कोरो-ना!
कोरो-ना!
कोरो-ना!
“रोना क्यों?”
*कोरोना से पहले के ज़माने की मज़ेदार यादें*
कोरोना आने से बहुत पहले गाँवों में एक मज़ेदार शब्द प्रचलित था—‘को-रोना!’
किसी को ज़रा-सी सर्दी हो जाए, खाँसी आ जाए या छींक निकल जाए, तो आसपास के लोग हँसते हुए कहते, “अरे भाई, को-रोना!”
अब इस ‘को-रोना’ का मतलब क्या था?
‘को-रोना’ यानी—‘रोना क्यों?’ मतलब, “अरे भाई, ज़रा-सी छींक आ गई तो क्या हुआ? रोने की क्या ज़रूरत है? चाय पी ले, सब ठीक हो जाएगा!”
गाँव के लोगों की खासियत ही यही थी कि वे छोटी-मोटी परेशानियों को भी हँसी-मज़ाक में उड़ा देते थे। हालाँकि, यह शब्दों के साथ किया गया एक मज़ाक था, किसी बीमारी का वास्तविक अर्थ नहीं!
### एक छोटा-सा संवाद
पत्नी: “अरे गोपाल, छींकते समय मुँह ढँक लिया करो!”
गोपाल: “अरे पत्ती, यह तो बस को-रोना है!”
पत्नी चौंककर बोली, “क्या? कोरोना?”
गोपाल हँसते हुए बोला, “अरे नहीं रे! को-रोना यानी ‘रोना क्यों?’ ज़रा-सी छींक आ गई तो क्या रोने बैठ जाएँ?”
पत्नी ने माथा पकड़ लिया और गोपाल अपनी ही बात पर ठहाके लगाने लगा!
लेकिन यह तो कुछ भी नहीं था। पुराने ज़माने में घर की सुविधाओं की बात आती, तो एक और किस्सा उतना ही मज़ेदार निकलता—**पूरे परिवार के लिए सिर्फ़ एक तौलिया!**
## एक तौलिया, पूरा परिवार!
कोरोना से पहले का ज़माना ही कुछ और था। आज हर व्यक्ति का अलग तौलिया, अलग साबुन और अलग व्यवस्था होती है। लेकिन गाँवों में सुविधाएँ सीमित थीं और परिवार की ज़रूरतें साझा हुआ करती थीं।
‘नहा लिया? बस, हो गया! अब तौलिया कहाँ है?’
पटेल परिवार की तो बात ही निराली थी। घर में बापू, माँ, तीन बच्चे, दादी और ऊपर से दो मेहमान! मगर तौलिया था सिर्फ़ एक!
वह तौलिया भी कोई नया-नकोर नहीं था। कहीं से फटा हुआ, किनारों से धागे निकले हुए और बीच में एक गोल-सा दाग! उस दाग का रहस्य वर्षों से बरकरार था। कोई पूछता, तो सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगते, मगर जवाब किसी के पास नहीं होता!
### सुबह-सुबह तौलिये का संग्राम
सुबह होते ही घर में तौलिये के लिए मानो युद्ध छिड़ जाता।
दादी चिल्लातीं, “अरे, तौलिया कहाँ गया? मुझे सबसे पहले नहाना है!”
माँ तुरंत जवाब देतीं, “दादी, कल तो आपने पहले नहा लिया था। आज मेरी बारी है!”
बापू घड़ी देखते हुए बोलते, “अरे, तुम दोनों बाद में लड़ लेना! मुझे दफ़्तर जाना है। जल्दी तौलिया दो!”
तीनों बच्चे एक साथ चिल्लाते, “हमें भी नहाना है!”
लेकिन तौलिया था कहाँ?
तौलिया तो मेहमान के हाथ में था! वे आराम से नहाकर अपने बाल सुखा रहे थे, मानो पूरे परिवार की तौलिया-समस्या से उनका कोई लेना-देना ही न हो!
### तौलिये का एकमात्र नियम
घर में तौलिये का एक ही नियम था—**जिसके हाथ में तौलिया, वही उस समय का राजा!**
एक दिन दादी ने सबसे पहले तौलिया झपट लिया। सबको लगा कि आज तो दादी ही जीतेंगी।
लेकिन छोटा पोता भी कहाँ मानने वाला था! उसने तौलिये का एक सिरा पकड़ा और खींच लिया। दादी का हाथ छूट गया और तौलिया पोते के हाथ में!
दादी झुँझलाकर बोलीं, “अरे रे! तौलिया भी गया और इज़्ज़त भी!”
बस, फिर क्या था! पूरा घर ठहाकों से गूँज उठा। बापू हँसते-हँसते कुर्सी पर बैठ गए और माँ बोलीं, “हमारे घर में तौलिया नहीं, राजगद्दी है!”
## अंत में बस इतना ही...
कोरोना से पहले के उन दिनों में सुविधाएँ कम थीं, लेकिन हँसी की कोई कमी नहीं थी। एक छींक पर ‘को-रोना!’ और एक तौलिये पर पूरे परिवार का संग्राम!
आज हर किसी के पास अपना तौलिया है, अपनी सुविधाएँ हैं और स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है। फिर भी, उन पुराने दिनों की सामूहिक मस्ती, भोली-भाली नोकझोंक और छोटी-छोटी बातों में हँस लेने की कला कहीं पीछे छूट गई लगती है।
**तब तौलिया एक था, मगर हँसी पूरे घर में बँटी हुई थी!**
