ और ममता बेगम), घटनाएँ और स्थान केवल कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति के उद्देश्य से गढ़े गए हैं। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वास्तविक स्थान या घटना से यदि इसकी कोई समानता पाई जाती है, तो वह मात्र एक संयोग होगी।
इस कहानी का उद्देश्य किसी भी देश, संस्कृति, समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
कल्पेश पटेल ©2026
